द जंगल बुक : जानवरों के एंगल से मानव को समझने की कोशिश

आज ‘जंगल बुक’ देख आया. आप जानते ही हैं कि यह हॉलीवुड फिल्म रुडयार्ड किपलिंग के इसी नाम के एक कहानी संग्रह पर आधारित है.

किताब में वर्णित ‘मोगली’ मध्य प्रदेश के सिवनी के जंगल में भेड़ियों को मिला था, ऐसा माना जाता है.

कहानी के अनुसार, जंगली जानवरों के बीच ही पल-बढ़ कर जंगल को आत्मसात कर लिया था मोगली ने.

इस कहानी पर हॉलीवुड की यह दूसरी फिल्म है. लगभग 50 साल पहले भी अमेरिका में ही मोगली पर पहली फिल्म बनी थी, इस बार भी वहीं से यह बनकर आयी है.

हालांकि हमारी पीढ़ी के लोगों के लिए तो मोगली का अर्थ गुलज़ार साहब की ‘चड्ढी पहन के फूल खिला है’ ही है. लेकिन उससे आगे जा कर भारतीय अमेरिकी बाल कलाकार नील सेठी द्वारा अभिनीत यह नया जंगल बुक भी सफलता के अनेक कीर्तिमान स्थापित कर रही है.

फिल्मांकन, तकनीक, लाइट, कैमरा, एक्शन, अभिनय, संगीत आदि जिन चीज़ों के कोलाज को फिल्म कहा जाता है, का कोई ज्ञाता हूं नहीं, तो उस पर क्या बात की जाय?

बस इतना तो हम सब जानते ही हैं कि पश्चिम की तकनीक हमसे काफी आगे है ही, ऐसी फिल्म अभी तो भारत में बन पाना संभव नहीं है.

हॉलीवुड को प्रत्यक्ष देख कर आने का भी अवसर मिला है, उसे देखते हुए समझना कठिन है कि वहां कैसे इतनी बड़ी-बड़ी फिल्मों का निर्माण होना संभव हो पाता होगा?

वैसे यह भी बताते चलूं कि अमेरिका के इस ‘हॉलीवुड’ जिले का अब प्रतीकों में ही ज्यादा महत्व रह गया है. बस नाम का ही वह डिज्नी है. अधिकतर फिल्मों का निर्माण अब केलिफोर्निया के ही अन्य काउंटीज़ में होता हैं. खैर.

नए जंगल बुक में भी कहानी भले वही हो लेकिन फिल्मकार ने इस बार कुछ अलग तरह से सोचने की कोशिश की है. एक तरह का उलटबांसी, कि मानव के एंगल से जानवरों के देखते रहने के अभ्यस्त लोग ज़रा जानवरों के एंगल से मानव को समझने की कोशिश करें.

ज़रा यह कल्पना करें कि जानवर लोग हम इंसानों के बारे में क्या सोचते हैं. जैसे हम इंसान हर वक्त इस चिंता में दुबले होते रहते हैं कि हमारा बच्चा जंगली न हो जाय, वह सभ्य बने, उसी तरह भेड़ियों और उनका समूह इसी बात की चिंता में पूरी फिल्म निकाल देते हैं कि मोगली में लेशमात्र भी ‘मानवापा’ न आ सके, वह ‘इंसान’ जैसी गैर जंगली हरकत न करने लगे.

मोगली को हमेशा ‘सभ्य’ बनाये रखने की कोशिश ही इस फिल्म का वैचारिक पक्ष है. वैसे भी जंगल के राजा शेर खान के अलावा लगभग सभी जानवर दोस्त ही हैं मोगली के, शेर खान को चूंकि इंसानों की फितरत का अहसास है, इसलिए वह मारना चाहता है मोगली को.

शेर खान जानता है कि अगर सच में मोगली इंसान बन गया तो पर्यावरण बिगाड़ कर रख देगा. इंसानी बस्तियों में पहुच कर रक्तफूल (आग) पाकर जब मोगली गलती से जंगल में आग लगा देता है तब कहता भी है खान कि देखा, यह भी आखिर आदमी ही निकला न?

अंततः बाघीरा को भी पता चल जाता है कि जंगली तौर-तरीके से शेर खान को मारना संभव नहीं है, तब आपातकाल में मोगली को कहा जाता है कि वह आदमियाना तरीके अपना कर ही खत्म करे दुश्मन को. भेड़िया बन उसे खत्म कर पाना संभव नहीं.

फिर जैसा कि फिल्मों में होता है, खलनायक शेर परास्त होता है. मोगली सभ्य जानवर बनकर फिर राजी-खुशी जंगल में रहने लगता है. बस.

फिल्म का बेहतरीन बिम्ब रक्तफूल ही है. वस्तुतः जिसे हम आग कहते हैं, वही हमारे और जानवरों के बीच विभाजक रेखा है. फिल्म में जानवरों का समाज भी यही मानता है कि अगर ‘सामाजिक प्राणी’ की तरह उन्हें भी आग का इस्तेमाल करना आ जाय, पा जाएं वह भी आग की ताकत, तो वे भी आदमी जैसे ताकतवर हो जायेंगे.

यहां तक की अपने सूबे का संप्रभु सम्राट चिंपांज़ी भी इस लिए इंसान मोगली का अपहरण कराता है कि वह किसी भी तरह से ‘आग’ उसे दिला दे ताकि उसका राज अक्षुण्ण रहे.

