क्या मोदी हमारे लिंकन बनेंगे?

आज मैंने अंग्रेज़ी में एक लेख लिखा था जिस पर कुछ लोगों के सन्देश आये कि मैं उसे हिंदी में लिखूं.

यह कार्य बड़ा कष्टदायक होता है क्योंकि अंग्रेज़ी में जो लिखा जाता है वह एक अलग तरुन्नम में लिखा जाता है और उसी बात को हिंदी में लिखने पर उसकी आत्मा कहीं न कहीं दब जाती है. यही तब होता है जब हिंदी में लिखे किसी लेख को अंग्रेज़ी में अनुवाद किया जाता है.

खैर लोगों के आग्रह को देखते हुये मैं अंग्रेज़ी में लिखे गये लेख का हिंदी अनुवाद डाल रहा हूँ जो बड़ा तो है ही, लेकिन शायद मूल लेख के साथ न्याय भी नहीं कर पाया है.

मैं कई बार यह लिख चुका हूँ कि मैं अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का प्रशंसक हूँ और मैं उन्हें महानतम व्यक्तित्वों में सबसे ऊपर रखता हूँ.

एक मात्र लिंकन ही थे जिन्होंने अमेरिका को 1861 में, कॉन्फेडरेट राज्यों के खिलाफ गृहयुद्ध में जाने के लिये मजबूर किया था.

उस काल में, यूनियन में (उस वक्त अमेरिका के उत्तरी बचे हुये हिस्से को यही कहा जाता था) ऐसे बहुत से लोग थे जो यह विचार रखते थे कि युद्ध से बचना चाहिये और कॉन्फेडरेट राज्यों को अलग जाने देना चाहिये.

लेकिन लिंकन इस के लिये बिल्कुल भी तैयार नही थे और उन्होंने इसके लिये युद्ध विरोधी हार्टफोर्ड के विलियम ईटन, ब्रिजपोर्ट के गोडसेल, न्यू हैवन के जेम्स गैलाहर, हार्टफोर्ड के ही राल्फ इंगरसोल और थॉमस सीमौर, ऑहियो के क्लेमेंट वैलनदीघम, समुर्ल कॉक्स, स्टीफेन कारपेंटर, विलयम फाउलर ऐसे प्रभावशाली सीनेटर्स, कांग्रेसमैन, लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को अपने पद के प्रभाव व कौशल से साधा था.

इसके लिये उन्होंने सिर्फ एक सिद्धान्त को पकड़ा था कि, ‘संविधान को विकृत नहीं किया जा सकता है, अलग अलग लोगों और राज्यों के लिये अलग अलग संविधान नहीं हो सकता है’. पूरे अमेरिका में इसी संविधान को लागू कराने के लिये ही वह युद्ध पर गये थे.

[सम्बंधित लेख : लोकतंत्र से पहले, राष्ट्र को बचाने की आवश्यकता]

भारत में यदि हाल की घटनाओं पर दृष्टि दौड़ाई जाय तो यह स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है कि भारत की जनता का एक वर्ग बड़ी उद्दंडता से संविधान का तिरस्कार कर रहा है और अपने को दूसरे से परे समझ कर अहंकार में संविधान के एक एक स्तंभों पर चोट कर रहा है.

यह सब जो हो रहा है वह अपने आप मे पर्याप्त कारण है कि अब हम संविधान के उस 42वे संशोधन को हमेशा के लिये अलविदा कह दे जिसके कारण से सेक्युलर शब्द भारत के साथ जुड़ा है क्योंकि भारत मे सेक्युलरिज़्म पूरी तरह से असफल हो चुका है.

यह सेक्युलरिज़्म भारत के संविधान की प्रस्तावना में पहले से ही था लेकिन इंदिरा गांधी ने 1976 में संविधान के 42वां संशोधन कराके सामने रख दिया जिसको आधार बनाकर उनके वामपंथी आकाओं (सोवियत रूस और उनके भारत मे सहयोगी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) ने एक ऐसी प्रयोगशाला बनाई जहां भारतीय सेक्युलर नाम की एक ऐसी नई प्रजाति पैदा की गयी, जिसमे जहां भारतीय होने के गौरव का अस्तित्व न हो और वहीं हिन्दू धर्म को लेकर हीनता से भरा हो.

आज हम भारत में राजनैतिक और सामाजिक पटल पर जो अराजकता देख रहे है उसका कारण 70 व 80 के दशक में प्रोग्राम किये गये नई प्रजाति के वही सेक्युलर हैं जो अपना नकली चरित्र व चेहरा छोड़ कर, भारत से राष्ट्रवादिता के कथानक को नष्ट करने के लिये, भारत व उसके समाज में विस्थिरीकरण करने नव सेक्युलरों को नेतृत्व प्रदान करने, अपने अपने दड़बों से बाहर निकल आये हैं.

यह सब वे इसलिये कर रहे हैं क्योंकि राष्ट्रवादियों से ज्यादा उनको यह बात मालूम है कि राष्ट्रवादिता ही वह सूत्र है जो भारत की संप्रभुता के सुरक्षित रहने को प्रतिरक्षित करती है और वह ही उनके अराजकतावादी महत्वकांक्षाओं को नष्ट कर सकती है.

इन सेक्युलरों ने भारत पर जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के नाम पर पहले ही लकीरें खींच रक्खी हैं और भारत के हिन्दू समाज में बिखराव को खूब उभारा है. इन सेक्युलरों ने शुरू से ही यह जान लिया था कि उनके उद्देश्यों की कुंजी हिंदुत्व में छुपी है.

