फुरसती अंकल की क्लास : बाकी न रहे कसर, बस लक्ष्य पर हो नज़र

आज समय से पहले उठ गया. अभी सुबह के चार ही बजे है. कुछ बातें काफी पहले से लिखना चाह रहा था, आज शुरू कर रहा हूँ. सिलसिलेवार लिख पाउँगा या नहीं पर कोशिश तो यही होगी. भाषा और शैली का बंधन नहीं है ताकि समय बचे और आसानी से समझ सकें, वे लोग जिनके लिए लिख रहा हूँ.

गलती करके सीखना अच्छी बात है पर इसके लिए एक उम्र कम पड़ जाती है इसीलिये दूसरों की गलतियों को भी सीखने की क्रिया में शामिल करना बुद्धिमानी होगी.

तो मैं अपने 71 साल के जीवन के उन अनुभवों पर फोकस करूंगा जो गलती के दायरे में आते हैं. मैं किसी भी तरह का आग्रह नहीं करता कि कौन इसे पढ़े लेकिन वे साथी जो युवा हैं और लिखने पढ़ने के शौक़ीन हैं मैने उन्हीं को लक्ष्य करके ये लिखना शुरू किया है. बात लम्बी नहीं होगी क्योंकि मैं जानता हूँ, सबके पास समय की कमी है, वैसे समय निकाल कर पढ़ेंगे तो फायदे में रहेंगे.

1. पहली बात, आपको पढ़ने और लिखने का शौक है ये अच्छी बात है. मन की बात लिखकर प्रकट करने से कुंठाएं विसर्जित होती रहती हैं , रचनात्मक प्रवृति विकसित होती है.

लेकिन यदि अभी आप अपने करियर को बनाने के लिए पढ़ाई या कोई कोर्स कर रहें हैं तो थोड़ा सतर्क होना पड़ेगा. ऐसी हालत में आपकी प्राथमिकता आपका करियर ही होना चाहिए.

हाँ, एक छोटी डायरी में एक आध पैराग्राफ मन की बात लिखने में हर्ज़ नहीं है. इन्हे बीज के रूप में संभाल कर रखें, करियर सेट हो जाने पर इनसे नाता जोड़ लीजियेगा और अपनी रचना धर्मिता को विकसित करियेगा.

एक ज़रूरी बात – अपने लिखने पढ़ने के शौक को भूल कर भी “पैसा और प्रसिद्धि” से मत जोड़िएगा. यही एक मरीचिका है जो तमाम लोगों को कुंठाग्रस्त कर देती है. इन दो उपलब्धियों को पाने के लिए बुद्धि से कहीं ज्यादा जोड़ तोड़, गुटबंदी, जी हुजूरी, तथाकथित गुरुओं /गुरुघंटालों की चरण वंदना यानी कि दुर्बुद्धि की ही जरूरत पड़ेगी.

हो सकता है कि दस में से एक आध को प्रसिद्धि मिल भी जाये लेकिन पैसा फिर भी नहीं आयेगा. अब प्रकाशक या पत्रिकाओं के संपादक मुंह खोल कर बैठे मगरमच्छ हैं, कुछेक अपवाद भी हैं लेकिन वे भी कई तरह के दबाव में रहते हुए निष्पक्ष होकर प्रतिभाओं के प्रति न्याय नहीं कर पाते.

तो अभी आप अपने करियर को संवारिये. समय आपके पक्ष में है या प्रतिकूल, ये आपकी मेहनत और उद्देश्य के प्रति आपका समर्पण ही तय करेगा. हाँ , ये समय निराश होने का नहीं है. जो अपनी आतंरिक ऊर्जा का अपव्यय या क्षरण नहीं करेंगे उनको रोटी भी मिलेगी और थोडा मक्खन भी. लेकिन करियर के बजाय कविता, कहानी या पोलिटिक्स में उलझने से रोटी तो छोड़िये, रोटी पर रखने के लिए नमक भी मुश्किल से ही मिलेगा.

मैंने ये बातें क्यों लिखी, ये मत पूछिए …हाँ ये तमाम गलतियों के करने के बाद का मेरा स्वार्जित ज्ञान है जिसका इस्तेमाल आप कर सकते हैं. आजकल के अभिभावक कई कारणों से अपने युवा बच्चों से खुलकर बात नहीं कर पाते, करते भी हैं तो सही प्रभाव नहीं उत्पन्न कर पाते. तो ऐसे में आपको मेरे जैसे “फुरसती अंकल” की बात सुननी चाहिए और अगर मान भी लेंगे तो आपके हित में है.

– देवनाथ द्विवेदी

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  1. अति-उत्तम
    समय को ध्यान में रख विषय विस्तार को बाधित किया है शायद, विस्तार की अपेक्षा रहेगी।

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