World Book Day : किताबें मंगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे, उनका क्या होगा

आज विश्व पुस्तक दिवस है. आज शेक्सपीयर का जन्म एवं प्रयाण दिवस भी है. इस दिन को दुनिया विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाता है. इसी सन्दर्भ में किसी अन्य प्रयोजन से लिखा था यह, आप भी पढेंगे तो अच्छा लगेगा, साथ ही आप अपनी पसंद की कृतियों का नाम भी बता सकते हैं.

विश्व पुस्तक दिवस पर अपन ने स्मृति को खंगाला कि अंतिम पुस्तक कब पढ़ी थी. ज़रा निराश हुआ और अपने पुस्तक संग्रह की तरफ नज़र घुमाई. अपने अनेक प्रिय लेखक उन अलमारियों से झांक रहे थे और मुझे यकायक गुलज़ार याद आ गए. वे लिखते हैं :-

किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर

बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे,
छूते थे जबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मंगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे!

किताबों से राबता कम होते जाने का यह संकट शायद अपना ही नहीं है केवल, ऐसा लगता है कि जीवन की आपाधापी में, हम सब इससे मानो दूर जैसे होते जा रहे हैं. सम्प्रेषण और संचार के साधनों ने भी ज़रा दूर किया है हमें इनसे तो ज़ाहिर है मनोरंजन के भी अनेक उपक्रम सबसे ज्यादा किताबों पर ही भारी पड़े हैं.

फिर भी किताबों का रोमांस स्थायी है और यह कभी कम नहीं हो सकता. जिन शेक्सपीयर की स्मृति में आज का यह दिन मनाया जाता है, उन्होंने खुद ही कहा है पढ़ने के विरुद्ध भी वही सबसे बेहतर तर्क दे सकता है जिसने काफी अच्छे से पढ़ाई की हो.

यहां हम बात करेंगे अपनी पसंदीदा पुस्तकों/रचनाओं के बारे में. कल्पना कीजिये कि हमें दुनिया से दूर किसी ऐसे टापू पर भेज दिया जाय, जहां हमारे पास सूचना, शिक्षा या मनोरंजन के कोई भी साधन उपलब्ध नहीं हो, साथ में केवल एक पुस्तक रखने की गुंजाइश हो, तब आप कौन सी पुस्तक रखना चाहेंगे? मेरी समझ से भारत के अधिकांश सामान्य लोग जिस पुस्तक को साथ रखना चाहेंगे, वह होगी श्रीरामचरित मानस.

देश में सबसे ज्यादा प्रसारित यह एकमात्र ऐसा ग्रन्थ हो सकता है जो बचा रहे तो हम फिर से इस सुत्र से ही संसार या कम से कम भारत का सारा कुछ फिर से रच सकते हैं. खुद तुलसी अपने इस ग्रन्थ के बारे में लिखते हैं कि उन्होंने सभी सभी वेद, सारे उपनिषद और सभी पुराण आदि का जो निचोड़ है, वही बोलचाल की भाषा में पाठकों के समक्ष उन्होंने रखने की कोशिश की है. यानी इसे अगर हम समय के अनुकूल व्याख्या करें तो यही कह सकते हैं कि तमाम पांडित्यपूर्ण भाषा के बजाय हम सहज, सरल शब्दों में जो साहित्य रचते हैं, वही सबसे महान साहित्य कहा जाना चाहिए.

ऐसी ही कोशिश एक बार पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी की, और उनका नाटक ‘चन्द्रगुप्त’ सामने आया. कहते हैं रात भर में ही पंडित जी ने इसे रच दिया था, और यह बच्चों के लिए रचा गया था लेकिन फिर यह कृति काफी चर्चित हुई. आशय यही कि सबसे सरल लिखना सबसे कठिन है. और कालजयी लेखन उसे ही कहा जा सकता है जो बोधगम्य हो.

