चीन में मोदी : न्यूनतम हानि पर अधिकतम लाभ लेने के धरातल को टटोलने का प्रयास

जब से यह खबर आयी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन की निर्धारित यात्रा करेंगे और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ चीनी शहर वुहान में 27 और 28 अप्रैल को एक ‘अनौपचारिक बैठक’ होगी तभी से विश्व भर में इस अचानक होने वाली वार्ता को लेकर इसके भिन्न भिन्न मतलब निकाले जा रहे हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी की यह यात्रा सभी को आश्चर्य में डालने वाली है क्योंकि कूटनीति में इस तरह बिना पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के दो ऐसे राष्ट्राध्यक्षों का अनौपचारिक रूप से मिलना, जिनके बीच सीमा विवाद भी है और सम्बन्ध भी थोड़ा तल्ख है, असमंजस पैदा करता है.

भारत की तरफ से जब इस यात्रा की घोषणा हुई थी तब मुझे भी अन्य लोगों की तरह अचंभा हुआ था. कुछ लोगों की तरह, इस यात्रा को लेकर मेरे भी मन में यह प्रश्न है कि जब जून 2018 में ‘शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन समिट’ में शामिल होने मोदी को चीन जाना ही है तो फिर अभी क्यों जा रहे हैं?

इधर कर्नाटक में चुनाव होने के बाद भी मोदी चीन की इस यात्रा पर क्यों जा रहे हैं?

अब इस अचानक होने वाली औपचारिक बैठक के परिणामों के बारे में तो तुरन्त कुछ पता चलना असंभव है क्योंकि इस बैठक में विदेश मंत्रालय के नौकरशाहों की भूमिका बड़ी सीमित होगी और ज्यादातर दोनों राष्ट्राध्यक्ष अकेले में वार्ता करेंगे.

यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि कल चीन की तरफ यह स्पष्ट कर दिया गया था कि इस दो दिवसीय वार्ता के बाद कोई भी संयुक्त बयान नहीं दिया जायेगा इसलिये इस वार्ता की दिशा के बारे में कुछ नहीं पता चलेगा.

इस होने वाली वार्ता को लेकर मैंने काफी विचार किया है और इसी के साथ, पिछले महीनों में हुईं कुछ घटनाओं पर काफी मनन किया है जिनके तार मुझको इस वार्ता से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं.

बीती रात जब मैं कुछ विदेशी चैनलों पर बैठे विदेशी मामलों के विशेषज्ञों को सुन रहा था तब मुझे पता चला कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बनने के बाद, भारत को इस वार्ता का प्रस्ताव रखा गया था लेकिन भारत ने अपनी तरफ से कोई विशेष उत्साह नही दिखाया था.

चीन को जहां भारत से अरुणाचल व अन्य सीमाओं को लेकर भारत से विवाद है, वहीं पर भारत की आक्रामक व सफल विदेश नीति और कूटनीति से उसके ‘वन बेल्ट वन रोड’ प्रोजेक्ट को विश्व में शुरू के उत्साह के बाद अब, खासतौर पर योरप में विरोध का सामना कर पड़ रहा है.

चीन की चिंता बलूचिस्तान क्षेत्र भी है, जहां अशांति के कारण उसके सीपेक का प्रोजेक्ट धीमा हो गया है और ऐसा माना जा रहा है कि बलूचिस्तान के विद्रोहियों को भारत का सीधा समर्थन प्राप्त है.

चीन को सीपेक प्रोजेक्ट के अंतर्गत, गिलगित बाल्टिस्तान के रास्ते पाकिस्तान में प्रवेश मिल रहा है, जो वास्तव में पाकिस्तान द्वारा 1948 में अधिकृत किया गया जम्मू कश्मीर का हिस्सा है.

भारत का उस पर वैधानिक अधिकार है और उसको उसको अपना हिस्सा मानते हुये, चीन से अपना विरोध दर्ज करा चुका है. भारत ने इसी आधार पर चीन के सीपेक व वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट में शामिल होने के प्रस्ताव को अस्वीकार किया है.

इतना ही नहीं चीन को हिन्द महासागर में भारत की बढ़ती गतिविधियों व हिन्द पेसिफिक सामरिक गठबंधन से खुद के साउथ चीन सागर में दिक्कत है.

मेरा अनुमान है कि भारत इन्ही मुद्दों को लेकर चीन के साथ वार्ता करने में इच्छुक नहीं था क्योंकि यह सभी मुद्दे भारत के लिये सामरिक व अमेरिका के साथ नये बनते हिन्द पेसिफिक महासागर गठजोड़ की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है.

इनमें कोई भी ऐसा मुद्दा नहीं है जहां भारत और चीन अपने हितों पर समझौता किये बिना कोई सार्थक परिणाम निकाल सकते हैं. यहां, यह समझने की ज़रूरत है कि जहां चीन को भारत की ज़रूरत है, वहीं भारत को भी चीन की आवश्यकता है.

भारत को सबसे पहले अपनी चीन से लगी सीमा पर यथास्थिति चाहिये ताकि लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक चीनी सीमा पर कोई तनाव की स्थिति न हो और डोकलम जैसी घटना की पुनरावृत्ति न हो.

