मस्तिष्क से रचा जो सृजनात्मक संसार, उस पर मिला हमें बौद्धिक संपदा अधिकार

यूँ तो सभी जीवित प्राणियों के शरीर में मस्तिष्क होता लेकिन, जिस तरह का उर्वरक और सृजनात्मक मानव का दिमाग होता वैसा अन्यत्र मिलना मुश्किल है. क्योंकि अपने इस छोटे-से दिमाग की काबिलियत से ही उसने न केवल आदिम या पाषाण युग से खुद को आधुनिक या तकनीकी युग तक पहुँचाया बल्कि, जहाँ भी जो कुछ भी सुंदर और उसके काम का था सब पर उसने अपना कब्जा जमाया चाहे.

फिर वो प्रकृति प्रदत्त संपदा हो या फिर जंगल में रहने वाले जानवर सबको अपने हिसाब से उपयोग में लाकर ऐसी स्थति पैदा कर दी कि सह-जीवन से चलने वाले प्राकृतिक वातावरण का संतुलन बिगड़ गया और आज कुदरत की तुला का पूरा पलड़ा मानव के बोझ से झुका जा रहा है.

यदि विश्लेषण करें तो इसकी एकमात्र वजह ये ‘दिमाग’ ही हैं जो एक तरफ यदि रचनात्मक हैं तो दूसरी तरह विध्वंसक भी है. ऐसे में अगर इसका सोच-समझकर व संभलकर इस्तेमाल न किया जाये तो ये जहाँ सृजन की वजह बनता वहीं विनाश का कारण भी बन जाता है.

अपनी जेहनी काबिलियत से इन्सान जब खुबसूरत निर्माण कर सकता हैं तो फिर उसे ऐसी विनाशक वस्तुओं को बनाने की क्या जरूरत जो मानवता के लिये खतरा हो. विचार करें तो पाते कि कहीं न कहीं उनकी भी आवश्यकता है.

जिस तरह वनों में शेर और खरगोश दोनों ही होते हैं और अपना योगदान भी देते हैं. वो तो हम हैं जो अपनी तरह मूल्यांकन कर ये साबित करते हैं कि फलाना जीव को ईश्वर ने नाहक बनाया या इसकी आबादी ज्यादा तो इसे मारकर खाना गलत नहीं याने कि अपनी सुविधानुसार नियम गढ़े जाते हैं. और चूँकि उन्हें विधाता ने बनाया तो उनके प्रति निर्मम व्यवहार किया जाता है.

आश्चर्य नहीं कि यही स्वार्थी इंसान अपनी बनाई या कल्पनाशक्ति से रची मौलिक कृतियों के प्रति बड़ा जागरूक होता है, जिसकी चोरी या दूसरे के द्वारा बिना उसे क्रेडिट दिये किसी एक वाक्य या लोगो या चित्र या कार्टून का उपयोग उसे आहत कर देता है. जो दर्शाता है कि अपने हाथों से बनाई चीजों के प्रति हमें मोह होता है.

उसी तरह ईश्वर को भी तो होता होगा कि उसने सबको स्वयं अपने हाथों से गढ़ा यदि वो अपने बौद्धिक संपदा अधिकार का प्रयोग करे तो हम सब कटघरे में खड़े होंगे. मगर, ये हो नहीं सकता. अतः निश्चिंतता से भरे हम उनका दोहन करते हैं. पर अपने सामानों की सुरक्षा के प्रति सजग रहते हैं जो अच्छी बात है, क्योंकि जो भी हम अपने मस्तिष्क की शक्ति से बनाते हैं वो हमारी ‘बौद्धिक संपदा’ कहलाती है. जिसे दूसरा हमारी अनुमति के बगैर इस्तेमाल न करें. अतः हमें ‘बौद्धिक संपदा अधिकार’ प्रदान किया गया.

फिर भी बहुत-से ऐसे लोग जिनको इसकी जानकारी नहीं तो वे अपनी रचनाओं, अपने शोध या अविष्कार का ‘कॉपीराइट’, ‘पेटेंट’ या ‘ट्रेडमार्क’ नहीं करवाते जिसकी वजह से हर कोई उन्हें आसानी-से कॉपी-पेस्ट कर इधर-से-उधर भेजता रहता है और सृजनकर्ता को उसका लाभ नहीं मिलता.

तो इस उद्देश्य से विश्व बौद्धिक संपदा संगठन ने 26 अप्रैल को ‘विश्व बौद्धिक दिवस’ मनाने का निश्चय किया जिससे कि हम इसके प्रति जागरूक हो और अपनी मानसिक खोजों या नूतन विचारों पर अपना कानूनन हक हासिल करें.

आज सोशल मीडिया के ज़माने में तो ये अत्यंत आवश्यक है. जहाँ एक क्लिक या फिंगर से आपकी मेहनत-मशक्कत से बनाई गयी कृति कोई भी अपने नाम से चेप सकता है. तो इसे समझें और सतर्कता के साथ अपनी चीजों को सार्वजनिक करें. इसी संदेश के साथ सबको विश्व बौद्धिक दिवस की शुभकामनायें!

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