समय समय के बुद्ध

मैंने ईश्वर को नहीं देखा. न ही स्वर्ग को देखा है. मैं भविष्यवादी होकर कर्म नहीं करता. मैं नितांत वर्तमान को सत्य मानता हूं और ये मानता हूं कि मेरा स्वर्ग नरक सदैव मेरे हाथ में है.

और यदि ये सृष्टि नाशवान है असार है और माया मात्र है, तब भी ईश्वर ने कुछ सोच कर ही रचा होगा. यदि मैं इसे मिथ्या मानते हुए बुद्ध की तरह अपने गृहस्थ और राज धर्म के छोड़ कर ज्ञान की खोज में निकल भी जाऊं तब भी ईश्वर इस सृष्टि संचालन के अपने कर्तव्य से नहीं हटेगा. बल्कि मेरे पलायन से उसे मेरे कर्तव्यों का वहन भी करना पड़ेगा.

तो मुझे ऐसे बुद्धत्व की कोई चाह नहीं जो पलायन से उपजता हो.

अब बात अहिंसा की, तो बुद्ध की अहिंसा उस समय के हिसाब से ठीक रही होगी बुद्ध का अंगुलीमाल शायद कोई भला इंसान रहा होगा जिसका विश्वास रहा होगा वार्तालाप में.

कोई पत्नी पीड़ित जो फ्रस्ट्रेशन में अंगुलिमाल बन बैठा हो शायद. कही अंदर पुरानी मानवता रही थी अभ्यास रहा होगा सुनने का, तभी तो उसने बुद्ध का ज्ञान सुना.

वरना कौन सुनता है किसी का ज्ञान स्वयं भगवान कृष्ण की नहीं सुनी दुर्योधन ने. रावण ने नहीं सुनी राम की. और बुद्ध की सुनी जा रही है. कमाल की बात नहीं है?

खैर मेरे सामने अंगुलिमाल नहीं है मेरा सामना ऐसे धर्मान्धों से हैं जिनका धर्म मेरे अस्त्तित्व को ही नकारता है. मेरे अंगुलिमाल मेरी नहीं सुनेंगे. मेरे लिए बुद्ध की अहिंसा पद्धति अपने अस्तित्व की आत्महत्या है.

मैं बुद्धम शरणं गच्छामि की कामना नहीं करता…
मेरे काल की परिस्थितियां तो मुझे कहती है –

युद्धम शरणं गच्छामि
कर्तव्यम शरणं गच्छामि
साहसम शरणं गच्छामि
धर्मम शरणं गच्छामि।

मुझे बुद्ध के बुद्धत्व की चाह है पर बुद्ध के पलायनवादी मार्ग से नहीं…

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