भारत को, कश्मीर घाटी में पाकिस्तान के समर्थन से चल रहे आतंकवाद को रोकना है और चीन का वरदहस्त प्राप्त पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिये चीन की तटस्थता चाहिये है.

भारत को चीन द्वारा एनजीओ के माध्यम से वामपंथियों को भारत मे अशांति और अराजकता फैलाने के लिये जो धन पोषित होता है, उस पर चीन को रोकना है.

भारत और चीन के बीच ट्रेड बहुत ज्यादा है लेकिन वह एक तरफा है जिसमें भारत का निर्यात चीन से हो रहे आयात के मुकाबले बेहद कम है जिसे भारत कम करना चाहता है.

भारत को म्यांमार, नेपाल में चीन की वन रोड वन बेल्ट बनने व थाईलैंड में पनामा नहर के तर्ज पर बनने वाली नहर के प्रस्ताव से दिक्कत है. इसके अलावा भारत को संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता व एनएसजी की सदस्यता चाहिये है जो बिना चीन के सहमति के नहीं हो सकता है.

यहां पर भारत की सबसे बड़ी चिंता है कि अमेरिका से बन रहे सामरिक संबंधों को कमजोर किये बिना, कैसे चीन से संबंधों को मधुर बना सके.

भारत को यह अच्छी तरह मालूम है कि आर्थिक विकास की ऊंचाई पर जहां चीन है और भारत जहां पहुंचना चाहता है, वह रास्ता युद्ध से नहीं जाता है. चीन भारत से बहुत शक्तिशाली है लेकिन फिर भी चीन आज अपनी आर्थिक प्रगति की रफ्तार को रोकने की कीमत पर युद्ध नहीं करेगा.

अब आते हैं इस बात पर कि आखिर भारत ने यह औपचारिक वार्ता का न्योता, भले ही देर से, लेकिन क्यों स्वीकार किया?

जहां तक मुझे समझ में आ रहा है यह वार्ता किसी समझौते के लिये नहीं हो रही है बल्कि दोनों राष्ट्र अपने-अपने दीर्घकालीन उद्देश्यों को समझाने व आपसी हितों और टकरावों पर बात करने के लिये बैठे है. यह मौका यह बताने का भी है कि दोनों के बीच वे कौन से मुद्दे हैं जिस पर कोई समझौता नहीं होना है.

यदि पिछले एक महीने की उन खबरों पर हम ध्यान दें जिनकी चर्चा भारत की मीडिया में तो नहीं, लेकिन पश्चिम व पाकिस्तान की मीडिया पर चर्चा हुई है तो यह समझ में आता है कि मोदी और शी की मुलाकात से पहले भारत ने, कुछ न कुछ कूटनैतिक अस्त्रों को जमा कर लिया है.

यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि इस कूटनीतिक अस्त्र के लिए भारत की विदेश मंत्री व विदेश सचिव से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र अजीत डोभाल ने निभाई है.

मॉर्च के महीने के आखिरी में अजीत डोभाल ने 24 घण्टे के लिये अमेरिका की यात्रा की थी और सैन्य संचार के साझा व तकनीकी के समझौते को आखिरी शक्ल दी थी.

उसके बाद रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भारत के प्रधानमंत्री मोदी को फोन किया और आपसी हितों के लिए सामरिक साझेदारी का प्रस्ताव रखा था और उसके तुरन्त बाद डोभाल रूस गये और वहां रक्षा के शीर्ष लोगों से वार्ता की जिसके विषय के बारे में कोई घोषणा नहीं हुई.

उसी के बाद, अगले दिन अजीत डोभाल चीन रवाना हो गये जहां वे पोलित ब्यूरो के सदस्य यांग जीएच जो सेंट्रल फॉरेन अफेयर कमीशन के निदेशक हैं, से मुलाकात की है. इसी बीच यह भी नज़र आ रहा है कि इसी समय विभिन्न कांफ्रेंसों में भारत की विदेश मंत्री व रक्षा मंत्री भी रूस और चीन के दौरे में है.

कुछ तो चल रहा है लेकिन क्या, अभी समझ के बाहर है. इस सब के बीच विदेश नीति के विशेषज्ञ इस बात की संभावना व्यक्त कर रहे हैं कि इस सबके पीछे मध्य एशिया का तेल है, जो चीन की 85% और भारत की 80% जरूरत को पूरा करता है.

चीन और भारत विश्व की 40% जनसंख्या हैं और दोनो राष्ट्र उपभोक्ता के तौर पर एक ब्लॉक बनाकर अरबों के महंगे होते तेल की कीमत को कम कराने की रणनीति बना सकते हैं.

अंत मे इतना कहूँगा कि अब जब सारे मुद्दे आर्थिक पहलू पर टिके हों तब दो व्यापारी एक दूसरे को तौल कर के, कम से कम नुकसान पर फायदा लेने और किसी एक धरातल पर पहुंचने का प्रयास करते हैं.

मुझे यह भारत व चीन की औपचारिक वार्ता, इसी धरातल को टटोलने का प्रयास लग रहा है.

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