कुछ पागलों की सत्ता की हवस ने लाखों देशवासियों से उनका क्या-क्या छीन लिया

मैं बिहार में जन्मा और पला-बढ़ा और वो भी तब जब भारत-विभाजन के दर्दनाक वाकिये के तकरीबन चार दशक बीत चुके थे यानि भारत-विभाजन के दर्द से मेरा कभी कोई सीधा सरोकार नहीं रहा.

भारत-विभाजन में न तो मैंने और न मेरे किसी अपने ने कभी कुछ खोया, पर आज से करीब सत्तर साल पहले हुई मानव-इतिहास की उस सबसे बड़ी त्रासदी पता नहीं क्यों मुझे बहुत बेचैन करती है.

भारत-विभाजन की पीड़ा मैं भी उन हज़ारों-लाखों हिन्दुओं और सिखों के साथ महसूस करता हूँ जिनसे इस कृत्रिम त्रासदी ने उनका सब कुछ छीन लिया था.

ऐसा क्यों है तो इसके जवाब में मेरे पास सिवाय ‘पूर्वजन्म’ पर यकीन करने के और कुछ भी नहीं है. शायद पूर्व-जन्म का कोई नाता मेरा भी उस भूभाग से है जो अब हमारा नहीं है.

शायद पूर्व जन्म में मैंने भी मेरा कुछ खोया है जो मुझे मजबूर करता है कि मैं खुद को भारत-विभाजन के अंतहीन दर्द के साथ जोड़ लूँ.

पागलों की तरह वो तमाम उपन्यास मैंने जमा किये जो ‘भारत-विभाजन’ की पृष्ठभूमि पर रचे गये हैं. उन तमाम उपन्यासों को पढ़ते हुये मैंने खुद को उन उपन्यासों के पात्रों के साथ हमेशा जुड़ा हुआ महसूस किया. ‘भारत-विभाजन’ की वेदना को जिसने भी कलमबद्ध किया उसकी कृति को मैंने पागलों की तरह खोज निकाला.

‘सोहन सिंह सीतल’ की ‘तूतांवाला कूंह’ (शहतूतों वाला कुआँ), ‘यशपाल’ का ‘झूठा-सच’, ‘अमृता प्रीतम’ का ‘पिंजर’, ‘खुशवंत सिंह’ का ‘पाकिस्तान मेल’, ‘कृष्णा सोबती’ का ‘सिक्का बदल गया’, ‘अज्ञेय’ का ‘शरणदाता’, ‘मोहन राकेश’ का ‘मलबे का मालिक’, ‘राही मासूम रज़ा’ का ‘आधा गाँव’, ‘भीष्म साहनी’ की ‘तमस’, ‘असगर वजाहत’ की ‘जिस लाहौर नइ वेख्या’, ‘मंज़ूर एहतेशाम’ का ‘सूखा बरगद’, ‘कुर्तुलैन हैदर’ का ‘आग का दरिया’ और न जाने कितने ऐसे उपन्यास केवल मेरे निजी पुस्तकालय की शोभा ही नहीं है बल्कि ये मेरे लिये वो ‘दर्द, एहसास और ज़ज्बातों’ के दस्तावेज हैं जिसे विभाजन की उस भीषण आग में बचा लिया गया था.

‘भारत-विभाजन’ का दर्द आज फिर से इसलिये उभर आया क्योंकि आज फिर से मैंने मेरी एक पुरानी CD में कैद ‘बुनियाद सीरियल’ को खोज निकाला और उसके दस एपिसोड एक साथ देख डाले.

‘बुनियाद’ भारत-विभाजन के दर्द का वो दस्तावेज था जिसे रमेश सिप्पी, मनोहर श्याम जोशी और कृष्णा सोबती ने मिलकर उकेरा था और जिसमें अभिनय कर आलोक नाथ, अनीता कंवर, सुधीर पांडे, आशा शर्मा, किरण जुनेजा, आशा सचदेव, गिरिजा शंकर, दिलीप ताहिल, सोनी राजदान, कंवलजीत सिंह और मज़हर खान जैसे दिग्गजों ने उसे अमर बना दिया था.

‘बुनियाद’ दूरदर्शन पर जब 1986 से प्रसारित किया जाने लगा तो कहते हैं कि यूं तो पूरा देश, पर विशेषकर उस वक़्त पूरा लाहौर और पूरी दिल्ली की सड़कें सुनसान हो जाया करती थीं.

पश्चिमी पंजाब से आये हिन्दू और सिख बुजुर्ग पागलों की तरह उस सीरियल में बँटवारे में छोड़ आये अपने लाहौर को खोजते थे और मास्टर हवेलीराम, लाला गेंदामल और बच्छोवाली, लाहौर के आत्मानंद की हवेलियों में और वहां की गलियों में अपने मकानों के निशानात तलाशते थे.

जिसने विभाजन को न देखा हो वो ‘बुनियाद सीरियल’ और विभाजन के ऊपर लिखे उपन्यासों के जरिये से उसे आज भी देख सकता है और महसूस कर सकता है कि कुछ पागलों की सत्ता की हवस ने पंजाब और पंजाबियों से, बंगाल और बंगालियों से उनका क्या-क्या छीन लिया. अनगिनत लोगों की निजी एवं और सांस्कृतिक-ऐतिहासिक त्रासदी के सारे जिम्मेदारों का पाप कितना बड़ा है ये सब आपको ‘बुनियाद’ और वो किताबें बतायेंगी.

उस पाप का परिमार्जन करने कोई नहीं आने वाला पर भारत में आज भी हजारों-लाखों बूढ़ी आँखें ऐसी हैं जिन्हें अपने जन्मस्थान को, अपने लाहौर को, अपनी रावलपिंडी को और अपने सिंध को दुबारा देखना है, हजारों युवा ऐसे हैं जिन्हें जानना है कि किस अपराध में उनके बाप-दादों को जानवरों की तरह वहां से खदेड़ दिया गया था और क्यों लाहौर की अस्सी फीसदी सम्पति और जायदादें छोड़ कर खाली हाथ यहाँ आना पड़ा था.

‘अखंड भारत’ का संकल्प लीजिये. ‘मृत्यु अखंड भारत में हो’ इस प्रार्थना को रोज दुहराईये. मुझे पता है कि आबादी का गुणा-भाग करने वाले इसे बचकानी और मूर्खतापूर्ण अभिलाषा से नवाजेंगें पर कम से कम उनका पास (लिहाज) तो हमें रखना है और कम से कम उनके दर्द को बांटना है जिनके लहू में सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम सभी दौड़ रही है पर उसे कभी अपने रक्त में घुली हुई चिनाब और झेलम देखना नसीब नहीं हुआ.

‘बल्ले बल्ले बग हां चिनां देया पानियां, अज घर छुट्टी औनां साड़े दिल जानियां’ (चिनाब के पानी जरा धीरे धीरे से बहो, आज मेरा प्रियतम छुट्टी पर घर आ रहा है)

कभी अपने प्रियतम के लिये इसे गाने वाली आवाजें बूढ़ी हो गई तो क्या… बस उम्मीदें बूढ़ी नहीं होनी चाहिये.

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