सोशल मीडिया, स्लीपर सेल्स, कैंब्रिज एनालिटिका, दुष्प्रचार और भारत-3

जैसा कि पहले भाग में बताया गया था कि सोशल मीडिया अब हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है, और इसके बिना जीवन कि कल्पना अधूरी सी है.

सोशल मीडिया पर अगर सबसे ज्यादा चर्चित एप्लीकेशन/ वेबसाइट कोई है तो वो शायद फेसबुक ही है. दुनिया भर में 200 करोड़ से ज्यादा सब्सक्राइबर्स फेसबुक के हैं.

फेसबुक दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है जिसमें कंपनी का अपना कोई कंटेंट नहीं है, यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ सब्सक्राइबर्स उनका कंटेंट पोस्ट करने कि इजाजत देते हैं, जिसे बाद में शेयर करके अन्य लोग देख/पढ़ सकते हैं.

फेसबुक केवल advertisements से ही कमाई करता है, कुछ समय बाद फेसबुक को यह लगा कि क्यों ना इस प्लेटफार्म का कुछ और भी उपयोग किया जाए. फेसबुक ने अपने प्लेटफार्म को अन्य सॉफ्टवेयर डेवेलपर्स के लिए ओपन कर दिया.

अब अन्य सॉफ्टवेयर डेवेलपर्स और फर्म्स अपनी ऍप्लिकेशन्स को फेसबुक के प्लेटफार्म पर उतार सकती थी. उन्हें इसका जबरदस्त फायदा मिलता था क्योंकि फेसबुक के पास दुनिया का सबसे बड़ा सब्सक्राइबर बेस था. तो किसी भी डेवलपर के लिए ग्राहक थोक की मात्रा में उपलब्ध थे.

अभी तक तो सब कुछ ठीक ही था, क्योंकि ये सब बातें केवल मनोरंजन तक ही सीमित थी. दिक्कत तब आना शुरू हुई जब 2010 में फेसबुक ने अपने ओपन ग्राफ प्लेटफार्म को 3rd पार्टी एप्लीकेशन डेवेलपर्स के लिए खोल दिया.

[सोशल मीडिया, स्लीपर सेल्स, कैंब्रिज एनालिटिका, दुष्प्रचार और भारत-1]

इस प्लेटफार्म में एप्लीकेशन डेवेलपर्स को ये सुविधा दी गयी थी कि वे सब्सक्राइबर/ ग्राहक से परमिशन ले कर उनके पर्सनल डेटा का इस्तेमाल कर सकते थे. और ग्राहक ही नहीं, उनके नेटवर्क में उपस्थित उनके दोस्त, रिश्तेदारों की पर्सनल जानकारी का भी इस्तेमाल कर सकते थे.

ऐसा माना जाता है कि ग्राहक की परमिशन लेने के बाद ये ऍप्लिकेशन्स ग्राहक का नाम, उम्र, देश, राज्य, एजुकेशन, उसकी लोकेशन, उसका रिलेशनशिप स्टेटस, उसका राजनीतिक झुकाव, उसकी चैट हिस्ट्री, उसकी धार्मिक प्रवृति आदि कई तरह की जानकारियों को एक्सेस कर सकती थी.

फेसबुक पर जब भी आप कोई भी एप्लीकेशन ओपन करते हैं तो वो आपसे पूछती है कि क्या वो आपकी जानकारी एक्सेस कर सकती है, और ग्राहक सब जगह “हाँ” पर क्लिक करता चला जाता है और परमिशन दे देता है.

ऐसा ही आप अपनी मोबाइल फ़ोन में भी देख सकते हैं. एंड्राइड या एप्पल फ़ोन में भी जब आप कोई एप्लीकेशन इनस्टॉल करते हैं तब आपसे एप्लीकेशन आपके कैमरा, गैलरी, कॉन्टेक्ट्स आदि का एक्सेस मांगती है.

हम लोग एक्सेस दे देते हैं और कुछ एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफ़ेस के द्वारा यह ऍप्लिकेशन्स जब चाहे आपकी जानकारी को एक्सेस कर सकती हैं.

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अब सवाल उठता है कि अगर कोई एप्लीकेशन हमारा डेटा एक्सेस कर भी रही है तो उसका उन्हें क्या फायदा हो रहा है?

इस सवाल का जवाब सीधा सा है, डिजिटल मार्केटिंग और advertisement से होने वाली जबरदस्त कमाई. गूगल ने इसकी शुरुआत की और बाद में फेसबुक ने इसका ही अनुसरण किया.

लोग सोचते थे कि गूगल एक सर्च इंजन मात्र है, इससे कमाई कैसे होती होगी. इस वेबसाइट पर तो कोई advertisement भी नहीं चलते, जिस पर क्लिक करने से कोई revenue आता हो!

दरअसल होता यह है कि गूगल आपकी सभी जानकारियों को अपने डेटाबेस में दर्ज करता रहता है. आप जो भी सर्च करते हैं, जो भी की-वर्ड्स इस्तेमाल करते हैं वो सब उनके डेटाबेस में दर्ज होते रहते हैं.

