‘सीता-राम की जोड़ी’ यूँ ही लाखों साल से ‘दाम्पत्य के सबसे सुखद जोड़े’ का पर्याय नहीं

Painting by J D Gondhalekar

‘भगवान राम’ को जब पिता दशरथ वन जाने की आज्ञा देते हैं तो वो पिता के आदेश का अनुपालन करते हुये वन जाने को प्रस्तुत हो जाते हैं और अपने सभी गुरुजनों, मंत्रिपरिषद के लोग, प्रजाजनों तथा परिजनों से मिलने और अंतिम आज्ञा लेने जाते हैं.

इस क्रम में राम सबसे पहले अपनी जननी कौशल्या के पास जाते हैं और माता से अपने वनगमन की बात कहते हैं. माँ शोकमग्न हो जाती हैं. उसी समय अनुज लक्ष्मण भी वहां उपस्थित होते हैं और दोनों राम से कहते हैं कि वन न जाओ.

लक्ष्मण तो ये तक कह देते हैं कि आप मेरी सहायता से राज्य का शासन बलपूर्वक अपने हाथ में ले लीजिये. शोक में डूबी माँ कौशल्या लक्ष्मण की बातों का अनुमोदन करती हैं और दोनों श्रीराम को उनके धर्म का पालन करने से रोकते हैं.

राम किसी उन्हें तरह समझा-बुझाकर वहां से निकल जाते हैं तो पुनः लक्ष्मण उनको कई तरह से समझाने की कोशिश करते हैं कि वो वन जाने का विचार त्याग दें और सत्ता पर बलपूर्वक अधिकार प्राप्त कर लें.

मगर धर्म का पालन करने और कराने हेतु धरती पर अवतरित भगवान नहीं मानते. राम वन जाने से पूर्व जिस-जिस के पास भी जाते हैं सब राम से यही कहतें हैं कि तुम वन न जाओ और अयोध्या का शासन अपने हाथों में ले लो.

सारी प्रजा, सारे गुरुजन, सारे मंत्रियों में से कोई भी नहीं था जिसने राम से ये कहा हो कि तुम अयोध्या के महाराज दशरथ की इस आज्ञा का अनुपालन करो और पिता की आज्ञा का पालन कर धर्म के रक्षक बनो.

वनवास पूर्व श्रीराम को उनके धर्मपथ और कर्तव्य-पथ से विरत न करने वालों में एक ही नाम है और वो नाम है उनकी भार्या “जानकी” का. प्रभु जब अपनी पत्नी को अपने वन जाने की आज्ञा के बारे में बताते हैं तो वो एक बार भी उनसे नहीं कहतीं कि आप पिता और माता की आज्ञा का उल्लंघन कर दो और बलपूर्वक शासक बन जाओ. धर्म-मार्ग और कर्तव्य-पथ की ओर कदम बढ़ा चुके श्रीराम को एक बार भी वो अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को नहीं कहतीं बल्कि सीधा उनसे कहतीं हैं ,

“आर्यपुत्र ! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू – सब पुन्यादि कर्मों का भोग भोगते हुये अपने-अपने भाग्य के अनुसार जीवन-निर्वाह करते हैं मगर हे पुरुषवर ! केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है; अतः आपके साथ ही मुझे भी वन में रहने की आज्ञा मिल गई है. रघुनंदन ! यदि आप आज ही दुर्गम वन की ओर प्रस्थान कर रहे हैं तो मैं रास्ते के कुश और काँटों को कुचलती हुई आपके आगे-आगे चलूंगी.

उस समय के दो महान साम्राज्य जनकपुर और अयोध्या की बेटी और बहू ‘सीता’ वल्लक वस्त्र धारण कर नंगे पांव पति की सहचारिणी बनकर वनवासिनी हो गई और दुनिया में स्वयं का नाम श्रीराम के साथ अमर कर लिया.

जानकी ने केवल अपने पति के लिये वनवासी जीवन को चुना था जबकि श्रीराम, दशरथ और सारे अयोध्यावासी उनसे अयोध्या के राजमहलों में रहने के लिये कह रहे थे. जानकी ने केवल अपने पति के लिये असीम दुःख उठाये. जानकी धर्म की रक्षण का संकल्प लिये अपने पति के राह की बाधा नहीं बनी बल्कि उनकी मजबूती बनकर उठीं.

किसी मजबूरी में राम को सीता का परित्याग करना पड़ा पर जानकी ने न तो अपने पति के लिये और न ही अपने किसी ससुराल वाले के लिये कभी कटु वचन कहे और अपने बेटों लव और कुश को राम का पावन चरित ही सुनाया.

आज जानकी के इस धरती को छोड़े हुये लाखों साल बीत गये हैं पर ‘पत्नी रूप में नारी’ की अन्यत्र मिसाल विश्व ‘सीता’ के अलावा खोज नहीं पाया है. ‘स्वामी विवेकानन्द’ कहते थे कि भारत की हर बालिका को सीता जैसे बनने का आशीर्वाद दो. हिन्दू जाति को सबसे अधिक गौरवशाली वो इसलिये मानते थे क्योंकि हममें सीता पैदा हुई थी.

श्रीदुर्गा सप्तशती में हम ‘माँ’ से मांगते हैं,

पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोभ्दवाम्।।

अर्थात :- हे मां मन की इच्छा के अनुसार चलनेवाली मनोहर पत्‍‌नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसारसागर से तारनेवाली तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो.

श्रीराम को ऐसी ही पत्नी तो मिली थी जो अपने पति के मन को पढ़ने वाली, उनके इच्छा के अनुरूप आचरण करने वाली और उनके मन के अनुकूल खुद को ढ़ालने वाली थी. धर्मपालक श्रीराम वन जायेंगे ही और उनको उनके इस निश्चय से डिगाया नहीं जा सकता ये बात जानकी के सिवा कोई नहीं जानता था इसलिये जानकी ने उन्हें एक बार भी रुकने को नहीं कहा बल्कि स्वयं उनके साथ वन के कष्टों को सहने को प्रस्तुत हो गईं.

“सीता-राम की जोड़ी” यूँ ही लाखों साल से ‘दाम्पत्य के सबसे सुखद जोड़े’ का पर्याय नहीं बनी हुई है और जानकी यूँ ही भारत की महान नारियों में अग्रगण्य नहीं है.

मैं ‘तिरहुत क्षेत्र’ का हूँ, उसी ‘तिरहुत क्षेत्र’ का जो त्रेता युग में राजा जनक के राज्य का हिस्सा था और जहाँ की पावन माटी से आज के दिन ही माँ जानकी का प्राकट्य हुआ था. ये मेरे लिये बहुत गौरव की बात है कि मैं भी उसी मिट्टी में जन्मा जहाँ से ‘जानकी’ थी.

इस नाते हम ‘श्रीराम’ के ससुराल पक्ष वाले हैं, ‘जानकी’ हमारे यहाँ की बेटी थीं इसलिये उनको नमन करने का पहला अधिकार हमारा है.

माता सीता के पावन अवतरण दिवस “जानकी नवमी” की आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

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