हिन्दुओं को देश छोड़कर भागना पड़ा, तो कहीं मिल भी सकेगी शरण?

पत्रकार तवलीन सिंह को लगता है सेक्युलर कीड़े ने काट लिया है. आजकल उनके हर लेख में हिन्दू और गौरक्षक निशाने पर होते हैं.

ये सेक्युलर रोग बेहद खतरनाक है, यह आपके सोचने समझने की शक्ति को छीन लेता है, दृष्टि में दोष कर देता है, नज़र का संतुलन बिगाड़ देता है, ऐसे में किसी को पास का दिखना बंद हो जाता है किसी को दूर का.

आजकल तवलीन सिंह को सिर्फ हिन्दुओं के कारनामे नज़र आने लगे हैं.

उनको सिर्फ गौरक्षक दिख रहे हैं, मगर गौभक्षकों की हैवानियत नहीं दिख रही.

उन्हें यह नहीं दिख रहा कि सेक्युलरता दुनिया के किसी भी मुस्लिम मुल्क में नहीं है.

अरे, यह सेक्युलरता देश तो छोड़ो किसी मुस्लिम मोहल्ले में भी नहीं हो सकती.

तवलीन सिंह को 1400 साल का अरब से उपजा बर्बर इतिहास नहीं पता, मगर वे चार साल के भारत के इतिहास का विश्लेषण करने में अपनी विद्वता दिखाना चाहती हैं.

उन्हें कठुआ के लिए हिन्दुओं का आक्रोश नज़र आ रहा है, मगर मदरसे में हुई एक मासूम के साथ बलात्कार पर हिंदुस्तान के मुसलमानों की प्रतिक्रिया नज़र नहीं आती.

हिन्दू कठुआ काण्ड में किसी षड्यंत्र की संभावना को लेकर आक्रोशित हैं जबकि मुसलमान एक मासूम पीड़ित बच्ची को जिस तरह से ‘भाभी’ आदि शब्दों के व्यंग्य से घायल कर रहे हैं वो अकल्पनीय है असहनीय है! मगर इस पर तवलीन की कलम नहीं चलेगी.

तवलीन सिंह आप को पता है, पाकिस्तान क्यों बना, कश्मीर क्यों हिन्दू विहीन हुआ और केरल-बंगाल उसी राह पर कैसे आगे बढ़ रहे हैं?

एक लघुकथा पढ़ी होगी, जिसमें किसी घर में एक सामान्य सज्जन परिवार किसी अन्य ज़रूरतमंद परिवार को शरण देता है मगर कुछ दिनों बाद वही शरणार्थी परिवार उस मकान पर कब्जा करने का प्रयास करने लगता है.

रोहिंग्या यही कर रहे हैं या करने वाले हैं. असंख्य बांग्लादेशी यह काम करते आये हैं. जिस बर्थ पर आप को थोड़े समय के लिए किनारे बैठने दिया गया है उसी बर्थ पर आप लेट जाते हैं तो वो यात्री क्या करे, विरोध भी ना करे?

और अगर वो इस जबरन कब्ज़े का विरोध टीटी से करे और टीटी को भी सेक्युलरता का रोग हो तो वो भी यात्री को ही दोषी ठहरा सकता है.

तवलीन सिंह, क्या आप जानती हैं यह रोहिंग्या क्यों बर्मा से भगाये गए या भाग रहे हैं? थोड़ा अपनी विद्वता इस को समझने में भी तो लगाइये. वैसे इसे समझना कोई बहुत मुश्किल नहीं बशर्ते आप समझना चाहें.

श्रीलंका में क्या हुआ? आखिर दुनिया के हर विकसित देश में सिर्फ मुसलमानों के साथ ही समस्या क्यों होती हैं?

सवाल कई हैं तवलीन सिंह और उनके जवाब भी हैं, मगर उन्हें आप अपने लेख में जगह नहीं देती.

हिन्दुओं को हर मानव से प्यार है, हमारी विचारधारा में तो विश्वबंधुत्व मूल में है, मगर उस विचारधारा का क्या करें जो अपनों के अलावा हरेक को काफिर घोषित कर देती है. और काफिरों के साथ क्या होता रहा है, यह अब बच्चा-बच्चा जानता है सिर्फ सेक्युलर गिरोह नहीं समझना चाहता.

आज हिन्दुस्तान स्वयं को काफिर होने से बचने के लिए संघर्ष कर रहा है. यह उसके अस्तित्व की लड़ाई है.

ईरान से जब पारसी भागे थे या भगाये गए थे तब उन्हें हिन्दुस्तान ने शरण दी थी. भगवान ना करे कि हिन्दुस्तान से हिन्दुओं को भागना पड़े, और अगर भविष्य में ऐसा होता है तो उन्हें दुनिया में दो गज ज़मीन भी नहीं मिलेगी.

कुछ सत्य बेहद कड़वे होते हैं मगर सत्य तो फिर सत्य है उसे झुठलाया नहीं जा सकता.

आज हिन्दू अपने ही हिन्दुस्तान में इसी दो गज ज़मीन के लिए चिंतित है. और तवलीन सिंह, उसकी चिंता आधारहीन नहीं.

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