उदाहरण के लिए अगर आप गूगल पर किसी मोबाइल फ़ोन के बारे में सर्च कीजिये. मान लीजिये आपने एप्पल आई-फ़ोन के बारे में सर्च किया तो उसके बाद आप जो भी वेबसाइट्स खोलेंगे उन सभी में आपको मोबाइल फ़ोन्स के ही advertisement दिखेंगे.

आपको मान लीजिये कि मनाली घूमने जाना है, आपने गूगल पर डाला और मान लीजिये मेक माय ट्रिप का कोई लिंक ओपन हुआ, आपने चेक किया और उसके बाद बिना बुकिंग किये आपने वेबसाइट बंद कर दी. अब आप अगर कोई अन्य वेबसाइट ओपन करेंगे तो वहां advertisement में आपको मनाली के ही होटल्स दिखाई देंगे. यह सब कैसे हुआ?

गूगल ने आपकी प्रैफरेंसेज़ और आपके रेस्पॉन्सेस को दर्ज किया, और उन्हें अपने क्लाइंट्स को बेच दिया. यह क्लाइंट्स हैं मोबाइल कंपनी और मेक माय ट्रिप (ऊपर दिए गए उदाहरण के हिसाब से). अब आप कभी भी मोबाइल या मनाली के नाम से सर्च करेंगे तो गूगल आपको कुछ चुनिंदा लिंक्स सबसे ऊपर देगा. क्योंकि गूगल इसी बात के पैसे लेता है, और इसी वजह से गूगल दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल मार्केटिंग कंपनी है.

आपकी प्रैफरेंसेज़ का डेटा बिकाऊ होता है और इसे बेच कर यह कंपनियां अरबों खरबों कमाती हैं. लेकिन इस मामले में हमें शिकायत भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हम “फ्री” में ये सारी ऍप्लिकेशन्स इस्तेमाल भी करते हैं. अब फ्री तो कुछ होता नहीं दुनिया में, कुछ ना कुछ तो चुकाना ही पड़ता है.

अब वापस आते हैं फेसबुक के ओपन ग्राफ प्लेटफार्म पर. ये किसी भी कपंनी को आपके साइकोलॉजिकल डेटा, डेमोग्राफिक देटा और आपकी प्रैफरेंसेज को एक्सेस करने की आजादी देती थी.

2013 में कैंब्रिज के स्कॉलर अलेक्सेंडर कोगन ने एक एप्लीकेशन बनायी जिसका नाम था THIS IS YOUR DIGITAL LIFE. इस एप्लीकेशन के द्वारा उन्होंने लगभग 3 लाख से ज्यादा users का साइकोलॉजिकल प्रोफाइल डेटा इकठ्ठा किया.

यह ऍप्लिकेशन एक तरह की quiz अपने users को प्रस्तुत करती थी. उसमें अनेक तरह के प्रश्न हुआ करते थे, उन प्रश्नो के उत्तरों के पैटर्न को एनालाइज़ कर के users की प्रोफाइलिंग की जाती थी.

साइकोलॉजिकल/ डेमोग्राफिकल प्रोफाइल क्या होती है और इसे कैसे इकठ्ठा किया जाता है?

मै कुछ प्रश्न यहां रख रहा हूँ, उनके उत्तरों के द्वारा मै users की प्रोफाइल्स बना सकता हूँ और एक डेटा सैंपल बनाया जा सकता है

1. क्या आप प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन करते हैं?

2. क्या आप केंद्र सरकार का समर्थन करते हैं?

3. क्या आप नोटबंदी को अच्छा कदम मानते है?

4. क्या आपको लगता है पिछले 4 सालो में देश की अर्थव्यवस्था में अच्छा बदलाव आया है?

5. क्या आपको लगता है पिछले 4 सालो में देश में धार्मिक कट्टरता कम हुई है?

इन सभी प्रश्नो के उत्तर हाँ या ना में ही दिए जा सकते हैं. अगर आप सभी के उत्तर हाँ में देंगे तो आपको सैंपल 1 में रखा जाएगा, अगर सभी के उत्तर ना में होंगे तो सैंपल २. और बाकी के कॉम्बिनेशंस के हिसाब से आपकी प्रोफाइल बनायी जा सकती है और एक व्यापक डेटा सैंपल इकठ्ठा किया जा सकता हैं.

अगर सभी के उत्तर हाँ है, तो इसका मतलब है आप बीजेपी के supporter हैं, और अगर आपके सभी उत्तर ना हैं तो जाहिर है आप बीजेपी और मोदी के विरोधी हैं.

क्या हो कि आपकी प्रोफाइलिंग के हिसाब से ही आपको advertisement दिखे? या उस हिसाब से ही आपकी timeline में खबरे दी जाएँ?

पिछले दिनों ही कुछ लोगों ने शिकायत की थी कि एक दम से ही सरकार के खिलाफ नकारात्मक खबरें धड़ाधड़ आने लगी थी.

