ऐसा कुकर्म कोई पहली बार नहीं कर रही काँग्रेस

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने एक फैसला सुनाया था.

अपने उस फैसले में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को भ्रष्ट तरीकों से चुनाव लड़ने का दोषी ठहराया था और उनको चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया था.

फैसला आते ही उसके विरोध में उत्तरप्रदेश काँग्रेस के एक तत्कालीन चर्चित नेता ने साथी काँग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट के गेट पर जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का पुतला फूंका था.

इसके साथ ही जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा को जमकर गालियां बकते हुए नारे लगाए थे कि…

“इन्दिरा तेरी सुबह की जय,
इन्दिरा तेरी शाम की जय.
इन्दिरा तेरे काम की जय,
इन्दिरा तेरे नाम की जय..”

1980 में काँग्रेस की यूपी की सत्ता में वापसी होते ही इन्दिरा गांधी, संजय गांधी की जोड़ी ने लगभग दर्जन भर वरिष्ठ काँग्रेसी नेताओं की अनदेखी और उपेक्षा कर के उस चर्चित काँग्रेसी नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) को पुरस्कार स्वरूप यूपी का मुख्यमंत्री नियुक्त कर चौंका दिया था.

सिर्फ यही नहीं उस फैसले के विषय में परम सेक्युलर और प्रचण्ड भाजपा विरोधी की अपनी पहचान वाले प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि…

“इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के कई महीने बाद मैं जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा से इलाहाबाद में उनके घर में मिला था. उन्होंने मुझे बताया था कि एक काँग्रेस सांसद ने इन्दिरा गांधी के पक्ष में फैसला सुनाने के लिए उन्हें रिश्वत देने की कोशिश की थी.

इसी तरह न्यायालय में उनके एक सहकर्मी साथी जज ने भी उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाए जाने का प्रलोभन दिया था.

सिन्हा की मुश्किल यह थी कि वे अपने फैसले को दूसरों की नज़रों में आने से कैसे रोकें. उन्होंने अपने स्टेनोग्राफर को छुट्टी पर भेज दिया और और फैसले का अहम हिस्सा स्वयं अपने हाथ से लिखा.

फिर भी, सरकार की गुप्तचर एजेंसियां फैसले की गंध पाने की कोशिशों में जुटी रहीं. जस्टिस सिन्हा की धार्मिक प्रवृत्ति को देखते हुए साधू सन्यासियों तक का इस्तेमाल किया गया.”

कुलदीप नैयर अपनी किताब में लिखते हैं कि “सरकार के लिए फ़ैसला इतना महत्वपूर्ण था कि उसने सीआईडी के एक दल को इस बात की ज़िम्मेदारी दी थी कि किसी भी तरह ये पता लगाया जाए कि जस्टिस सिन्हा क्या फ़ैसला देने वाले हैं?”

उन्होंने लिखा है, ”वो लोग 11 जून की देर रात सिन्हा के निजी सचिव मन्ना लाल के घर भी गए. लेकिन मन्ना लाल ने उन्हें एक भी बात नहीं बताई. सच्चाई ये थी कि जस्टिस सिन्हा ने अंतिम क्षणों में अपने फ़ैसले के महत्वपूर्ण अंशों को जोड़ा था.”

कुलदीप नैयर ने आगे लिखा है कि… “बहलाने फुसलाने के बाद भी जब मन्ना लाल कुछ बताने के लिए तैयार नहीं हुए तो सीआईडी वालों ने उन्हें धमकाया, ‘हम लोग आधे घंटे में फिर वापस आएंगे. हमें फ़ैसला बता दो, नहीं तो तुम्हें पता है कि तुम्हारे लिए अच्छा क्या है.’

मन्ना लाल ने तुरंत अपने बीबी बच्चों को अपने रिश्तेदारों के यहाँ भेजा और जस्टिस सिन्हा के घर में जा कर शरण ले ली. उस रात तो मन्ना लाल बच गए, लेकिन जब अगली सुबह वो तैयार होने के लिए अपने घर पहुंचे, तो सीआईडी की कारों का एक काफ़िला उनके घर के सामने आकर रुक गया था.”

43 साल पहले की यह घटना तथा इस घटना के 40 साल बाद भी 2015 में उस सुप्रीम कोर्ट से तीस्ता सीतलवाड़ की गिरफ्तारी पर रोक का आदेश अपनी एक मोबाइल कॉल से करा लेने वाले कपिल सिब्बल की महारत के उदाहरण तक का लम्बा सफर बहुत कलुषित और कलंकित है.

अभिषेक मनु सिंघवी की वो बहुचर्चित ‘जज बनाऊ सीडी’ सरीखे कई अश्लील और शर्मनाक अध्याय उस सफर के गवाह हैं जहां देश की न्यायपालिका को अपनी उंगलियों पर नचाने की कोशिशें लगातार होती रहीं हैं.

अतः सम्भवतः आज ऐसा नहीं कर पाने की काँग्रेसी तिलमिलाहट ही है जो देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अनर्गल आरोपों की बौछार कर उनके खिलाफ महाभियोग लाने का प्रयास कर उन्हें डराने, धमकाने, अपमानित करने की हर निकृष्ट कोशिश कर रही है.

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