ज़ुकरबर्ग के आश्वासन के बाद भी फेसबुक के निशाने पर राष्ट्रवादी

बीती रात जीवन में एक नये तरह का अनुभव हुआ. इस अनुभव का पूरा श्रेय मार्क जुकरबर्ग और उसकी फेसबुक को जाता है.

यहां फेसबुक पर पिछले 5 वर्षों की लेखन की यात्रा में पहली बार फेसबुक की सेंसरशिप का अनुभव हुआ है.

वैसे तो मेरे कई मित्र इस का शिकार हो चुके हैं लेकिन यह मेरा पहला अनुभव है, जहां मैं पूरे 3 दिन के लिये किसी भी लेखन व टिप्पणी करने से प्रतिबंधित कर दिया गया हूँ.

फेसबुक द्वारा मैं प्रतिबंधित श्रेणी में रखा गया हूँ इसकी सूचना मुझे तब प्राप्त हुई जब मैं किसी की पोस्ट पर कोई टिप्पणी कर रहा था.

मुझे फेसबुक के कर्ताओं ने यहां बिना किसी पूर्व चेतावनी के प्रतिबंधित किया है और हेट स्पीच व असामाजिक वीडियो अपलोड करने का दोषी बताया है.

मैंने जब सुबह इस पर विचार किया तो पाया कि हालांकि मैं कभी भी अपने लेखों की भाषा को अमर्यादित व अभद्र नही होने देता हूँ लेकिन मेरे पिछले दिनों लिखे लेखों की शेयरिंग बहुत ज्यादा थी और सब लेख कांगी-वामी गिरोह व मीडिया में घुसे उनके गुर्गों के झूठे नरेटिव के विरुद्ध थे.

यहां फेसबुक पर ज्यादातर लोग की इसी बात की शिकायत रहती है कि मुसलमानों व इस्लाम की आलोचना करने वालो के प्रति फेसबुक बड़ी असहिष्णुता दिखाता है और उनके लेखों को हटाने से लेकर, लेखकों को भी प्रतिबंधित करता रहता है.

वहीं हिंदुत्व व राष्ट्रवादी विचारधारा के विरुद्ध फैलाये जा रहे झूठे कथानक व विषवमन पर बड़ी सहिष्णु रहता है.

मेरे लिये यह फेसबुक का विचित्र विरोधाभास था, कि जब मेरा कोई भी लेख मुसलमान या इस्लाम को केन्द्र में रख कर नही लिखा गया था तब भी मुझे फेसबुक की असहिष्णुता का शिकार होना पड़ा है.

इन लेखों के अलावा, मैंने उपदेश राणा का मंदिर वाला वीडियो भी एक मित्र की पोस्ट पर कमेंट बॉक्स में डाला था, जिसको फेसबुक ने कई लोगों की टाइमलाइन से हटा दिया गया था.

अब इस पूरे मामले को गम्भीरता से विचारता हूँ तो यह समझ में आता है कि इस वक्त फेसबुक के भारतीय ऑफिस में जो लोग सिक्योरिटी व कंटेंट की समीक्षा करने के लिये बैठे है उनकी प्राथमिकता इस्लाम विरोधी लेखों से हट कर कांगी-वामी गिरोह के नैरेटिव के झूठ पर आक्रमण करने वाले लोग हो गये हैं.

उन्होंने अब वामपंथियों के मीडिया कुचक्र का विरोध करने वालों को निशाने पर ले लिया है. आप ने यह महसूस किया होगा कि कुछ महीनों से तथाकथित राष्ट्रवादियों के लेखों की पहुंच कम हो रही है. जिन्होंने ‘सी-फर्स्ट’ पर अपने लेखकों को लगा रखा है उन्हें भी न उनका नोटिफिकेशन मिलता है और न उनके लिखे लेख सामने आते हैं.

मेरा मानना है कि यह सब जो हो रहा है यह पूरी तरह से फेसबुक के भारतीय ऑफिस में बैठे लोगों द्वारा ही किया जा रहा है. ये लोग किसी कैंब्रिज एनालिटिका के लिये या फेसबुक के लिये काम नहीं कर रहे हैं…

बल्कि यह लोग अपनी लिबरल (प्रगतिशील) विचारधारा के लिये काम कर रहे हैं, जो दरअसल में छद्म रूप से वामपंथ ही है और यह अंतर्राष्ट्रीय लिबरल्स के समूह का ही चेहरा है जो कई दशकों से मीडिया और अब अमेरिका की सिलिकॉन वैली की tech कम्पनियों में घुस गया है.

