NGO, मीडिया और राजनीति की बलि चढ़ा न्याय

अब समझ में आया कि कांग्रेसी क्यों मुख्य न्यायाधीश के विरूद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाये है.

आज के इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार नरोदा पटिया नरसंहार मामले पर अपने 3,500 से अधिक पेज के फैसले में गुजरात उच्च न्यायालय ने पाया है कि ट्रायल कोर्ट ने पहले ही ‘मान’ लिया था कि पूर्व भाजपा मंत्री माया कोडनानी दोषी थी.

और फिर अपनी इस ‘धारणा’ – ध्यान दीजिये – धारणा के समर्थन में तर्क जुटाए गए कि वह दंगों की मुखिया थी.

उच्च न्यायालय ने कहा है कि कोडनानी को ‘अनुमानों, अटकलों और आशंकाओं’ के आधार पर सजा सुनाई गयी थी, ‘न कि गवाहों के दिए गए वास्तविक साक्ष्य पर.’

हाईकोर्ट न्यायाधीश हर्षा देवानी व न्यायाधीश ए एस सुपैया ने लिखा कि “ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि कोडनानी नरोदा निर्वाचन क्षेत्र से तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी भाजपा की विधायक हैं. इसलिए अगर उन्हें नरोदा निर्वाचन क्षेत्र का सक्रिय नेता नहीं कहा जा सकता, तो फिर उस क्षेत्र में भाजपा का और कौन नेता हो सकता है? इसलिए, ‘अनुमान लगाया जा सकता है’ कि कोडनानी मौके पर मौजूद थी.”

न्यायाधीश हर्षा देवानी व न्यायाधीश ए एस सुपैया के अनुसार उपरोक्त निष्कर्ष चौंकाने वाला है.

ट्रायल कोर्ट को शिकायतकर्ता ने बताया कि घटना स्थल पर बीजेपी के सक्रिय नेतागण उपस्थित थे. और ट्रायल कोर्ट ने मान लिया कि इन नेताओं में मायाबेन कोडनानी भी शामिल थी.

ट्रायल कोर्ट ऐसे कैसे मान सकती थी. उसे गवाहों से पूछना चाहिए था कि उन नेताओं में कौन शामिल था.

ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि चूंकि कोडनानी ने भीड़ को शांत करने की कोशिश नहीं की थी, इसलिए, यह ‘अनुमान लगाया जाना चाहिए’ कि वह उन्हें भड़का रही थी.

इस पर उच्च न्यायालय ने कहा, कि इस तर्क के अनुसार हर उस क्षेत्र का विधायक जहां दंगे हुए है, दंगे भड़काने का दोषी होगा, भले ही किसी भी गवाह ने उन्हें आरोपी के रूप में नहीं चिन्हित किया हो.

अब समझ में आया कि कांग्रेसी क्यों मुख्य न्यायाधीश के विरूद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाये है.

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