क्या उन 63 प्रतिशत बेरोज़गारों को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाए?

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव द्वारा गौपालन से रोज़गार तथा नौकरी के लिए सालों तक नेताओं के आगे पीछे चक्कर लगाने के बजाय पान की दुकान खोल लेने को बेहतर विकल्प बताए जाने पर न्यूज़ चैनली मरघटों पर ऐसा सियासी विलाप प्रारम्भ हुआ मानो विप्लv देव ने कोई महापाप कर दिया हो.

इन्हीं न्यूज़ चैनली मरघटों पर ऐसा ही सियासी विधवा विलाप कई दिनों तक तब भी हुआ था जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पकौड़े की दुकान का ज़िक्र भी रोज़गार के एक साधन के रूप कर दिया था.

न्यूज़ चैनली मरघटों पर तब हुआ और अब पुनः हो रहा सियासी विधवा विलाप ज़मीनी सच्चाई से कितना दूर, कितना थोथा, कितना असत्य है तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या फिर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव की नीति और सलाह, सत्य के कितने करीब और वास्तविक है…

इसका ज्वलन्त साक्ष्य हैं ये तथ्य.

यूपीए शासनकाल में हुई पिछली जनगणना में यह तथ्य उजागर हुआ था कि देश में कुल बेरोज़गारों की संख्या लगभग 11.6 करोड़ है. इसमें लगभग 3.2 करोड़ बेरोजगार अनपढ़ थे तथा लगभग 8.4 करोड़ बेरोजगार पढ़े लिखे थे.

यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इन 8.4 करोड़ पढ़े लिखे बेरोजगारों में से लगभग 4.1 करोड़ बेरोजगार ऐसे थे जो पढ़े लिखे की श्रेणी में तो थे किंतु कक्षा 10 पास नहीं थे. तथा लगभग 2.7 करोड़ बेरोजगार ऐसे थे जो कक्षा 10 पास थे लेकिन उनकी शैक्षिक योग्यता स्नातक की नहीं थी.

और 1.1 करोड़ बेरोजगार ऐसे थे जिनके पास स्नातक या उससे उच्च शैक्षिक योग्यता थी. 1.1 करोड़ बेरोजगारों की इस संख्या में तकनीकी डिग्री/डिप्लोमा वाले बेरोजगारों की संख्या भी शामिल थी.

अतः स्वयं यूपीए सरकार के कार्यकाल में हुई जनगणना के आधिकारिक आंकड़े यह बताते हैं कि देश के 11.6 करोड़ बेरोजगारों में से लगभग 7.3 करोड़ (लगभग 63%) बेरोजगार ऐसे थे जो या तो अनपढ़ थे या जिनकी शैक्षिक योग्यता कक्षा 10 से कम थी.

यह आंकड़े 2011 में हुई जनगणना के हैं. मई 2014 तक देश में कांग्रेसी यूपीए का ही शासन रहा. अतः स्वाभाविक है कि उपरोक्त स्थिति में कोई बहुत बड़ा या क्रांतिकारी बदलाव नहीं हुआ होगा बल्कि समस्या और ज्यादा बढ़ी ही होगी.

अतः मई 2014 में सत्ता सम्भालने के बाद मोदी सरकार उन 63% अनपढ़ या फिर कक्षा 10 से भी कम की शैक्षिक योग्यता रखने वाले 7.3 करोड़ बेरोजगारों को सरकारी या निजी क्षेत्र में कौन सी नौकरी दे देती?

क्या मोदी सरकार उन 7.3 करोड़ बेरोजगारों को भूखा मरने के लिए छोड़ देती?

यह सवाल उन सियासी और मीडियाई धूर्तों के मुंह पर एक थप्पड़ की तरह है जो कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पकौड़े की दुकान से रोज़गार के ज़िक्र पर तो कभी त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव द्वारा गौपालन या पान की दुकान से रोज़गार के ज़िक्र पर अश्लीलतम ताण्डव करते रहे हैं. 50 हज़ार या उससे कम की राशि के मुद्रा लोन द्वारा भी रोज़गार दिए जाने की प्रधानमंत्री नीति का मज़ाक उड़ाते रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव सरीखी उपरोक्त सोच ने क्या और कैसे परिणाम दिए हैं, इसकी एक झलक दो दिन पूर्व नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने दी है.

सम्भवतः जून माह के अन्तिम सप्ताह में नीति आयोग सारे तथ्यात्मक दस्तावेजों के साथ सम्पूर्ण परिणाम देश के सामने प्रस्तुत करने वाला है. विश्वास रखिये कि वह परिणाम देश को सुखद आश्चर्य में सराबोर कर देंगे.

क्योंकि मई 2014 में देश को 7.3 करोड़ अनपढ़ और अल्पशिक्षित बेरोजगारों की जो फौज कांग्रेसी यूपीए की सरकार सौंप कर गयी थी उसमें बड़ा सुखद परिवर्तन देश को दिखेगा.

लेकिन इससे भी इतर मेरे सवाल कुछ और हैं.

क्या जो लोग किन्हीं कारणों से बिल्कुल पढ़ लिख नहीं सके या जो अल्प शिक्षित रह गए, क्या उन्हें जीवन जीने का अधिकार नहीं है?

क्या उनको दो वक्त की रोटी कमाने के अवसर और सहायता देने की सरकारी नीति कोई पाप है?

क्या सरकार को उन 63% बेरोजगारों के सामने या सन्दर्भ में कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सरीखे रोजगार के साधनों का जिक्र करना चाहिए?

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