आप फेसबुक खोलते थे और बस आपको नकारात्मक खबरें ही दिखती थी. मोदी ने यह नहीं किया, वो नहीं किया, 2019 में यह कर देंगे, वो कर देंगे..

आपकी timeline में जो ग्रुप्स/ पेजेस की पोस्ट्स आती थी वो भी नकारात्मक होती थी, और अधिकतर स्पॉन्सर्ड होती थी… याद आया?

वापस आते हैं THIS IS YOUR DIGITAL LIFE एप्लीकेशन पे, इस एप्लीकेशन के द्वारा लाखो users का पर्सनल डेटा इकठ्ठा किया गया और कोगन ने वो डेटा अपनी क्लाइंट कैंब्रिज एनालिटिका को बेच दिया.

ऐसा माना जाता है कि इस डेटा और अन्य स्त्रोत से इकठ्ठा किये गए करोड़ों लोगों के डेटा का इस्तेमाल कैंब्रिज एनालिटिका ने डोनाल्ड ट्रम्प के इलेक्शन कैंपेन में किया.

साइकोलॉजिकल प्रोफाइल डेटा होने की वजह से कैंब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक को ट्रम्प के समर्थन वाले कंटेंट से भर दिया. करोड़ों रूपए के advertisement और कैंपेन किये गए और ट्रम्प हर जगह छा गए.

और इसका फायदा निश्चित रूप से उन्हें हुआ भी. अंततः वो जीत भी गए. और ऐसा माना जाता है कि रुसी सरकार ने इस कैंपेन में अरबों डॉलर्स खर्च किये. वो अरबों डॉलर्स सोशल मीडिया पर advertisements और कैंपेन चलने के लिए ही दिए गए थे.

पूरे दिन ख़ास तरह के एड्स और पोस्ट्स आपकी timeline पर घूमती रहेंगी तो आप भी उसके बारे में सोचने को मजबूर हो जाएंगे, और हो सकता है आपका पॉइंट ऑफ़ व्यू बदल जाए कुछ समय बाद. और यही इन कंपनियों का ध्येय भी है. कैसे भी करके अपने क्लाइंट्स (राजनीतिक पार्टियां) को जितवाना.

भारत में भी कांग्रेस पर कैंब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लेने का आरोप लगा है, कुछ सबूत भी मिले हैं. ऐसा माना जा रहा है कि पिछले सालों में एक दम से जो नकारात्मकता का माहौल बनाया गया है, वो इसी वजह से बना है.

एक दम से असहिष्णुता ट्रेंड करने लग जाता है, कभी मुस्लिम और दलित पर अत्याचार का हौव्वा खड़ा कर दिया जाता है. सोशल मीडिया पर यही खबरें दिखती हैं। कोई तो कंट्रोल करता होगा ना?

अब इस मुद्दे पर फेसबुक के खिलाफ अमेरिका में कार्यवाही भी चल रही है, पता नहीं इसका क्या निर्णय आएगा, लेकिन एक बात तो तय है कि आपके डेटा का इस्तेमाल किया जा सकता है, और बाकायदा आपके देश की सरकारें भी बदली जा सकती हैं.

अब कभी भी फेसबुक पर लॉगिन करें तो अपनी timeline को जरूर चेक करें, वहां कैसी खबरें आ रही हैं उन पर गौर जरूर करें. यह सब कुछ अपने आप नहीं होता, एक अल्गोरिथम होती है जो ये तय करती है कि आप क्या देखेंगे और क्या नहीं देखेंगे.

और इस अल्गोरिथम का मालिक तो फेसबुक है, लेकिन असली मालिक तो क्लाइंट होता है, जो पैसे देता है… पैसा नहीं तो कमाई कैसे होगी भला!

मार्क ज़ुकरबर्ग से सुनवाई में ये सवाल पूछा भी गया था कि आप अपने बिज़नेस मॉडल में क्या बदलाव करने जा रहे हैं… मार्क के पास जवाब नहीं था… क्योंकि वो भी जानते हैं कि यह सारा खेल ही ग्राहक के डेटा का है…

जिस दिन डेटा और प्रैफरेंसेज बिकना बंद हो जाएंगी… उस दिन शायद सोशल नेटवर्क बंद हो जाए… या फिर इसकी कीमत इतनी हो जाए कि लोग अफोर्ड ना कर पाएं.

अंत में एक सवाल… क्या हो अगर कोई क्लाइंट (पोलिटिकल पार्टी या कोई संस्था) अपने फायदे के लिए कैंब्रिज एनालिटिका जैसी फर्म को अपॉइंट करे और सोशल मीडिया का उपयोग करके अपनी ‘स्लीपर सेल्स‘ के द्वारा दुष्प्रचार का एक ना रुकने वाला अभियान चलाए?

या ऐसा अभियान अभी शायद चल भी रहा होगा? इसका जवाब उदाहरण सहित अगले भाग में…

क्रमश:…

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