जो तटस्थ हैं…

संघर्ष, एक set जीवन का गणित गड़बड़ा देता है इसीलिए कोई संघर्ष नहीं चाहता.

गति गड़बड़ा जाती है, तरह तरह के अवरोध और व्यवधान उत्पन्न हो जाते हैं इसलिए लोग संघर्ष से बचना चाहते हैं.

इस साधारण प्रवृत्ति को तटस्थता कहा जाता है क्योंकि ऐसा कहना अच्छा लगता है.

लेकिन ज़रा इस शब्द के अर्थ को थोड़े गहराई से देखिये.

तटस्थ का अर्थ होता है तट पर खड़ा, जो पानी के प्रवाह में कूद नहीं रहा हो.

जीवन में हम इसे देखते हैं तो संघर्ष से खुद को दूर रखने वाले को तटस्थ कहने का रिवाज है. लेकिन यहाँ इस महावाक्य को भूलना प्राणघातक होता है, आज नहीं तो कल – you may not be interested in war, but war is interested in you.

कृपया यह भी सोचिए कि संघर्ष क्यों हो रहा है? किनके बीच हो रहा है? किसने छेड़ा है?

यह जानना इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि तटस्थ होने का अर्थ यही है – आप इतने भी दूर नहीं कि संघर्ष का विजेता आप को उसका अगला लक्ष्य न बना पाये.

हो रहे संघर्ष के बारे में यह भी जानें कि जो आप के नज़दीक है, क्या उसने झगड़ा शुरू किया है?

अक्सर आप इसका उत्तर नकारात्मक पाएंगे क्योंकि जो झगड़ा शुरू करता है वो घर से दूर करता है, कोई नहीं चाहता कि घर वाले उसमें खींचे जाएँ.

तो क्या दूसरा पक्ष दूरी से आया है, वह भी केवल लड़ने? ज़रा यह बताएं कि नज़दीक वाले पक्ष की तैयारी कितनी थी, या न के बराबर थी? और आप की कितनी है?

अगर ऐसा है तो तय जानिए कि अगर वो आपके परिचित को हराने के बाद, तुरंत नहीं तो ज़रा विश्राम कर के, जो भी शक्ति खोई है उसकी भरपाई कर के आप पर हमला बोलने वाला ही है.

यह बात इस्लाम की थी और हमेशा रहेगी क्योंकि कुर’आन की यही सीख है और वह अपरिवर्तनीय है.

वैसे एक बात समझिए. आप को शरीफ मुसलमान भी मिलेंगे जो झगड़ा करना नहीं चाहते और करेंगे भी नहीं. आप के जैसे ही वे अपने काम से काम रखना चाहते हैं.

लेकिन उनको लेकर बहुत खुश न हों. वे झगड़ा न भी करें, ज़कात तो देते ही हैं और ज़कात हमारे विरोध में कहाँ काम आती है इस पर विस्तार से लिख चुका हूँ. और यह इस्लाम के मुताबिक है, हमारी जगह कोई और भी होंगे, उनका गैर इस्लामी होना काफी है उनसे लड़ने के लिए.

इन शांतिप्रिय मुसलमानों के पूर्वज पहले हिन्दू हुआ करते थे. बिलकुल वैसे ही तटस्थ जैसे आप आज हैं. तटस्थता का पालन करते हुए वे न खुद लड़े और न ही लड़ने वालों की उन्होंने कोई सहायता की.

लेकिन आज उनके शांतिप्रिय वंशज – वैसे ही शांतिप्रिय हैं लेकिन जिहाद के लिए ज़कात दे रहे हैं और उसे पवित्र कर्तव्य समझते हैं.

[जीत नज़र नहीं आती तो हुदैबिया की सुलह, जब जीते तो उमर का सुलहनामा]

यह तटस्थता आप के और उनके बीच समान है, लेकिन अगर आप सोचते हैं कि कल इस्लाम भी आप और उनके बीच समान होगा तो ज़रूरी नहीं.

कश्मीरियों को इस्लाम ने कश्मीर में जीने नहीं दिया और न ही कन्वर्ट होने का विकल्प दिया. बस यहाँ से भाग जाओ संपत्ति और महिलाओं को छोड़कर, यही उनका नारा था। याने पुरुषों को वे जीवित नहीं रखना चाहते थे.

तो फिर आप में ऐसा क्या है कि आप के साथ वे अलग बर्ताव करेंगे? इस्लाम इसकी इजाज़त नहीं देता.

[शांतिदूतों के शांति प्रस्ताव – उमर का सुलहनामा – 1000 वर्ष बाद भी वही बात]

इसलिए खुद लड़िए या फिर लड़ने वालों की सहायता करिए. सरकार से सहायता की अपेक्षा न करें, कानून आप को बचा नहीं सकता. सरकार छुटपुट हिंसा में हस्तक्षेप नहीं कर सकती.

और इस्लाम हमेशा उस तरह से लड़ता है जहां वो अपने से प्रबल शत्रु से लड़ने से बचे. इतिहास समझना हो तो हुदैबिया की सुलह और फतह मक्का का अध्ययन करें.

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