इसे कहते हैं वास्तविक सेक्युलरिज्म और सर्वधर्म समभाव की विलक्षण विरासत

आज उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ प्रभु हनुमान जी के भक्ति रस से सराबोर है.

लगभग सभी देवालयों समेत राजधानी के केवल प्रमुख मार्ग ही नहीं अपितु कॉलोनियों और मोहल्लों की हर छोटी-बड़ी सड़क विभिन्न प्रकार के भंडारे व शर्बत वाले स्टालों से सजी हुई हैं.

अगाध हनुमान भक्ति के इस महा आयोजन में राजधानी के हर वर्ग की भागीदारी होती है. प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह के प्रत्येक मंगलवार को राजधानी लखनऊ इसी प्रकार हनुमान भक्ति रस में सराबोर होती है.

राजधानी लखनऊ में मनाया जाने वाला बड़ा मंगल सिर्फ हिन्दू धर्म की आस्था का प्रतीक ही नहीं है बल्कि विभिन्न धर्मों के लोगों की भी इसमें आस्था है. इस आयोजन में सभी धर्मो के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

राजधानी में हनुमान भक्ति की परम्परा की यह अनुपम शुरुआत लगभग 4 शताब्दी पूर्व लखनऊ के मुगल शासक नवाब मोहम्मद अली शाह की बेगम रूबिया ने की थी.

नवाब मोहम्मद अली शाह का बेटा एक बार गंभीर रूप से बीमार हुआ. उनकी बेगम रूबिया ने उसका कई जगह इलाज कराया लेकिन वह ठीक नहीं हुआ.

बेटे की सलामती की मन्नत मांगने वह अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर आयी. पुजारी ने बेटे को मंदिर में ही छोड़ देने को कहा. बेगम रूबिया ने रात में बेटे को मंदिर में ही छोड़ गयीं.

दूसरे दिन रूबिया को बेटा पूरी तरह स्वस्थ मिला. तब रूबिया ने इस पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया. जीर्णोद्धार के समय लगाया गया प्रतीक चांदतारा का चिन्ह आज भी मंदिर के गुंबद पर चमक रहा है.

मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ ही मुगल शासक ने उस समय ज्येष्ठ माह में पड़ने वाले मंगलवार को पूरे नगर में गुड़धनिया (भुने हुए गेहूं में गुड़ मिलाकर बनाया जाने वाला प्रसाद) बंटवाया और प्याऊ लगवाये थे. तभी से इस बड़े मंगल की परम्परा की नींव पडी.

बड़ा मंगल मनाने के पीछे एक और कहानी है. नवाब शुजा-उद-दौला की दूसरी पत्नी जनाब-ए-आलिया को स्वप्न आया कि उसे हनुमान मंदिर का निर्माण कराना है.

सपने में मिले आदेश को पूरा करने के लिये आलिया ने हनुमान जी की मूर्ति मंगवाई. हनुमान जी की मूर्ति हाथी पर लाई जा रही थी.

मूर्ति को लेकर आता हुआ हाथी अलीगंज के एक स्थान पर बैठ गया और फिर नवाब के सैनिकों के भरसक प्रयासों के बावजूद उस स्थान से नहीं उठा.

अतः इसे हनुमान जी की मंशा का संकेत मानकर आलिया बेगम ने उसी स्थान पर मंदिर बनवाना शरू कर दिया जो बेगम रुबिया द्वारा निर्मित पुराने हनुमान मंदिर के निकट ही स्थित है और जिसे अब नए हनुमान मंदिर के रूप में जाना जाता है.

मंदिर का निर्माण ज्येष्ठ महीने में पूरा हुआ. मंदिर बनने पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करायी गयी और बड़ा भंडारा हुआ.

तभी से जेठ महीने का हर मंगलवार बड़ा मंगल के रूप में मनाने की परम्परा चल पड़ी. चार सौ साल पुरानी इस परम्परा ने इतना वृहद रूप ले लिया है कि अब पूरे लखनऊ के हर चौराहे व हर गली पर भंडारा चलता है.

सबसे सुखद आश्चर्य की बात यह है कि ज्येष्ठ माह के प्रत्येक मंगलवार को राजधानी का यह नज़ारा स्वतः स्फूर्त होता है. इस आयोजन से ना कोई संगठन जुड़ा है ना कोई संस्था ना ही सरकार.

प्रस्तुत चित्र लगभग 400 वर्ष पूर्व रूबिया बेगम द्वारा निर्मित मंदिर में स्थापित प्रभु हनुमान जी की उसी दिव्य प्रतिमा का है.

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