नेतृत्व का विरोध तो नहीं, पर उससे मुखर संवाद तो करिए

क्या मोदी खुद तलवार लेकर निकल जाएँ और हिन्दु राष्ट्र बना दें?

क्या चाहते हैं कि सारे मुसलमानों को अरब सागर में धकेल दिया जाए?

मोदी खुल के हिन्दु का पक्ष नहीं ले सकते… कट्टर हिंदुवादियों की एक्सपेक्टेशन्स बहुत बढ़ गई है… अगर मोदी हार्ड-लाइनर हो जाएँगे तो खुद हिन्दु ही वोट नहीं देगा…

क्या कन्हैया और खालिद जैसे देशद्रोहियों को सज़ा दिलाना हार्ड लाइनर होना है? क्या झूठे और जहरीला प्रचार करने वाले पत्रकारों पर लगाम लगाना हार्ड लाइनर होना है?

क्या मेवानी और पटेल जैसे हिंसक आंदोलनों के सूत्रधारों को रोकना हार्ड लाइनर होना है? क्या मालदा जैसी घटनाओं पर सख्ती से पेश आना हार्ड लाइनर होना है?

यह तो न्यूनतम ड्यूटी है जो नहीं किया. और इसमें से किस विषय पर देश साथ नहीं खड़ा था?

इसी जनता ने मोदी को चुना है. और मोदी की हार्ड लाइनर छवि को जानते हुए चुना है. अब मोदी को सॉफ्टी बनना चाहिए, यह ज्ञान उन्हें कब और कहाँ से मिल गया?

भाई कह भी कौन रहा है हिन्दु हित में बात करने को, और हिन्दू का पक्ष लेने को. हम तो राष्ट्र-हित में ही काम करने की बात कह रहे हैं.

हाँ, यह अलग बात है कि एक हिन्दु ही है जो राष्ट्र-हित में अपना हित देखता है.

यह विरोध करने का विषय नहीं है, संवाद करने का विषय है. मोदी भी मनुष्य ही हैं. प्रभाव और दबाव उनपर भी काम करता है.

जिन्हें दबाव बनाने आता है उन्होंने उनपर पॉलीटिकल करेक्टनेस का दबाव बना कर उनकी दिशा ही बदल दी.

हम दबाव बनाने से, बल्कि संवाद करने से भी कतराते रहे. हमें लगता है जैसे मोदी का समर्थन कोई शीशे का बर्तन है… ज़रा से दबाव में चकनाचूर हो जायेगा.

भाई, साल भर समय है. विरोध करने का समय नहीं है, पर मुखर संवाद करने का समय है. स्पष्ट बोलिये, क्या न्यूनतम अपेक्षाएँ हैं… तभी मिलेगा.

जनमत का प्रभाव होता है. सोशल मीडिया को प्रयोग करके हमने काँग्रेस को हटाया था ना… इसके ही प्रयोग से हम मोदी को वापस अपनी दिशा में मोड़ सकते हैं.

अपनी शक्ति पर भरोसा कीजिये… अगर साल भर में कुछ सकारात्मक और मज़बूत निर्णय निकलवा सके तो उनके सहारे 2019 में जनता तक जा पाएँगे.

वरना जनता के सामने भक्ति नहीं बिकने वाली… आखिर जनता को आखिरी साल ही याद रहता है…

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