अब ‘गाँधी’ की जगह ‘मोदी’ नाम की आड़ में सरल मार्ग अपना रहा है हिन्दू

वह हिन्दू समाज ही था जिसने ‘मोहनदास गाँधी’ को महात्मा बनाने का भार अपने कन्धों पर लाखों लाशों के रूप में ढोकर भी उन्हें महात्मा ही बनाये रखा.

लाहौर जैसे हिन्दू-सिख बाहुल्य नगर के व्यापारी अंतिम समय तक मोहनदास के झांसे में ही थे.

ऐसा नहीं है कि उस समय युगद्रष्टाओं की कमी थी या विद्वान लोग समय की नाड़ी की गति नहीं पढ़ पा रहे थे.

समस्या यह थी कि हिन्दू अपने युगद्रष्टाओं की बात सुनने, मानने और क्रियान्वयन करने के लिए तैयार नहीं था.

मानव स्वभावतः आसानी से सब कुछ प्राप्त करना चाहता है. जहाँ एक ओर विद्वानों के बताये मार्ग में कठिनता थी… तन, मन और धन का समर्पण था, वहीं दूसरी ओर गाँधी का मार्ग अत्यंत सरल था.

एक तरफ खून माँगा जा रहा था, दूसरी तरफ ‘चरखा चलाओ और आज़ादी लो’ का ‘ऑफर’.

अधिकांश लोगों को सरलीकृत मार्ग पसंद आया, यही गाँधी के प्रति अगाध अंधभक्ति का कारण था.

परिणाम भरत भूमि के तीन खंड, करोड़ों हिन्दुओं का पलायन, लाखों की नृशंस हत्या और बलात्कार के रूप में मिला.

किसी भी समस्या को स्वीकार करने पर उसका हल भी खोजना पड़ता है. यदि समस्या औचित्य पर आसन्न संकट हो तो हल चरखा चलाने या ‘कमल’ का बटन दबाने जितने आसान कदापि नहीं होते.

रोज़ी – रोटी की दिहाड़ी में उलझे व्यक्ति को औचित्य से ज्यादा रोटी – दाल समझ में आती है; इसलिए उससे किसी भी प्रकार की अपेक्षा करना बेमानी है.

बड़े धनाड्य घरानों को अपने व्यापार से मतलब होता है… अब भामाशाह का समय लद गया (तब भी मात्र एक ही हुए थे).

कुल मिलाकर मध्यमवर्गीय प्रबुद्ध लोग ही इन विषयों से चिंतित होते हैं. 2014 में इस वर्ग ने औचित्य पर आसन्न संकट को समझा और पूरा ज़ोर लगवा कर मोदी सरकार बनवा दी.

अधिकांश लोगों को लगने लगा कि अब काम ख़त्म है… मोदी जी सब सम्हाल लेंगे…

यदि आप समस्या को स्वीकारेंगे तो कार्य करना होगा. मोदी जी का विकल्प खोजना होगा या मोदी के रहते ही सरकार पर दबाव बना कर हिन्दू हित के कार्य करवाने का तंत्र विकसित करना होगा.

वही गाँधी वाला हाल है… एक तरफ कुछ लोग कहते हैं कि तंत्र विकसित करो… संगठन बनाओ… जकात के समतुल्य धर्मनिधि खड़ी करो… प्रतिकार के साधन इकठ्ठा करो… युवाओं को प्रशिक्षित करो… आदि आदि;

वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग कहते हैं, मोदी को वोट दे दो, वह सब ठीक कर देगा. वोट देना अति आसान है दूसरा मार्ग अति कठिन… समय और धन का निवेश अलग से.

इतिहास फिर मुहाने पर खड़ा स्वयं को दोहरा रहा है… हिन्दू अब ‘गाँधी’ के स्थान पर ‘मोदी’ नामक बड़ी इमारत की आड़ में सरल मार्ग अपना रहा है.

मूल कार्य से फिर जी चुराया जा रहा है… इतिहास फिर स्वयं को दोहराएगा. हमें अपनी गलती की सज़ा फिर भोगनी होगी.

इस बार न जाने कौन सा हिस्सा कटेगा… कितनों का बलात्कार होगा… न जाने कितनी लाशों को फिर मुखाग्नि प्राप्त नहीं होगी… देश कटने के बाद हिन्दुओं के लिए कुछ बचेगा भी या हिन्द महासागर में ही शरण लेनी पड़ेगी…

यह सब समय के गर्भ में छिपा है, पर आज हमारे हाथ में हैं… आइये इतिहास से सबक लेते हुए किसी व्यक्ति विशेष के पीछे चलकर अपना सर्वस्व दाँव पर लगाने से बचा जाए.

हमें अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी इस तथ्य को स्वीकारा जाए… किसी की अंधभक्ति त्याग कर, संगठन… प्रशिक्षण… धर्मनिधि… हिन्दू तंत्र के विकास में तन, मन और धन का निवेश किया जाए. यही गज़वा-ए-हिन्द से बचने की काट होगी!

जयति जय हिन्दूराष्ट्रम… जय श्री राम… जय महाकाल

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