यही है असली ट्रांसफॉर्मेशन जिसमें बेकार हो जाते हैं तीन महीने पुराने आंकड़े

मैंने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किये जा रहे ट्रांसफॉर्मेशन वाले लेख में लिखा था कि सरकार ने 9 लाख करोड़ के बैंक एनपीए (ना चुकने वाले ‘खराब’ लोन) में से 4 लाख करोड़ की वसूली कर ली है.

यह समाचार कारपोरेट अफेयर मंत्रालय के सचिव ने 3 अप्रैल को दिया था जिसे सभी समाचारपत्रों ने 4 अप्रैल को छापा था.

यह सारे लोन यूपीए की भ्रष्ट सरकार ने ‘मित्रों’ को दिलवाए थे और इसकी ‘खराब’ हालत को छुपा के रखा था.

इसपर कुछ मित्रो ने लिखा कि रिजर्व बैंक के मुताबिक पिछले चार साल में मात्र 29-हज़ार करोड़ NPA की वसूली हो पाई है.

आखिर रहस्य क्या है और सच क्या है?

पहली बात नोट करने की यह है कि इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार ने कॉरपोरेट अफेयर मंत्रालय के सचिव से संपर्क ही नहीं किया.

जबकि पत्रकारिता का यह दायित्व है कि अगर वह सरकार की किसी खबर का खंडन करते हैं तो उनका पक्ष जरूर लेना चाहिए था.

जब उस पत्रकार ने आरबीआई के हवाले से खबर दी तो वह वहां तक सही थी कि वे आंकड़े पिछले वर्ष तक के थे.

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लेकिन इस वर्ष के पहले 3 महीनों में आखिर ऐसा क्या हो गया कि NPA के लगभग चार लाख करोड़ रुपए बैंकों के पास वापस आ गए?

इसका उत्तर यह है कि खराब लोन की वसूली के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2016 में संसद से एक कानून पास करवाया था.

इसके तहत बैंक किसी भी लोन न चुकता करने वाली कंपनी के विरूद्ध कोर्ट में कार्रवाई शुरू कर सकता है जिसे विशेष अदालत को 18 महीने के भीतर निपटाना होगा.

यदि आवश्यक हुआ तो कंपनी को liquidate या नीलाम कर दिया जायेगा और भागते भूत की लंगोटी की तरह जो भी मिल सकेगा, वसूल लिया जायेगा.

इस कानून के बाद 12 कंपनियां जिन्होंने लोन नहीं चुकाया था उनके खिलाफ कार्यवाही इस वर्ष मार्च में पूरी हो गई. इन 12 कंपनियों से कुल तीन लाख दस हज़ार करोड़ रुपए इस वर्ष के पहले 3 महीनों में वसूल कर लिए गए.

यह मेरा अनुमान है – मैं दोहरा रहा हूं कि अनुमान है – कि बाकी के 90 हज़ार करोड रुपए अन्य कंपनियों ने डर के मारे जमा कर दिया होंगे.

इस प्रक्रिया के पहले दौर में 40 उधारकर्ता के मामलों का निर्णय इस वर्ष हो जाएगा.

यही असली ट्रांसफॉर्मेशन (समग्र परिवर्तन) है, जिसमें 3 महीने पुराने आंकड़े बेकार हो जाते हैं.

हैं ना यह अविश्वसनीय…!

प्रधानमंत्री मोदी ने लंदन में ठीक ही कहा था कि “दुर्भाग्‍य ये है कि आलोचना करने के लिए बहुत रिसर्च करना पड़ता है. बहुत मेहनत करनी पड़ती है. उसकी बारीकी में जाना पड़ता है, तथ्य और आंकड़े इकट्ठे करने पड़ते हैं. हिस्‍ट्री पूरी निकालनी पड़ती है. अब आज ऐसी आपाधापी का समय है कि किसी के पास इतना टाइम ही नहीं है. बहुत कम लोग हैं जो अब ये काम कर पाते हैं. अच्‍छा, हरेक को इतनी तेजी है कि भई 24X7… मैं आगे निकलूं, ब्रेकिंग न्‍यूज मैं दूं, या वो दें, आपाधापी का युग है और इसलिए आलोचना ने दुर्भाग्‍य से उस मर्यादाओं को तोड़ करके आरोपों का रूप ले लिया है.

कंपनियों के नाम इस समाचार लिंक में है – https://www.bloomberg.com/news/articles/2018-02-07/how-india-s-bankruptcy-law-redo-may-spur-m-a-heyday-quicktake

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