नीम, असारी खाएंगे तो बैकवर्ड देहतिया पिछड़ा तो कहेबे करेंगे न?

नीम के फायदे तो आप सभी जानते होंगे. बालों को मजबूत और स्वस्थ रखने के लिए नीम का प्रयोग बहुत पुराना है. आजकल के साबुन शैम्पू वाले चाहे कितना कह ले इनमें नीम का रस डला है लेकिन वास्तविक नीम के रस की बात ही अलग होती है.

नीम के पत्तों को पानी में उबाल कर इस्तेमाल करने से रूसी ख़त्म हो जाती है.

इसके अलावा दांतों के दर्द में भी नीम का तेल लगाया जाता है. इससे मसूड़ों की सूजन खत्म होती है. मुंह से आने वाली दुर्गन्ध से निजात मिलती है.

नीम मधुमेह के रोगियों के लिए काफी फायदेमंद है. यह शुगर को नियंत्रित करता है. नीम के पत्ते को खाने से डायबिटिज रोगियों को लाभ मिलता है.

नीम के पत्ते खाने से पेट के कीड़े ख़त्म होते हैं. खाली पेट नीम के पत्तों को चबाने से पेट की कीड़े मरते हैं और इस समस्या राहत मिलती है.

इसके अलावा खोपोली से गंगा महतो अपनी देसी स्टाइल में नीम के क्या क्या फायदे बता रहे हैं, खुद ही जान लीजिये.

नीम – पूरा चैत महीना (बैसाख भी पकड़ लीजिये) पतझड़ के बाद जब नए पल्लव आते तब से नियमित रूप से नीम के पत्तों से बने ‘नीमछिछकि’ का सेवन!

बड़े बुजुर्ग बताते खाओ मतलब खाओ.. लेमनचूस, बिस्कुट खा खा के आदत बनाये मीठे मुँह में ये कड़वा सब्जी जरा अलग लगता था.. मुँह कान नाक बिदराने लगता था.. बकवास अटपटा सा ..

वहीं देखता कि घर के अन्य जन बड़े मजे से खा रहे हैं.. फिर दादी समझाती .. ‘अरे खाय ले बेटा.. बेस चीज लागव.. खुईन साफ रहतव एकर से.. बीमारी नाय भेतव!’ .. फिर नाक मुंह चाप के खाता.. और फिर धीरे धीरे ये सब्जी बहुत स्वादिष्ट लगने लगती… और अब भी पूरे चैत बैसाख तक लगभग हरेक झारखंडी के घर में आपको नीमछिछकि खाने को मिल जायेगा.

असारी (रहइन) – जेठ महीना के शुरुआत से फूल आने शुरू हो जाते इसके. एक आध बारिश के बाद फल आने शुरू. इसका भी स्वाद जरा रीतकुट (हल्का कड़वा) होता है. इसका भी सब्जी बना के खाते. नॉर्मली पहले सिझाते है फिर काट-काट के भूनते है. इसको भी घर वाले खाने को बाध्य करते. बोलो खाओ तो खाओ. अच्छा होता है सेहत के लिए. तो बस हम खाते..

अब इसके महत्व समझ में आ रहे हैं.

कैसे?

20-25 सालों में कूलडुडत्व और मॉडर्निटी का ऐसा नशा चढ़ा कि शुगर, मधुमेह, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर शरीर में घर करने लगी… गाँव के वैद्य मरने लगे और मॉडर्न डॉक्टर बढ़ने लगे.

साल के डेढ़ से दो महीने में हम इतनी नीम खा जाते थे कि अगले एक साल तक शुगर लेवल का अता पता भी न चलता था.

दूसरी है असारी. .. केतनो ही चोट घाट लग जाये, कट पीट जाए टेटनस के सुई की जरूरत नहीं पड़ती थी. प्रतिरोधक क्षमता जबरदस्त.

अब आज के डेट में ये नीम, असारी खाएंगे तो बैकवर्ड देहतिया पिछड़ा तो कहेबे करेंगे न? जब तक शुगर फुगर हाई बीपी से पीड़ित नहीं होगे तब तक थोड़े न प्रमाणित होगा कि आप मॉडर्न इंडिया के रहवासी हैं.

सो जे इंडिया
जे कूलडुडत्व.

नीम छिछकी : शुगर लेवल को कंट्रोल रखता है ये साग

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