बिसात हो तो अपने चेहरे सामने लाओ: यह देश, इसकी संस्कृति, सनातनी आदर्श काले करना चाहते हैं तुम्हारे चेहरे

अपराध सिद्ध आरोपी महज एक अपराधी होता है… इसे भारतीय संस्कृति स्थापित ही नहीं, बल्कि इसके ऊंचे आदर्श भी समाज के सामने रखती है.

आज आसाराम नाम का एक धार्मिक कारोबारी यौन अपराध में सिद्ध हुआ, उच्चतम सज़ा पाकर अपनी नियति को देखने पर विवश.

कभी इसी देश में गांधी की हत्या का आरोपित नाथूराम अपराध सिद्ध होने के बाद उच्चतम सजा ‘फांसी’ का हक़दार हुआ.

न नाथूराम की फांसी के विरोध में तब कोई हिंदू सड़कों पर उतरा, न आज आसाराम की सज़ा के खिलाफ कोई भीड़ सड़कों पर है.

इन दोनों में कोई साम्य या तुलना नहीं है यहां… लेकिन साम्यता इस देश के व्यवहार में ज़रूर है दोनों उदाहरणों में.

यह देश, भारतीय संस्कृति और सनातनी आदर्श… खुद को कुछ यूं परिमार्जित करते हैं. यही सतत सुधार, बदलाव सनातन को सनातन बनाते हुए शब्द को सार्थक सिद्ध करते हैं.

परिवर्तन से सनातन खतरे में नहीं आता… और भी शुद्ध, शक्तिशाली होकर निखरता है.

देश के हाथों में कालिख़ तैयार रहनी चाहिए :

अफ़ज़लों, याकूबों, बुरहानों की सज़ाओं पर शर्मिंदा होने वाले गिरोहों, आधी रात तक अपराधसिद्ध अपराधी के लिए लड़ने वाले दलाल वकीलों, बड़ी टिकुली गैंग… अपने चेहरे सामने लाओ.

देश की संवैधानिक व्यवस्था के मान की हानि करने की आरोपित कांग्रेस, माकपा, भाकपा, सपा, बसपा, एनसीपी… अपने चेहरे सामने लाओ.

कठुआ की बच्ची आसिफ़ा की दुःखद क्रूर हत्या (बलात्कार नहीं) पर फर्ज़ी मुहरर्मी मरसिये, तबर्रे पढ़ने वालों… और दिल्ली की ग्यारह साला बच्ची गीता से मदरसे के मौलवी द्वारा बलात्कार पर चुप रहने वाले गिरोहबाजों… अपने चेहरे सामने लाओ.

राजनैतिक विरोध और वैचारिक मनरेगा-कर्म के चलते कभी टीवी की स्क्रीनें काली करने वाले ख़बरमण्डी के खोमचे-ठेलेबाजों… अपने चेहरे सामने लाओ.

नैतिक भँसोट उर्फ बिसात हो तो अपने चेहरे सामने लाओ : यह देश, इसकी संस्कृति और सनातनी आदर्श तुम्हारे चेहरे काले करना चाहते हैं.

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