एक तमाचा और खाले मेरे लाल, क्या बिगड़ जाएगा! कायम रह जाएगी गंगा जमुनी तहज़ीब

क्रिकेट प्रेमी लोग तो पैडी अपटन को जानते ही होंगे. 2008 से 2011 तक भारतीय क्रिकेट टीम के मेंटल कंडीशनिंग कोच रहे. 2011 में हम विश्व कप जीते थे. फिर कई आईपीएल टीमों के कोच रहे.

जो चीज हम नहीं जानते वो यह कि पैडी की युद्धकला और रणनीतिक संस्कृति के अध्ययन में भी काफी रुचि है.

कभी शायद इंडियन एक्सप्रेस में उन पर पूरे पेज का एक आलेख छपा था. गूगल से भी नहीं खोज पा रहा वो लेख. पर पैडी ने जो कहा वो बड़े मार्के की चीज़ थी.

पैडी ने कहा कि भारतीय (यहां मैं हिंदू शब्द का प्रयोग करूंगा) जब एकाध मैच बुरी तरह से हारते हैं तो मैं विचलित नहीं होता बल्कि मुझे खुशी होती है.

ये हिंदू विचित्र प्रजाति है. जब तक उन्हें जोर का एक तमाचा न पड़े तब तक विष्णु भगवान की तरह निद्रालीन रहते हैं. लेकिन झापड़ खाने के बाद हिंदू बहुत खतरनाक हो जाते हैं.

दुनिया में बदला लेने के कुछ जो सबसे निर्मम अभियान चलाए गए, वो भारतीय सेना ने ही चलाए हैं.

पैडी की बात अक्षरश: सत्य है. हालांकि मैं प्रो एक्टिव एप्रोच का समर्थक हूं. तमाचा खाने के बाद ही क्यों जागना.

और तमाचा हल्का हो तो शुतुरमुर्गी उसका नोटिस ही नहीं लेते. अटल सत्य यह है कि अस्तित्व का खतरा जब तक प्रत्यक्ष न हो हम मुर्दा ही रहते हैं.

इस बार तमाचा थोड़ा ज्यादा तेज पड़ गया है. ‘कल्चर शॉक’ वाली स्थिति है. हम परम नैतिक, घोर प्रवचनकारी भक्तों ने कभी सोचा ही नहीं था कि 11 साल की बच्ची इस्लाम की भौजाई हो जाएगी.

पर मैं इससे प्रसन्न हूं कि तमाचा थोड़ा तेज़ पड़ा है. कासगंज, बशीरहाट, मालदा की घटनाओं से भी मैं प्रसन्न ही होता हूं. मुझे अपने सहोदरों के डीएनए का पता है.

लेकिन पैडी भी आश्वस्त नहीं कर पाते. तमाचे खा कर हम शुतुरमुर्ग अगर शूरवीर हो जाएं तो इसे कड़वी दवा समझ कर हजम कर लें.

लेकिन लगता है कि दिल को बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है. दु:ख के साथ स्वीकारना पड़ेगा कि बहुमत सेक्यूलर लतखोरों का है जो कहेंगे- बात को बढ़ाओ मत, एक तमाचा और खा लो मेरे लाल. क्या बिगड़ जाएगा! गंगा जमुनी तहजीब तो कायम रह जाएगी.

ऐसे ही लोगों के बच्चे डिप्टी कलक्टर बनते हैं. बंकिम बाबू के दशावतारों ने हिंदुओं को Post Honour समाज में बदल दिया है. अब ये बाबू लात खाकर ही सुधरेंगे.

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