जस्टिस लोया केस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला : ये है भारत और उसके हिन्दू के जीवन और मृत्यु का काल

आज सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस लोया की मौत पर कोर्ट की निगरानी में एसआईटी बनवाये जाने की याचिका को ख़ारिज कर दिया है.

इसी के साथ पिछले 3 वर्षो से एक जज की मौत को हत्या बना कर उसका राजनीतिकरण करने व उसके भरोसे, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह को जस्टिस लोया की मौत का जिम्मेदार बनाने के, कांग्रसी वामी गिरोह के षडयंत्रकारी प्रयास को क़ानूनी झटका लगा है.

आज अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की पीठ ने कहा है कि यह याचिका जनहित याचिकाओं का गलत इस्तेमाल हो रहा है. ये याचिकाएं राजनीतिक हित साधने और चर्चा बटोरने के लिए जारी की गई लगती हैं, लेकिन इनका कोई ठोस आधार नहीं है और ये याचिकाएं न्यायपालिका की छवि धूमिल करने की नीयत से दायर की गई थीं.

इस याचिका को कांग्रेस वामी गिरोह की तरफ से वकील प्रशांत भूषण द्वारा डाला गया था और आज के फैसले से कम से कम न्यायालय को अपने षडयंत्रो का भागीदार बने रहने के प्रयास पर एक विराम लग गया है.

लेकिन क्या आपको लगता है कि यह पूर्ण विराम है?

मुझे नहीं लगता कि यह कोई पूर्ण विराम है क्यूंकि अब यह गालियों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर व्यक्तिगत आक्षेपों की नई बारिश की शुरुआत करेगा.

आज यह राष्ट्रद्रोही गिरोह अपने अस्तित्व के आखिरी वर्षो की लड़ाई लड़ रहा है जिसमें न कोई तर्क होगा और न ही कोई सत्य होगा. इसमें सिर्फ अनीति होगी, अनादर होगा, अमर्यादा होगी, विष होगा और घृणा होगी. यहां न्याय और संविधान, दोनों ही अब कोई मूल्य नहीं रखते हैं.

आज का दिन सुप्रीम कोर्ट के उन 4 जजों के लिए भारी है क्यूंकि जस्टिस लोया का ही वह केस था जिसके कारण, न्यायपालिका व संवैधानिक व्यवस्था की अस्मिता को तार तार करके, इन चारों ने अपने मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध प्रेस कांफ्रेंस की थी.

ये वो 4 जज थे जो सुप्रीम कोर्ट में केस आने से पहले यह तय कर चुके थे कि इसका फैसला क्या आना चाहिए था.

भारत की न्यायपालिका जिस संकट से गुज़र रही है, उस पर अभी और वार होंगे. अब कांग्रेस वामी गिरोह का पूरा प्रयास होगा कि फ़र्ज़ी फोटोशॉप्स, लांछनो और खबरों के माध्यम से भारत के जनमानस में सुप्रीम कोर्ट के प्रति संदेह के बीज रोपित करने में सफलता मिल जाए.

इन सब मामलों में सरकार के ही सचेत रहने की आशा मत रखिये क्यूंकि लोकतंत्र की अपनी एक कमज़ोरी यह होती है कि वह एक सीमा में बंधी होती है और मर्यादाविहीन विरोधी शक्तियों पर मर्यादा से बाहर जाकर आक्रमण नहीं कर पाती है.

यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि इन पिछले 4 के कटु अनुभवों से सीख कर, अपनी सरकार से मर्यादा-अमर्यादा, सफलता-असफलता, सार्थक आलोचना-समालोचना और शुचिता अशुचिता का खेल न खेलें बल्कि अमर्यादित शक्तियों का पूरी अमर्यादा और अशुचिता से सामना करें और उनका मर्दन करें.

यहां यह याद रखिये… यह आगामी एक वर्ष जहाँ इन राष्टद्रोहियों के अस्तित्व के लिए भारी है वही आपकी अगली पीढ़ी के संरक्षण के लिए भी यह वर्ष भारी है.

2019 के बाद या तो यह कांग्रेसी वामी गिरोह रहेगा और भारत और उसका सनातन अँधेरे युग में प्रवेश कर जाएगा या फिर हम और हमारी अगली पीढ़ी सनातनी परम्पराओं को निर्वाह करने के लिए रहेगी.

यह भारत और उसके हिन्दू के जीवन और मृत्यु का काल है.

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