वशिष्ठ गुरुजी : अब ऐसे शिक्षक की कल्पना भी नहीं की जा सकती

“गुरुजी नमssssस्ते… हम आपको %#$@ समझते!!”

संतोषी माता मंदिर के बांधकाम हेतु आई रेत पर मस्ती करते बच्चों में से किसी ने नारा लगा दिया.

मैंने पलट कर देखा तब तक तो सारे बाल-गोपाल भग भी लिए थे.

मैं भौंचक्का सा कुछ समझ पाता इससे पहले ही किसी भारी भरकम हाथ ने पीछे से कॉलर पकड़ लिया मेरा…

“क्यों बे… गाली देता है?”

कहते हुए उन्होंने पहले तो जोरदार दो लप्पड़ रसीद कर दिए. इस पर भी संतुष्टि न मिली तो गाल पकड़ कर खींचने लगे…

हर वर्ष परीक्षा के बाद की छुट्टियां, अकोला अपने माता-पिता के साथ बीततीं मेरी. इस वर्ष चौथी कक्षा की छुट्टियों में आया हुआ था मैं.

मुहल्ले के संगी-साथियों के साथ रेत पर मस्ती का आनंद उठा रहे थे हम सब, कि यह दुर्घटना घटित हो गई. पांचवी से अकोला में ही पढ़ना था आगे मुझे….

“मैंने क्या किया?”

मैं रोने लगा था. मेरे प्रश्न पूछते ही एक और धर दी उन्होंने और कहने लगे –

“अपने बाप से कहना, वशिष्ठ गुरुजी ने मारा है!”

फिर वह अपनी साइकिल उठाकर चल दिए….

ठाकुर वशिष्ठ नारायण सिंह, अर्थात वशिष्ठ गुरुजी से, यह मेरा पहला परिचय था.

बाद में साथियों से पता चला कि ये कमेटी (नगरपालिका) की प्राइमरी स्कूल के शिक्षक थे उनके! और यह भी कि ‘यक्कू क्रूर सिंह’ थे वे. बडे जालिम व निर्दयी!

रामू काका तिवारी के बेटों, श्रीधर-महावीर को पढ़ाने रोज आते थे वह हमारे मुहल्ले में. मुझे शिकायत यह थी कि निर्दोष पीट दिया था उन्होंने मुझे. फिर एक दिन उन्हें श्रीधर भैया की सुताई करते हुए देखा तो प्राण सूख गए मेरे…

“सत्रह सते?”, दे दन्न…

“कल बीस तक पहाड़े रटने को कहा था मैंने…..”, दे सन्न….

“कहा था कि नहीं कहा था?”, चटाक….

“बोल, सत्रह सते….”, दन्न… सन्न… चटाक!!!

दांत पीसते, सुताई करते जा रहे थे और पूछते भी जा रहे थे;

“दिन भर खेलने को होना… क्यों? पहाड़े कौन, तेरा बाप याद करेगा क्या?”, फिर से चटाक……

“माफ कर दो गुरुजी… कल बिलकुल याद करके बताता हूँ आपको. माँ की सोगन खाता हूँ!!”

श्रीधर भी अपनी दहाड़ भरी रुलाई रोता हुआ कसमें खा रहा था. सारे मुहल्ले में उसका रुदन सुना जा सकता था…

यह धुलाई खत्म होने तक श्रीधर भैया, अपनी माँ की सौगंध खाने की जगह, वशिष्ठ गुरुजी को उनकी माता की सौगंध देने लगे;

“आपको, अपनी माँ की सोगन है गुरुजी… अब मारा तो!”

मैं देख न सका तो भग लिया घर को… ‘मास्टर है कि कसाई?’, यही सोच रहा था सारे रस्ते!

