काम की राजनीति और वोट की राजनीति अलग-अलग होती है

भीमराव रामजी अम्बेडकर को लेकर एक संदेश सोशल मीडिया में कई दिनों से मंडरा रहा है कि यदि संविधान को अंबेडकर ने बनाया तो फिर भारतीय संविधान सभा के बाक़ी 388 सदस्यों ने क्या किया?

इस संदेश में कहा गया है कि अम्बेडकर इस सभा की कई समितियों में से एक ड्राफ्ट कमेटी के अध्यक्ष भर थे. ऐसे में उनको संविधान निर्माता कहना उचित नहीं.

इस पर कुछ लोग सीधा जवाब देने की बजाय पूछ रहे हैं कि मोदीजी खुद ही अम्बेडकर को ही निर्माता मानते हैं… तो क्या वे देश को गलत जानकारी दे रहे हैं…

दरअसल मोदीजी को वोट चाहिये… और इस लोकतांत्रिक मॉडल का सबसे बड़ा सच वोट ही है… काम की राजनीति और वोट की राजनीति अलग-अलग होती है…

जैसे अभी सुप्रीम कोर्ट ने sc/st एक्ट में पुलिस पर कुछ प्रतिबन्ध लगाए… सब जानते हैं कि ये एक सही कदम था, पर केंद्र ने इस पर पुनर्विचार याचिका लगा दी.

ये वोट की राजनीति है और इसमें कुछ गलत भी नहीं… चुनाव नहीं जीतेंगे तो काम कैसे करेंगे.

इसी तरह वोट की राजनीति के लिए पिछली सरकारों ने अम्बेडकर का जमकर महिमामंडन किया और आज मोदी को भी वही करना पड़ रहा है, फिर कहूंगा कि इसमें भी कुछ गलत नहीं…

मोदी व अन्य पूर्ववर्ती सरकारों से पूछना तो ये चाहिए कि अपने गढ़े भगवान अम्बेडकर की मुसलमानों व पाकिस्तान के बारे में राय से वे सहमत हैं अथवा नहीं? असहमत हैं तो महिमामंडन बंद कीजिए और सहमत हैं तो सारे मुसलमानों को पाकिस्तान पहुंचाइये.

पर सबको अपने अपने हिस्से का अम्बेडकर चाहिए, अपनी सहूलियत का अम्बेडकर चाहिए…

अगर चुनाव जीतने में इससे कुछ मदद मिलती है तो हमें कोई दिक्कत नहीं कि कल को मोदी, बाबा साहब की जगह भगवान अम्बेडकर भी कह दें…

दिक्कत ये भी है कि देश के अधिकतर स्वघोषित ‘वरिष्ठ और निष्पक्ष’ पत्रकार अध्ययन-मनन से परहेज़ करने लगे हैं, और शायद राजनीतिक दलों के पे-रोल पर है.

देखिए इस video में संबित पात्रा किस खूबी से अम्बेडकर पर कांग्रेस और राहुल गांधी को घेर रहे हैं…. तो कोई दिक्कत नहीं अगर अम्बेडकर को संविधान निर्माता कह कर भी कांग्रेस और उसके प्रथम परिवार का विनाश हो… आखिर मोहनदास गांधी को भी तो राष्ट्रपिता कहते-सहते आए हैं.

सिर्फ़ ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन कैसे पा गया संविधान निर्माता का दर्ज़ा

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