आपको याद होगा जब पिछले दिनों यह खबर आई थी कि फेसबुक ने कैंब्रिज एनालिटिका को अपने यूज़र्स के डेटा और गुप्त सूचनाएं बेची थीं तब योरप और अमेरिका में बड़ा बवाल हुआ था और फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग पर ‘राइट टू प्राइवेसी’ (निजता के अधिकार) का उल्लंघन करने का आरोप लगा था.

इस मामले में अमेरिका के सीनेट की जुडिशरी और कॉमर्स कमेटी की संयुक्त सुनवाई हुई थी और उसमें ज़ुकरबर्ग को अपने ऊपर लगे आरोपों पर जवाब देने के लिये बुलाया गया था.

इस सुनवाई के दौरान टेक्सास के सेनेटर ट्रेड क्रूज़ ने ज़ुकरबर्ग से सेंसरशिप को लेकर कड़े प्रश्न किये थे और उनसे फेसबुक पर एक तरह के लोगों, जिसमे ज्यादातर दक्षिणपंथी विचारधारा के है, उनकी सेंसर द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करने का भी आरोप लगा कर सवाल पूछे थे.

इन प्रश्नों पर मार्क ज़ुकरबर्ग बहुत असहज हो गये और अपनी सफाई में फिर जो उन्होंने कहा वह बहुत महत्वपूर्ण है.

जहां, ज़ुकेरबर्ग ने अपने को पूरा तटस्थ बताया, वहीं पर यह स्वीकार किया कि सिक्योरिटी और कंटेंट (जो फेसबुक का प्रयोग करने वाले लिखते है या सामग्री डालते है) की समीक्षा करने के लिये फेसबुक ने लगभग 20 हज़ार कर्मचारियों को रखा है, जो यह तय करते हैं कि कौन सी चीज फेसबुक पर रहनी है और कौन सी हटनी है.

यह लोग कैलिफोर्निया के सिलिकॉन वैली में, फेसबुक के हैडक्वार्टर में स्थित है, जहां काम करने वाले लोगों का ज्यादातर झुकाव लिबरल वामपंथी विचारधारा की तरफ है.

फेसबुक के यही 20 हज़ार लोग हैं जो पूरे विश्व में फैले फेसबुक के ऑफिसों में बैठे ‘सिक्योरिटी व कंटेंट’ की समीक्षा करने वाली टीम को देखते है और उनके लिये अघोषित एजेंडा सेट करते है.

आज फेसबुक पर इसी लिबरल वामपंथियों का जमावड़ा है जिसने यह तय किया है कि राष्ट्रवादियों की आवाज़ को रोक कर, अपने वैचारिक भारतीय भाई बंधुओं की सहायता करेंगे.

यह वर्ग, फेसबुक पर नित्य कांगी-वामी गिरोह द्वारा प्रचारित झूठ के पकड़े जाने व उनके षडयंत्रों का भंडाफोड़ होने से आहत है. यहां पर राष्ट्रवादियों की लेखनी ने इस गिरोह द्वारा पोषित मीडिया में बैठे दलालों की पत्रकारिता को ही ध्वस्त कर दिया है.

इसी सबको जनमानस की याददाश्त से मिटाने के लिये व राष्ट्रवादी विचारधारा की पहुंच को संकीर्ण करने के लिये, हैदराबाद में बैठे सिक्युरिटी व कंटेंट समीक्षकों ने यह सब किया है.

लोगों से मेरा एक बार फिर निवेदन है कि हमें इससे डरना नहीं है और न ही फेसबुक का प्लेटफॉर्म छोड़ना है क्योंकि हमारे पास वक्त नहीं है, 2019 का कुरुक्षेत्र सामने है.

हम लोगों को पिछले 4 वर्षों में अपने नेतृत्व से जो भी शिकवा शिकायत रहीं हो लेकिन आज का वक्त उसकी आलोचना व समीक्षा करने का नहीं है.

हमें एकजुट होकर, नेतृत्व के पीछे खड़ा रहना है और 2019 के कुरुक्षेत्र तक मर्यादा, सिद्धान्त, नीति, शुचिता और आदर्शो को ढील देते हुये, सिर्फ जीत के लिये लड़ने के लिये तैयार हो जाना है.

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