क्या निजी क्षेत्र ही सार्वजनिक क्षेत्र का विकल्प है?

ऐसा माना जाता है कि निजी क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र की अपेक्षा हमेशा ही बेहतर रहता है.

शिक्षा विभाग अपने सरकारी स्कूल में अध्यापकों को 40 हजार वेतन देकर भी स्कूल आबाद नहीं कर पाता, वहीं निजी क्षेत्र के स्कूलों में 40 हजार में चार टीचर रख के भी करोड़पति परिवारों को एडमिशन के लिए भरी गर्म दोपहरी मे स्कूल के द्वार पर लाइन में लगने को मजबूर कर देते हैं.

यूपी में मायावती ने यमुना एक्सप्रेस वे को जेपी ग्रुप को सौंप दिया, पूरे भारत में उस रोड की क्वालिटी की दूसरी रोड शायद ही हो.

आगरा में बिजली टोरेंट नाम की निजी क्षेत्र की कम्पनी देख रही है, भले ही शहरवासी कितनी भी हाय हाय करें लेकिन आगरा वाले उपभोक्ताओं की स्थिति पूरे प्रदेश में बेहतर है.

कहने का मतलब है कि ऐसे हजारों उदाहरण हैं जिनसे निजी क्षेत्र का प्रबंधन सार्वजनिक क्षेत्र से बेहतर साबित किया जा सकता है.

लेकिन क्या निजी क्षेत्र ही सार्वजनिक क्षेत्र का विकल्प है?

किसी को उत्तर प्रदेश सेतु निगम की याद है क्या? जिसकी गुणवत्ता के कारण अरब देशों तक में निर्माण के ठेके मिले थे…

HMT घड़ी की तो याद होगी ही जिसकी क्वालिटी के आगे जापानी घड़ियाँ भी पानी मांगती थीं…

यूपी का ही अपट्रोन टीवी, कितना सस्ता और विश्व स्तरीय क्वालिटी का था… सेना का निशान ट्रक, ध्यान है क्या इसकी क्वालिटी का?

बात निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की नहीं, बात है किसी संस्थान के प्रबंधन की गुणवत्ता की…

और यदि सार्वजनिक क्षेत्र का प्रबन्धन योग्य हाथों में हुआ तो क्या निजी क्षेत्र का कोई संस्थान उसका मुकाबला कर सकता है?

अभी लाल किले के रख रखाव के लिए लाल किला डालमिया को सौंपा गया है… किसी को टीस है तो किसी को संतोष है कि मोदी जी की सरकार में कोई भी काम उंगली उठाने लायक होगा ही नहीं…

कितना भला आदमी मानते हो इन टाटा अम्बानी अदानी डालमिया बिड़ला को…

AIIMS की कुछ व्यवस्थाएं टाटा को दी हुई हैं… पता है वहां क्या हालत है… जो जाँच बाजार में जानपहचान की लेकिन उच्च स्तरीय लैब पर 30 से 40% डिस्काउंट पर हो जाती हैं वो जांचें AIIMS में फुल रेट पर होती हैं…

अभी एक मित्र अहमदाबाद की कांकरिया झील का उदाहरण दे रहे थे कि उसका रख रखाव भी लाल किले की तरह निजी क्षेत्र को दिया हुया है…

तो क्या उस कांकरिया झील के लूट वाले रेट मालूम हैं… एक ट्रेन चलती है उसमें, उसकी टिकट की रेट भूख ख़त्म कर देती है, पिकनिक का सारा नशा उतार देती है.

भाई, प्राचीन स्मारक और महत्वपूर्ण स्थल सार्वजनिक क्षेत्र की चीज हैं, यदि इनको 5-5 साल के लिए निजी हाथों में सौंपा जा रहा है तो क्या सरकार ने ये मान लिया है कि सरकारी नौकरियों में सब नाकारा लोग ही भरे हुए हैं…

मतलब सरकार नाकारा लोगों को व्यर्थ में ही वेतन बाँट रही है… यानी कि मैनेजमेंट के योग्य कोई अधिकारीरे सरकार के पास है ही नहीं…

आज लाल किला डालमिया को सौंपा है… इसके अच्छे रिजल्ट आयेंगे फिर पूरे भारत के पुरातन स्थलों का रखरखाव किसी बिडला टाटा अम्बानी अदानी को सौंप देना… इनको अपनी ब्रांडिंग करनी है तो निश्चित ही हर जगह टॉप क्लास परफोर्मेंस देंगे…

फिर देश की संसद प्रदेशों की विधान सभाओं पुलिस सुरक्षा और सेना सभी को सौंप देना… गारंटी की बात है जो भी परफोर्मेंस आयेगा वो अब से कई गुना बेहतर होगा…

नौकरी के वादे की कोई चिंता मत करना… नौकरी आप सरकार वाले ना दो, तो वे प्राईवेट वाले देंगे ही देंगे… ना देंगे 50 हजार… दस हजार तो देंगे!

फिर लालकिले की प्राचीर से (अगर डालमिया ने भाषण की अनुमति दी तो!) मोदी जी आराम से भाषण दे कर तमाम संस्थानों की बेहतर होती हालत और नौकरियों को अपनी उपलब्धि के रूप में गिना सकते हैं.

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