इनके अलावा अगर कोई एक पुस्तक सबसे ज्यादा पठनीय है देश के लिए, तो वह है रामधारी सिंह दिनकर जी का ‘संस्कृति के चार अध्याय’ जिसमें भारत की संस्कृति को चार अध्यायों में बांट कर समूचे भारत के सारांश को एक पुस्तक में समेट देने का अद्भुत कार्य किया गया है.

हालांकि दिनकर जी के कुछ तथ्यों को लेकर काफी मतभेद भी हैं, हम भी उनके सारे तथ्यों से सहमत नहीं हो सकते फिर भी पुस्तक के बारे में खुद दिनकर जो कहते हैं वहीं हमारे लिए भी सूत्र जैसा है. वे लिखते हैं- ‘उत्त्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम जहां भी हिन्दू बसते हैं उनकी संस्कृति एक है एवं भारत की प्रत्येक क्षेत्रे विशेषता हमारी इसी सामासिक संस्कृति की विशेषता है.’

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भी इस व्याख्या से सूत्र रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है राष्ट्र का आधार संस्कृति के होने की बात है. इस पुस्तक में दिनकर जी ने छत्तीसगढ़ के सरगुजा के रामगढ़ पहाड़ी के भित्ति चित्रों तक का कितना सुन्दर वर्णन किया है, वह पठनीय है.

हम जानते ही हैं कि पंडित नेहरू ने इस किताब की भूमिका लिखी है. पंडित जी के बारे में भी हम कह सकते हैं कि आप अगर कुछ अच्छा पढना चाहें तो पंडित नेहरू की लिखी सारी की सारी पुस्तकों को भी आप एक सांस में पढ़ सकते हैं, सहमति-असहमति अपनी जगह लेकिन ‘लेखक’ नेहरू निश्चय ही पठनीय हैं. आप आत्मकथा पढ़े तो गांधी जी का ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग.’ इससे पारदर्शी, ऐसा इमानदार तो शायद ही कुछ हो सकता है.

जब हम साहित्य की विधाओं की बात कर ही रहे हैं तो एक कहानी का जिक्र करना चाहूंगा, जिसने हमारे मन पर बड़ी छाप छोड़ी थी, वह है फ्रांस के महान लेखक गाय द मोपांसा की नेकलेस. लगभग सौ-सवा वर्ष पहले मोपांसा ने वह लिखा है जो आज की सच्चाई ज्यादा है.

उदारीकरण के बाद जिस तरह बाजारबाद, उपभोक्तावाद के शिकंजे में फंस कर हम दिखावे का जीवन जी रहे हैं, उसका मार्मिक वर्णन उस कहानी में है, जहां दोस्त से मांग कर लाये एक हीरे के हार के खो जाने पर उसकी भरपाई में नायक अपना जीवन बर्बाद कर देता है, सच्चाई उसे अंत में पता चलती है कि वह हार नकली था.

जब अनेक विधा की बात हो ही गयी तो कविता की बात भी क्यूं न हो भला? अनेक बार यहां लिखा है. कवि रामदरश मिश्र जी की कविता सबको एक बार पढनी ही चाहिए, जिस बाजारबाद की बात अपन ने अभी की है, इसके खिलाफ शंखनाद जैसी है उनकी यह कविता, जिसे हर भले व्यक्ति को अपना जीवन दर्शन बना लेना चाहिए.

रामदरश जी हमें बताते हैं कि – काहे की इतनी आपाधापी, किस बात का इतना संघर्ष है, क्यूं इतनी मारामारी भाई? हम सफल तभी कहें खुद को जब कहीं एक जगह पर पहुंच जाने के बाद उन्नत मस्तक, उभरा सीना और स्वाभिमान के साथ यह उद्घोष कर सकें कि –

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे.
किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे-धीरे.

जहां आप पहुंचे छलांगें लगाकर,
वहां मैं भी आया मगर धीरे-धीरे.

पढ़ना लिखना जारी रखिये भगवन. कंप्यूटर और सोशल मीडिया का तिलिस्म तोड़ते हुए अपन भी फिर से कुछ पढ़ने लग जायें, ऐसी शुभ कामना भी दीजिये. शुभ-शुभ.

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