वास्तव में आग का यह रूपक हमें उस युग में ले जाता है जब हम और पशु बराबर जैसेसा ही थे. आखिर मार्क्स के चिंतन और उसके ‘पूंजी’ का आधार भी तो आग ही है न? यही तो कहा जाता है कि आग-कालीन युग से पहले हम सब भी जानवरों की तरह ही ‘शालीन और निर्दोष’ थे.

इसी किंवदंती के इर्द गिर्द ‘पूंजी’ का सारा विचार कायम है कि जंगल में एक बार भीषण आग लगने से ‘खाना’ खत्म हो गया तो मजबूरी में कच्चे मांस के बजाय जला हुआ मांस ही खाना पड़ा था हमें. वह ज्यादे स्वादिष्ट लगा तो फिर इस जुगत में लग गया मानव कि जला-पका ही खाया जाय. फिर कोशिश करके आग पैदा करना सीख गए.

जब पका मांस मिलने लगा तो उसे सुरक्षित रखने की भी कवायद शुरू हुई और उससे ही आज की ज़रूरतों के अलावा कल के लिए भी बचा कर रखने के परिपाटी की शुरुआत हुई. यही बचा हुआ मांस क्रमशः ‘पूंजी’ का रूप लेता गया. रूप बदलता भी रहा.

आज भी अगर आप ‘पूंजी’ की ज़रा गहराई से जांच करें तो जले हुए मांसों की गंध उसमें सूंघ सकते हैं. तो फिर जिन्होंने आग का इस्तेमाल सीख लिया वह ‘पूंजीपति’ हो गए, जो आग को पैदा करने की कला नहीं सीख पाए, वह जंगली कहाने लग गए, वही जानवर हुए और वही हमारी नज़र में हमारा आहार बन जाने लायक भी रह गए.

तो गंधाते हुए मांसपिंड को कैपिटल बनाने से शुरू हुई ‘पूंजीवाद’ की यात्रा आज कहां तक पहुची है, शायद एक पूंजीवादी देश में बनी फिल्म इस तरफ भी इशारा करने की कोशिश कर रहा हो.

साथ ही हमारी दृष्टि में सभ्य हम मानव समाज यही प्रार्थना भी करें कि ‘आग’ हमारी ही पूंजी रहे, बेचारे निरीह पशुओं तक इसकी पहुँच न हो नहीं तो वे भी आखिरकार दो-चार किताबें पढ़कर हम जैसे हो जायेंगे. बहरहाल.

बेहतरीन फिल्म. फिल्म का U/A प्रमाणन ठीक ही किया गया है. बच्चों-किशोरों को अकेले देखने में सच में समस्या हो सकती है. फिल्म देखते समय बड़ों का साथ होना सचमुच ज़रूरी है ताकि जब भी शेर खान की दहाड़ से हाड़ ज़रा कांपने लगे तो उसी तरह बच्चों को कलेजे से चिपकाया जा सके जैसे बघीरा, मोगली को चिपका लेता था.

फिलहाल तो बिटिया को यह फिल्म दिखाने की हिम्मत नहीं है मेरी. 3 डी की आभासीय वास्तविकता तो मानो सर चढ़ कर ही नाचने लगती है यहां. इतनी रियल वर्चुअलिटी देखने लायक अभी नहीं हुए हैं बच्चे.

प्रसंगवश यह भी बताते चलें कि एक इनवर्टेड मोगली अपने छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी थे. इनवर्टेड इसलिए क्यूंकि यहां एक ऐसे बाघ की कहानी रची गयी जो इस ‘मोगली’ के साथ खेलता था.

बालक चेंद्रू मंडावी ने यह भूमिका 60 के दशक में निभाई थी, एक स्वीडिश फ़िल्म ‘एन डी जंगल सागा’ और उसका अंग्रेजी संस्करण- ‘द फ्लूट एंड द एरो’ के लिए.

तब के पहुँचविहीन बस्तर तक इस चेंद्रू के कारण दुनिया का मेला सा लग गया, मेले में अकेले चेंद्रू अपने बाघ मित्र के साथ स्टार बन गए थे. पांच साल पहले ही उनकी मृत्यु हुई है.

पहले चित्र में अपने बाघ दोस्त से खेलते हुए बस्तरिया मोगली दिख रहे हैं. दूसरी तस्वीर भी रोचक है. यह भी छत्तीसगढ़ से ही हैं. आज के मोगली है ये महाशय. प्रदेश के महाराष्ट्र से लगते नांदगांव के जंगलों में इनका बसेरा है.

इन्हें भी जंगली जानवर ही प्रिय हैं, हालांकि घर वाले जबरन इन्हें आदमी बनाने पर तुले हुए हैं. गोया कोई भी सभ्य प्राणी हम मानव को बर्दाश्त ही नहीं होता. हम आदमी बना कर ही दम लेंगे, ऐसा ठान कर जैसे बैठे रहते हों हम.

चेंद्रू मंडावी के जीवन पर एक विशेष रिपोर्ट इस वीडियो में

जंगल की इतनी बातों से डरने की ज़रूरत नहीं है. शेर खान मर चुका है, शेष बघीरा, अकेला सब अच्छे प्राणी हैं. उन्होंने आग का इस्तेमाल अभी तक नहीं सीखा है. पूंजीवादी भी नहीं बने हैं वो जानवर. सो बिना जागे हुए चैन से तब तक सोये रहिये जब तक उन तक आग की पहुँच न हो जाय या वे भी आग को नियंत्रित करना सीख न लें.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY