वो हमारे विरोधी नहीं ‘शत्रु’ हैं, सेना सी एकजुटता लाइए, अब युद्ध होगा

आज एक पोस्ट देखी जहां एक बोधकथा टाइप लिखी गयी थी. संक्षेप में अनुवाद पेश है.

एक औरत का पति बहुत ही खराब आदमी था और उसे परेशान करता था. वो उससे उकता गयी थी और सब उसे सलाह दे रहे थे कि उसे छोड़ दे, दूसरा घर बसा. लेकिन वह इस डर से छोड़ नहीं रही थी कि न जाने दूसरा पति कैसा मिले.

और एक दिन उसका पति मर गया. फिर उसने दूसरा विवाह कर लिया और उसे बहुत ही अच्छा पति मिला जो उससे बहुत प्रेम करने वाला था और उसने बाकी ज़िंदगी बहुत सुख से बिताई.

बोध यह बताया गया था कि डरना नहीं चाहिए, दुनिया किसी के लिए रुकती नहीं है, ‘कोई न कोई’ मिलता ही है. हमें पॉज़िटिव होना चाहिए कि जो मिलेगा अच्छा ही मिलेगा.

क्या यह बताना अब जरूरी है कि यह पोस्ट मोदी विरोधी थी.

वैसे मितरों, भक्तों में मेरी गिनती नहीं होती. लेकिन विकल्प ‘कोई न कोई’ नहीं है, जो है वो दिख रहा है इसलिए उससे तो मोदी बेहतर है.

और जो भी काम वे नहीं कर पाये हैं, खास कर शिक्षा में, उसके कारण मैं समझता हूँ. एक-दो बार सब को समझाने का भी प्रयास किया है लेकिन लोगों की सरकार के बारे में जो अवधारणाएँ हैं उनके आगे हतप्रभ हूँ.

मेरी सोच क्लियर है. हमारे विरोधी नहीं हैं, ‘शत्रु’ हैं. और जिस तरह से वे क्रियाशील हो रहे हैं, युद्ध के पैंतरे भी समझ में आ रहे हैं.

तो अगर युद्ध है तो सेना में एकजुट होना है… और अगर सेना है तो अनुशासित भी चलना है, क्योंकि उसी में हमारी सुरक्षा है. जब भी कोई अनुशासनहीन हुआ है, कितना भी बड़ा योद्धा हो, दुर्दशा को ही प्राप्त हुआ है.

वैसे युद्ध के सभी निर्णय सही नहीं होते, फिर भी अगर शंका और कुतर्क न करते हुए पूरी ताकत झोंक दें तो गलत निर्णय भी सही में पलट सकता है… और इसके विपरीत, सही निर्णय हो कर भी जीत की जगह हार का मुंह देखना पड़ता है. इसलिए मेरे लिए अनुशासन और troop morale मायने रखता है.

बाकी जो केवल छिद्रान्वेषण में आत्मगौरव अनुभव करते हैं उनको नमस्कार है. बस इतना ही जानिए बंधु कि यह काम भी मैं शायद आप से बेहतर कर सकता हूँ.

तीक्ष्ण दृष्टि गरुड़ की भी होती है, गिद्ध की भी और कौवे की भी. उनका अपना-अपना आहार ही उनके बीच क्या फर्क है यह बतलाता है.

आप की शिकायत है कि मोदी जी ने हिंदुओं के लिए कुछ नहीं किया. इस पर भी विस्तार से लिख चुका हूँ. लेकिन हिंदुओं के लिए कुछ होता देखना चाहते हैं तो आप को भी पता है कि केवल मोदीजी की सत्ता में ही कुछ करने का अवसर मिलेगा, उनका विकल्प खड़ा करने का भी.

[हटाने की बात सोचने से पहले, निर्मित तो कर लें बेहतर विकल्प]

आज जो उनकी जगह आना चाहते हैं उन्हें तो आप देख ही रहे हैं. किस तरह महबूबा, कठुआ को CBI जांच से बाहर रखने को छटपटा रही है. वहाँ ममता ने अपनी सरकार की आलोचना को गुनाह भी बना दिया. निर्भया के सब से वहशी बलात्कारी को सेटल करने वाला केजरीवाल दिल्ली में क्या कर रहा है यह भी दिखाई दे रहा है. और मंदबुद्धि भारतीटालीयन को तो आप देख ही चुके हैं. पंचतंत्रकार विष्णु शर्मा भी इनके सामने दंडवत कर के सरपट भाग जाते.

अमेरिकन सेना के जनरल कोलिन पॉवेल का एक प्रेरक passage पढ़ा था. उन्होने कहा था कि हर बात में फेल होने के आसार तो होते ही हैं, लेकिन इसलिए जो कहे आप फेल होंगे वो कोई जीनियस नहीं साबित होता. कारणों के साथ कहे और अलग रास्ता बताने का तजुर्बा जिसके पास हो, उसकी सुननी चाहिए.

बस, सब को इतना ही कहना है कि आलोचकों से इतना ही पूछिए कि क्या उनके पास कोई व्यावहारिक प्लान है भी या वे केवल आलोचना में masochistic मज़ा लेते हैं? हाय हाय, हिंदुओं का कुछ नहीं हो सकता! हिन्दू मरने को अभिशप्त है!

आप हिन्दू ही हो ना? तो बचने बचाने की सोचिए, क्यों एडवांस में अपने बेटे बेटियों और पोते नातियों के मरसिए गा रहे हैं आप?

वैसे व्यावहारिक प्लान की बात मैं कर सकता हूँ, तैयार भी है लेकिन ढंग के आदमी से पाला पड़ा नहीं है अभी. इसपर भी लिख चुका हूँ, कितनी बार लिखें.

बस अब इतना ही कहना है कि संगठित हों और एक लक्ष्य को लेकर काम करें. 2019 जीतना है और उसके बाद 2014 जैसा आराम नहीं करना है इतना ध्यान रखें. तभी 2024 में टेंशन नहीं होगा.

मोदी जी को, मोदी एक व्यक्ति न समझ कर, हमारे लिए हिंदुस्तान को हिंदुस्तान ही रखने का मौका है यह समझिए. वे lever है, उससे पत्थरों को हटाने का काम हमें ही करना होगा.

जय हिन्द!

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