क्यों कहते हैं आप कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता? देखिये कैसे हो सकता है

अक्सर देखता हूँ कि जहां भी कोई ज्वलंत मुद्दा चर्चा में आता है, उस पर कोई न कोई बुझी बुझी सी प्रतिक्रिया आती है – इस देश का कुछ हो नहीं सकता, या हिंदुओं का कुछ हो नहीं सकता, इत्यादि इत्यादि.

आप के बीच ईसाई मिशनरी घूमते हैं, बकरे ढूंढ लेते हैं. आप के बीच वामपंथी घूमते हैं, बकरे ढूंढ लेते हैं. दोनों अपने अपने बकरों को समय के साथ आप के विरोध में भेड़िये बनाते हैं.

ऐसा क्या करते हैं वे?

क्या ईसाई मिशनरी हाथों में नोटों की गड्डी लिए ‘आओ, आओ, पैसे ले लो, ईसाई बन जाओ’ की आवाज़ लगाते घूमते हैं?

नहीं ना?

वामी भी किस वजह से यशस्वी होते हैं? यही राज़ समझा रहा हूँ. ध्यान से पढ़िये.

शायद आप ने इस बात पर सोचा नहीं है. यहाँ एक बात बताता हूँ, जो ऐसे कामों में बहुत महत्व की है.

क्या आप ने कभी सेल्स में काम किया है?

यहाँ भी दुकान या शोरूम के सेल्समैन और घुमन्तू सेल्समैन के बीच बड़ा फर्क समझिए. दुकान में आने वाला हर व्यक्ति ग्राहक बनकर ही आता है, भले आज नहीं तो कल खरीदे.

वो पहले ही ख़रीददारी का मन बना चुका है, कैरम की गोटी पॉकेट में जाने को बेताब है, बस हल्का सा धक्का देना होता है कि वो आप के दुकान में ही ख़रीददारी करे.

घुमंतू सेल्समैन का काम तुलना में बहुत कठिन है. सौ कॉल्स में पाँच ग्राहक की दर अच्छी मानी जाती है. उसे सब से पहले तय करना है कि उसका ग्राहक कौन बनेगा, क्या उसमें ग्राहक बनने की योग्यता और क्षमता है?

फिर उसे ढूँढना है, उसके साथ संवाद स्थापित करना है. उपेक्षा और अपमान भी झेलने पड़ते हैं, फिर भी काम तो करना है, सफल होना ही है क्योंकि पैसे उसके ही मिलेंगे तभी घर चलेगा.

यही काम वामी और ईसाई मिशनरी करते हैं. उनका मोटिवेशन होता है कि यह करना ही है.

जहां मोटिवेशन की बात आती है वहाँ वो दोनों तरह का होता है. सेल्समैन उसे कमीशन और इन्सेंटिव को देखकर सकारात्मक ढंग से देखे या फिर नौकरी से निकाले जाने के डर से जोड़कर नकारात्मक ढंग से देखे. दोनों ही प्रसंगों में उसे मेहनत करनी ही है.

नकारात्मक ढंग से देखेगा तो जॉब बचाने के लिए 100% मेहनत करेगा, सकारात्मक ढंग से देखेगा तो 200% मेहनत करेगा. किसी भी हालत में 100% से कम मेहनत तो नहीं ही करेगा.

यह आप को इतने डीटेल में क्यों बताया यह अगर अब तक समझ में नहीं आया हो तो जान लीजिये कि ईसाई और वामियों के आने से आप कम से कम 100% मेहनत वाली कैटेगरी में ऑटोमैटिकली आ चुके हैं और अगर आप को अपनी ज़मीन और पहचान बचानी है तो 100% मेहनत करनी ही होगी. वे आप के बीच आकर 300% मेहनत करते हैं और इस देश का कानून उन्हें ऐसा करने का हक़ देता है.

आप सरकार से यह कानून बदलाव की अपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि यह केवल 31% वोटरों की सरकार है यह एक कानूनी वास्तविकता है, और अपने हकों को ले कर आप सुस्त हैं, लेकिन आप के विरोधी – शत्रु बहुत जागरूक हैं, तुरंत जन आंदोलन खड़ा कर देते हैं.

आप सुस्त हैं इसीलिए तो काँग्रेस आप के विरुद्ध इतने षडयंत्रों को कानून का जामा पहना चुकी है. अब उनका उलटना कठिन इसलिए हैं क्योंकि वे कानून केवल आप का नुकसान नहीं कर रहे बल्कि अपने विरोधियों को उसका लाभ दे रहे हैं.

वे लाभ उनके कानूनन हक़ बन गए हैं, और वे अपने हकों को लेकर सर्वाधिक जागरूक रहते हैं. जन आंदोलन से निपटना आसान नहीं, आप लोग ही सरकार पर दबाव डालने लगेंगे उनकी मांगें मानने के लिए. कंधार प्लेन हाईजैक के समय दबाव लाने वाले सभी यात्री हम में से ही थे.

इसलिए हमें उन्हें प्रतिस्पर्धी जानकर नियमों की चौखट में लड़ना होगा. लड़ सकते हैं, नियमों ने हमें इतना भी बंधक नहीं बनाया अभी.

वैसे, सेल्स में सब लोग नहीं जाना चाहते क्योंकि उन्हें नकारे या दुतकारे जाने का डर होता है. नकार उन्हें स्वीकार नहीं होता इसलिए वे सेल्स में कभी नहीं जाना चाहते. लेकिन ऐसा भी नहीं कि उनमें संवाद की क्षमता नहीं होती.

तो मेरे हिन्दू मित्रों, आप अभी 100% वाले सेल्समैन हैं अगर आप को अपनी ज़मीन, पहचान और अस्तित्व बचाना है. 200% और 300% वाले सेल्समैनो से आप की संख्या आज बहुत अधिक है इसलिए कम से कम 150% मेहनत करना आप के लिए ज़रूरी है.

भर्तृहरि, नीति शतक में एक उपमा देते है – गूलर के पके फलों में मृत कीड़े दिख जाते हैं. उनकी पूरी दुनिया ही वो फल के बाहर नहीं होती, वहीं पैदा होकर वहीं मर जाते हैं, उसके इतर भी दुनिया है यह उनको पता नहीं होता.

इसलिए कृपया यह न कहिए कि इस देश का या हिंदुओं का कुछ हो नहीं सकता. देश और हिन्दू समाज बहुत बड़ा है. गूलर फोड़कर बाहर आइये, प्रयास कीजिये संवाद का. आज की तारीख में आप पाएंगे कि लोग संवाद करने को उत्सुक हैं.

अहंकार और पूर्वाग्रह की बलि दे कर निकलिए, संवाद में सफलता इनकी बलि हमेशा मांगती रही है और मांगती रहेगी. अपने अहंकार और पूर्वाग्रह की बलि चढ़ाना आप के हाथ है, अन्यथा आप के बलि चढ़ेगी उसे रोकना आप के हाथ नहीं है यह अभी जान लीजिये.

सरकार के नाम से रोना-पीटना शुरू करने से पहले इस लेख को दुबारा पढ़िये. पंख उगाइये, चोंच और नाखून भी उगाइये, ब्रॉयलर चिकन न बने रहिये.

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