आरक्षण मिटाने के लिए ज़रूरी है परंपरागत व्यवसायों को ‘प्रोफेशनल’ बनाने की

हमारे समाज का सबसे कॉन्ट्रोवर्शियल टॉपिक है रिजर्वेशन….बड़े बड़े लोग इसे छेड़ने से डरते हैं. मैं भी डरता हूँ. क्योंकि कहना क्या है, इसपर निश्चित नहीं हूँ…

हम सब जूते तो पहनते ही हैं. सब के पास कम से कम 4-5 जोड़ी जूते तो होते ही हैं. महिलाओं के पास 1-2 दर्जन सैंडल होते हैं. आखिर ये कौन बनाता है? किसी इंस्टिट्यूट में जूते बनाने का कोर्स होता है क्या जिसपर ब्राह्मणों ने कब्ज़ा कर रखा है? आखिर जूते चप्पल बनते ही हैं और इन्हें हमारे मोची भाई ही तो बनाते हैं.

दुनिया में जूते चप्पल का व्यापार अरबों-खरबों का है. उसमें हमारी क्या हिस्सेदारी है? कौन सा भारतीय ब्रांड आज इंटरनेशनल है? जबकि भारतीय जूतों की क्वालिटी का दुनिया में कोई मुकाबला नहीं है.

और भारत के घरेलू बाजार में ही जो जूतों के ब्रांड हैं, उनमें से किसका मालिक कोई दलित है? यह एक व्यवसाय जिसके हुनर पर एक जाति विशेष का एकाधिकार है, उसके व्यापारिक और आर्थिक पहलू पर भी उनका दखल नहीं है. अब अगर कल को भारत में जूते नहीं बनेंगे तो चीन से बन कर आएंगे…

ब्यूटी पार्लर का अरबों का कारोबार है. हमारे नाई आज भी “हेयर कटिंग सैलून” चलाते हैं, क्या जरा से आर्थिक सहयोग से इसे “पार्लर” में नहीं बदला जा सकता. इतने फायदे के व्यवसाय में जहाँ उनका 100% रिजर्वेशन हो सकता था, उसे छोड़कर वे आठ-दस हज़ार की नौकरी में आरक्षण क्यों खोजते हैं, पता नहीं.

सुअर पालने का काम हमारे दलित भाई करते हैं. जब मैं मांसाहार करता था तो मैंने पोर्क खाया है. पोर्क सचमुच बहुत ही स्वादिष्ट होता है. भारत बीफ का इतना बड़ा निर्यातक है, पोर्क का उत्पादन बढ़ाने और इसका निर्यातक बनने की बात कोई क्यों नहीं करता. अगर हम दुनिया के पोर्क व्यापार पर कब्ज़ा करने की सोचें, तो हमारे दलित भाइयों के लिए आर्थिक क्रांति आ सकती है.

लेकिन इन सारे व्यवसायों में कौन सी एक बात नुक्सान की है? इन व्यवसायों में वह सामजिक सम्मान नहीं है. हमें यह मानसिक ग्रंथि दूर करनी होगी… साथ ही अपने हिन्दू समाज के परंपरागत व्यवसायों में बड़े स्तर पर निवेश करके इसे “प्रोफेशनल” बनाने की जरूरत है… फिर शायद रिजर्वेशन के इस प्रलोभन पर कोई थूकने भी नहीं आएगा…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY