ऐसे तो ख़त्म कर दी जाएगी हमारी शीर्ष संस्थाओं की विश्वसनीयता

संस्थाओं के प्रति घटती विश्वसनीयता पर हम पिछले कुछ वर्षों से बात करते रहे हैं.

इलेक्शन कमिशन, आरबीआई जैसी तमाम संस्थानों की मिट्टी पलीद करने में वर्तमान नीति निर्माताओं ने कोई कसर शायद ही छोड़ी हो.

पर विपक्ष के इरादे सरकार से कहीं खतरनाक हैं. वो अपने सहूलियत के हिसाब से संस्थानों के प्रतिमान गढ़ना चाहती है.

एक पल को डावांडोल हुई व्यवस्था में हम पुनः विश्वास स्थापित कर सकते हैं. पर विपक्ष की जो कोशिश है, वो लोगों के मस्तिष्क पर दूरगामी दुष्प्रभाव छोड़ेगी.

फिर उससे उबरना कठिन होगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों से हर बार व्यवस्था में उम्मीद ही बंधाई है. चाहे वो कड़े फैसले ही क्यों न रहे हों.

ऐसे में ये कहने को तो ठीक है कि उपराष्ट्रपति अगर प्रस्ताव स्वीकार लें तो बेहतर होगा. क्योंकि तब संसद में बहस होगी और विपक्ष एक्सपोज़ होगी.

मैं मानता हूं कि आपका मानना ठीक है, लेकिन इसमें दूरदर्शिता की कमी है.

सोचिये ये एक ऐसा प्रस्ताव है जहाँ राजद जैसी पार्टी, जो वर्तमान सरकार के खिलाफ हर मसले पर सबसे अधिक मुखर रही है, ने भी समर्थन करने से मना कर दिया है.

तमाम मुद्दों के होते हुए भी विपक्ष क्यों इस तरह जबरन मुद्दे क्रिएट करने में लगा है, ये आम भारतीय समझ के तो बाहर की चीज़ है, शायद उनके विदेशी सलाहकारों ने कहा हो!

खैर, जो भी हो, स्थिति निराशाजनक है, ऐसे समय में जब उनके पास जनता के करीब आने के अनेकों विकल्प थे. उन्होंने न सिर्फ उन्हें गंवाया है, बल्कि उल्टे वो जनमानस को अपने खिलाफ करते गए हैं.

पिछले 15 दिनों में सरकार अपना बड़ा वोट शेयर खो रही थी, पर विपक्ष के प्रयासों के कारण वो पुनः सरकार के खेमे में खड़े हैं.

चीफ जस्टिस या किसी अन्य जस्टिस को हटाने के क्लॉज़ ऐसे हैं कि अव्वल तो कोई आधार बनता नहीं इस मामले में. फिर मनमोहन सिंह जैसे लोगों का इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से मना करना संतोषजनक भी है.

उपराष्ट्रपति महोदय को भी चाहिए कि राजनैतिक कारणों से लाए गए इस प्रस्ताव को दोनों ही पक्षों के हाथों खेलने से बचाएं. अन्यथा फिर हमारी शीर्ष संस्थाओं को बचाना सर्वथा मुश्किल होगा.

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