एक तरफ तो हिन्दू धर्म, एक हिन्दू को, हिन्दू धर्म की उदारता व असीमित विरोधाभासी विचारों की उसमें स्वीकार करने की क्षमता के कारण, सेक्युलरिज़्म को प्रत्यक्ष रूप में ग्रहण करने की पूरी छूट देती है और इसी कारण से इन प्रोग्राम्ड सेक्युलरों के लिये उन्हें एक नव सेक्युलर रूप से दीक्षित करना सबसे आसान लक्ष्य होता है.

इस नव सेक्युलर को बौद्धिक आडंबरों में ऐसा लिप्त हो जाने दिया जाता है जिससे वह इन सेक्युलरों के षड्यंत्रकारी अभिकल्पों को देख ही नहीं पाता है.

दूसरी तरफ हिंदुत्व, हज़ार वर्ष की गुलामी से छूटे हिन्दू के अचेतन मन में यह तृष्णा भी देती है कि वह अपने वास्तविक इतिहास और उसकी गौरवगाथा से परिचित हो, जो उसके अंदर एक ऐसी दृढ़ता पैदा कर देती है कि वह अपने मूल की तरफ खिंचा चला आता है. यही हमारा मूल हिंदुत्व है, हिन्दू स्थान है, हिंदुस्तान है, भारतवर्ष है और इंडिया है.

आज भारत के लोगों में इतना मूलभूत मतिभेद हो गया है, लोगों ने किसी भी घटना व व्यक्ति को लेकर उसकी समीक्षा व आंकलन के लिये भी परस्पर विरोधी मापदंडों को चुन लिया है.

आज सेक्युलरिज़्म के लिये क्या सही है या क्या गलत है, उसका कोई मायने नहीं रह गया है, आज तो ‘मेरा सही-मेरा गलत’ के ही मायने है. इन सेक्युलरों के लिये नैतिकता का कोई मोल नहीं है, आज तो उनके प्रश्न जाति और धर्म के आधार पर तय होते है.

इनके लिये बलात्कार और हत्या तभी संज्ञान के लायक विषय होता है जब तक वह हिन्दू धर्म का नहीं होता है. यदि इसको स्पष्टता से समझना है तो इसे हाल में हुई आसिफा और गीता पर इन सेक्युलरों और नव सेक्युलर हिन्दुओं की प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है.

इसमें एक हिन्दू है और दूसरी मुसलमान लेकिन इस घृणित घटना पर विरोधी प्रतिक्रियाएं आयी हैं. आसिफा पर कोलाहल है और हिन्दू, उसके देवस्थान को प्रचारित कर मिथ्या आरोपों से समाज में उथल पुथल की जा रही है. वहीं गीता हिन्दू है तो सेक्युलर मौन हैं और मुसलमान उसे भाभी कह कर हिन्दुओं का परिहास कर रहा है.

यह दो घटनाएं, मूर्ख तटस्थ हिन्दुओं के लिये एक सबक हैं जहां सेक्युलरों की पाशविकता और विक्षिप्तता सार्वजनिक रूप से नग्न नाच रही है.

आज के भारत में मैं 1850 के अमेरिका की झलक देख रहा हूँ. आज उसका समाज पूरी तरफ से दो फाड़ हो चुका है. एक तरफ 70 और 80 के दशक के प्रोग्रामण्ड सेक्युलर, नव सेक्युलर हिन्दू और पश्चिम से भारत आये धर्मो के लोग हैं और दूसरी तरफ सिर्फ हिन्दू है, जिसे हिंदुत्व का सार राष्ट्रवाद समझ में आता है. इसीलिये उन्हें राष्ट्रवादी कहा जाता है.

जिस तरह कश्मीर की घाटी से अल्पसंख्यक हिन्दू 70 वर्षो में 15% से 700-800 परिवारों में सिमटा दिया गया है उसी तरह भारत की मुख्य भूमि पर से हिंदुओं को भी उनको उनकी ही प्रकृति से समेटा जा रहा है.

जिस तरह अमेरिका में कॉन्फेडरेट ने किया था, वैसा ही इन सेक्युलर्स और इनकी भीड़ ने अपना पहले से मन बना रखा है कि वे संविधान और उससे जुड़े तंत्रों को, बहुसंख्यक की भावनाओं के विरुद्ध जाकर, उसका प्रतिकार करेंगे और इन लोगों को लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं रोका जा सकता है.

मैं आज देख रहा हूँ कि भारत अपने लोकतंत्र के ही हाथों बंधक हो गया है और उसका संविधान इस काबिल भी नहीं है जो भारत को इससे स्वतंत्र कर पाये. ऐसी स्थिति में मुझे लगता है कि यदि संविधान की आत्मा को बचाना है तो किसी को संविधान से आगे जाकर पूरे भारत में संविधान को लागू कराना पड़ेगा. आज के सेक्युलरिज़्म में सवाल न हिन्दू का है, न मुसलमान का और न ही ईसाई का है, आज सवाल सिर्फ भारत की संप्रभुता का है.

मैं बड़ी शिद्दत से महसूस करता हूँ कि यदि इसके लिये गृहयुद्ध का चुनाव करना है तो इसको हो देना चाहिये. आखिर इसी गृहयुद्ध ने ही अमेरिका को संयुक्त राज्य अमेरिका बनाया है. लेकिन इस काम के लिये हमें अब्राहम लिंकन जैसा आदमी चाहिये जो संविधान के ऊपर राष्ट्र को रखता है. हमे इंदिरा गांधी जैसा व्यक्तित्व नहीं चाहिये जो संविधान से ऊपर खुद अपने को रखता है.

अब प्रश्न यह है कि क्या मोदी हमारे लिंकन बनेंगे? यदि इस प्रश्न का उत्तर जानना है तो हमें हर हालत में नरेंद्र मोदी को 2019 में जिताना है और अब्राहम लिंकन के आने का इंतज़ार करना है.

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