हे बत्ती देवी! आत्मा थीं आप हमारी कार की, बेकार है अब वो

आपके लिये रात देखा ना दिन. इत्ती पढ़ाई लिखाई की. हाथ पाँव मारे. साहब बने. आप ही हाथ छोड़कर कर प्रस्थित हो रही हैं. आप थी तो सामने वाले को बत्ती दिये बिना भी बात बन जाती थी. बत्ती बिना तो अँधेरा ही अँधेरा है अब. क्या करें. कैसे करें. हापुस थे हम. आपके अभाव में ज़माने की क्रूर भीड़ मे लँगडे होकर भटकना ही शेष रह जाना है अब.

हे बत्ती देवी! आप थीं तो हमारा रथ ज़मीन से छह ऊँगली ऊपर चला करता था. आप विदा हुईं और हम धराशायी हैं. धराशायी क्या हैं सुनसान बियाबान मे पंचर से हुये पड़े हैं. दिग्भ्रमित हैं. पिचके टायर सी ये जिंदगी लिये किस दिशा मे जायें अब हम.

देवी जाने के पहले कुछ तो विचार किया होता आपने. आपकी छत्रछाया के अभाव मे हमारी कोमल काया जमाने की कड़ी धूप के आघात कैसे सह सकेगी.

आप थीं तो ज़माने की हर लाईन हमसे ही प्रारंभ हुआ करती थी. अब धक्कों की आशंका से डरे हुये हैं हम. अब स्पष्ट हो रहा है कि लोगों के सलाम की अधिकारणी आप थीं. और अब तक उन्हें स्वीकार कर हम व्यर्थ में ही आनंदित होते रहे हैं. पर इस व्यर्थता के आदी हो चुके हम लोग इन नमस्तों के बिना कैसे रह सकेंगे यह सोच सोच कर ही मन व्याकुल है.

आप के बिना कहीं जाने का विचार ही नहीं कभी किया हमने. और कहीं की छोड़िये हम तो आप को साथ लिये बिना कभी नाई की दुकान की सीढ़ियाँ तक नहीं चढ़े. मुझे इस बात में किंचित भी संदेह नहीं है कि ससुराल में विशिष्ट आवभगत का कारण भी आप ही रही हैं. अब आगत के विषय में विचार करने मात्र से मन विचलित है.

देवी वे सब साधारण जन हँसेंगे हम पर. जो आपकी उपस्थिति मात्र से चौंधियाये रहते थे. नहीं भी हँसेंगे तो हमें लगेगा कि वे हँस रहे हैं हम पर. आत्मा थीं आप हमारी कार की. बेकार है अब वो.

आप विदा हुईं तो वह अबला अब निष्प्राण देह की तरह अचल पड़ी हुई है. उसकी तरफ देखने का जी भी नहीं करता अब. बच्चे तक उसमें बैठने को तैयार नहीं. पर क्या किया जाये, भारत रत्न लता मंगेशकर जी कह जो गयी हैं दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा टाईप की बातें. उनकी ही सुनेंगे और कोशिश करेंगे कि आप के बिना भी जी लें.

आप कोई साधारण वस्तु थी नहीं. प्रतीक थीं हमारी सत्ता की. हमारे सर का ताज थीं आप. रंगून मे निर्वासित, एड़ियाँ रगड़ते, आख़िरी मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र की मानसिकता क्या रही होगी. कैसे कैसे मनहूस ख़्याल सताते रहे होंगे उन्हें, यह अब हम बेहतर तरीक़े से समझ पा रहे हैं.

काश आप आयी ही नहीं होती हमारे जीवन में. ना आयी होती आप तो आपके संग की आदत ना पड़ती. और ना ऐसे कष्ट का अनुभव होता तो आज हो रहा है.

लौटने का प्रयास कीजियेगा देवी. आप लौटेंगी तो हम एक बार फिर जी उठेंगे. आदरणीया. मेरे आवेदन पर सहानुभूति पूर्वक विचार कर लें. अंसभव कुछ नहीं इस पापी दुनिया में. आपकी प्रतीक्षा बनी है. टकटकी लगाये बैठे हैं हम. कृपया लौट आइये.

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