हम देश की बौद्धिक क्षमता को कहाँ पर ले कर आ गए!

अभी हाल मे ही JEE की परीक्षा के परिणाम आए हैं. जैसे उम्मीद थी सभी शिक्षण संस्थाएं अपनी स्वयं की पीठ थपथपाने लग गयी हैं कि हमारे अमुक अमुक बच्चे आज चुने गए हैं.

मेरी जानकारी में किसी भी संस्था ने यह नहीं कहा कि बच्चे में काबिलियत या योग्यता को हमने निखारा है. या किसी भी संस्था ने बच्चों और अभिभावकों को धन्यवाद किया ही कि वह उनके बताए मार्ग पर चले.

सब का यह कहना है कि हमने अपने बच्चे को पढ़ाया है तो यह सफलता पायी है. जबकि आज भी देश के सर्वोच्च शिक्षण संस्थाओं में ऐसे अध्यापक हैं जिनके स्वयं के पुत्र पुत्री बीते वर्षों में इस प्रकार की परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हुए हैं.

मुझे प्रसन्नता है कि कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिन्होने सार्वजनिक रूप से अपने परिवार वालों के दिये सहयोग को अपनी सफलता का कारण बताया है. वास्तव में बच्चे के उत्तीर्ण होने में सर्वाधिक योगदान उसके स्वयं का है. उसके बाद उसके परिवार मित्रगण और अध्यापक आते हैं. पर चलिये यह को शिक्षा के व्यवसायीकरण की देन है.

मेरा दर्द कुछ और है. अधिकांश शिक्षाविद इस बात को मानते हैं कि वर्ष दर वर्ष JEE के प्रश्न पत्रों का स्तर नीचे गिर रहा है. अधिकांश उद्दयोगपति जिसमे श्री नारायणमूर्ति जैसे दिग्गज भी आते हैं कि देश की बौद्धिक क्षमता मे गिरावट आई है.

और यहाँ तक माना जाता है कि लगभग 80% से अधिक अभियन्ता (ENGINEER) किसी भी प्रकार के रोजगार के लिए उपयुक्त नहीं हैं. अब आप बीते वर्षों से यदि देखें तो प्रश्न पत्र का स्तर नीचे होने के बाद भी उत्तीर्ण अंकों का स्तर गिरता जा रहा है.

2013 में जो समान्य वर्ग का युवक 113 अंकों पर उत्तीर्ण होता था अब अगले वर्षों में 115, 105, 100, 81, और इस वर्ष 74 पर आ गया है. यही स्थिति अब पिछड़े वर्ग में 2013 में 70, 74, 70, 70, 49, 45 2018 में हो गयी है.

अनुसूचित जाति में आज 360 में से 29 अंक लाने वाला उत्तीर्ण हो रहा है यानि मात्र 8% अंक वाले तो आज देश के अभियन्ता वर्ग में लाने को तयार है. अनुसूचित जन जाति में यह स्थिति 2013 में 45 से आज 24 अंकों पर आ गयी है.

दिव्यांगों को तो हमने शून्य से -35 पर ही उतीर्ण मान लिया है. पूरे देश में सवर्णों और दलितों का युद्ध राजनीति करवाती रही है और देश कहाँ गया?

आप इस वर्ष को ही देखें तो लगभग 10.5 लाख बच्चों में से 8.3 लाख बच्चे विज्ञान संकाय की इस परीक्षा में यदि सभी को समान्य वर्ग का ही मान लिया जाये तो भी, 8.3 लाख बच्चे 20% प्रतिशत अंक नहीं प्राप्त कर सके.

उसके साथ ही बच्चे बोर्ड में 90% से अधिक अंकों से उत्तीर्ण हो रहे हैं. आज मैं जहां कुल्लू में हूँ यहाँ पर कुछ छत्र ऐसे भी हैं जो बोर्ड की मेरिट तक में आए हैं जिसका अर्थ पूरे हिमाचल में उच्च 10 स्थानों में से एक ओर वही लोग इस परीक्षा में उत्तीर्ण तक नहीं हुए.

हम देश की बौद्धिक क्षमता को कहाँ पर ले कर आ गए हैं. आज से आप पाँच वर्ष पहले ही देखिये, उस समय के बाद से कितने कोचिंग संस्था खुल गए कितने लोग इस व्यवसाय में जुड़ गए हैं. आज यह शिक्षा का व्यवसाय आप देखें तो दो लाख करोड़ से अधिक है.

ASSOCHAM के अनुसार यह व्यवसाय 35% वार्षिक दर से बढ़ रहा है. पूरे देश का केंद्र सरकार का बजट 20 लाख करोड़ का है. इस पर आज के शिक्षण व्यवसाय को गर्व करना चाहिए या शर्म, मुझे कहना नहीं आ रहा है.

आज आप सभी सोशल मीडिया पर कुछ मीडिया से बनाई वीडियो का प्रसारण करते हैं कि देखों देश के सरकारी शिक्षक उत्तर प्रदेश और बिहार में कैसे कैसे हैं. चलिये सरकार तो कामयाब नहीं हुई पर यह निजी संस्थान कहाँ पर पहुँच गए. क्या देश की सरकार को न्यूनतम अंक तय नहीं करने चाहिए. अब सरकार की भी मजबूरी है कि सभी निजी इंजिनीयरिंग कॉलेज जिनको मान्यता दी गयी है अधिकांश मंत्रियों के ही है.

मेरी विनती आप सब से हैं कि जिस रास्ते से भी हो सके इस पर कुछ काम करें. यह प्रश्न हटा दीजिये की मेरा बच्चे अधिक आए हैं और आपके कम हैं. और एक विशेष बात हम सब अच्छी तरह समझते हैं चाहे व्यवसायीकरण के नाम पर चुप रहें जिस बच्चे के लगभग 200 से कम अंक हैं उसकी JEE ADVANCE की परीक्षा लगभग निरर्थक है. शिक्षा का सही अर्थ समग्र विकास है, कम से कम उनके विषयों को तो बेहतर करें.

मैंने अपने मित्र Raghava Varma जी से IIT मुंबई में पूछा था कि आप के यहाँ अध्यापन काम बहुत उच्च स्तर का है. उनका उत्तर था कि हमें बच्चे उच्च बुद्ध कौशल के मिलते हैं हमें अधिक श्रम नहीं करना पड़ता.

आज सोचता हूँ यदि IIT या किसी भी इंजीन्यरिंग कॉलेज में -35 अंक का छात्र आएगा तो वह अध्यापकों के लिए स्वयं चुनौती बन कर आएगा. मेरे अन्य मित्र Mohit Saxena जो पढ़ाते हैं उन्होने ने जो बच्चा बिना helmet के दुपहिये से आता है उसे पढ़ाने से माना कर दिया. कम से कम छात्रों में कुछ सकरात्मक संदेश आता है.

वहीं हमारी दादी की रसोई में Anoop Khanna में जो व्यक्ति ठीक से अपनी रिक्शा, साइकिल स्कूटर खड़ा नहीं करता उसे भोजन नहीं दिया जाता. शायद जिनको मना किया जाये उनके अहम को चोट भी लगे परंतु यह है देश के लिए सकारात्मक काम. समस्त शिक्षण क्षेत्र से जुड़े लोगों से मेरा अनुरोध है आइये सकारात्मक काम करें.

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