पिता के काम से लौटने तक सोने का समय हो जाया करता था हम भाई-बहनों का. आज नींद नहीं आ रही थी मुझे. माँ, पिताजी को खाना परोस रहीं थीं. पिताजी कह रहे थे;

“अब एक महीना रह गया है स्कूल शुरू होने में. ‘विद्या मंदिर’ (मेरी माध्यमिक शाला) में एडमिशन हो जाएगा, बात कर ली है. अच्छा, भूलने से पहले बता दूँ, कल से एक मास्टर आएगा इन दोनों को पढ़ाने…”

फिर नींद आ गई मुझे. दूसरे दिन सुबह ही बता दिया गया कि शाम को पांच से छह तक हमें ट्यूशन पढ़ाने कोई आएंगे. पिता भी नहीं जानते थे कि कौन है वह मास्टर! उनके किसी मित्र ने अरेंज किया था यह सब…

हम शाम साढ़े चार से ही प्रतीक्षा कर रहे थे. जैसे ही वशिष्ठ गुरुजी की साइकिल घर के सामने रुकी, आतंक छा गया!

“कौन सी कक्षा में है रे तू?”

उनके प्रश्न करते ही मैंने अपनी छोटी उंगली उठाकर पूछ लिया;

“गुरुजी, सू करके आऊँ? जमके लगी है…”

“अब तक सोया था क्या?… भग!!”

मैं बगटूट भग लिया. नाली पर मूत्र-विसर्जन करते हुए निरंतर सोच रहा था मैं…

“एक तो निर्दोष मारा था उस दिन, तो गुस्सा करने का हक तो मेरा था. मैं क्यों डरूँ इनसे? मैं मार भी नहीं खाने वाला अब… चाहे जो हो जाए!”

इस तरह साहस एकत्र कर पहुँच गया गुरुजी के सम्मुख. वे बडे ध्यान से देख रहे थे मेरे चेहरे को!

“चौथी तक कौन सी स्कूल में पढ़े हो? मैंने कमेटी की स्कूल में तो कभी देखा नहीं तुम्हें… और एक मिनट, उस दिन तुम ही थे न गाली देने वाले?”

मुझमें तो तानाजी संचार कर गए थे. छाती और मुंह फुलाकर बोला –

“चौथी तक गांव में पढ़ा मैं… और मुझे गाली नहीं आती! उस दिन तुमने जबर्दस्ती…..”

“तुम नहीं कहते बेटा… अपने से बड़ों को आप कहकर बुलाते हैं. तुम्हारे उच्चारणों से लगता है, हिंदी नहीं आती तुम्हें!”

सचमुच, चौथी तक मराठी माध्यम से ही शिक्षा पाई थी मैंने. मुझे सचमुच नहीं पता था कि अपने से बड़ों को ‘आप’ कहकर संबोधित करना होता है…

“तभी मैं कहूँ… पहले कभी देखा नहीं तुम्हें. माफ करना, फालतू पिटे उस दिन तुम!”, उनकी आंखों में पश्चाताप देख मैं सिरजोर हो गया…

“अब नहीं पिटूँगा मैं! कभी भी….”

“ऐसा? और जो पढ़ने में ढीलढाल हुई… तब भी?”

मेरी मुंहज़ोरी को कौतुक से सह लिया उन्होंने…

“वह सूरत कभी नहीं होगी गुरुजी…”

“देखूँ, क्या आता है तुझे? बता, उन्नीस अठे?”

“एक सौ बावन…”

“सत्रह सवाए?”

“सवा इक्कीस…”

वे प्रभावित हुए लग रहे थे. फिर उन्होंने एक आठ अंक वाली संख्या को चार अंकों वाली संख्या से भाग देने को दिया और सही उत्तर आने पर शाबाशी भी!

करीब महीना भर बाद एक दिन वे पिताजी से कहने लगे –

“भंडारी जी, आपका बेटा तैयार है. एक प्राथमिक शिक्षक जो पढ़ा सकता है, वह सब आता है उसे. मुझे नहीं लगता, मुझसे कुछ सीख सकेगा वह. आप इसके आठवीं पास होने के बाद मुझे बताईएगा, मैं योग्य व्यक्ति को कह दूँगा ट्यूशन के लिए!”

उन्होंने ना तो महीने भर की फीस ली, न फिर कभी मुझे पढ़ाया ही! मैं कदाचित उनका इकलौता छात्र था जिसे वे अपनी ‘राजा’ पेन दे दिया करते लिखने के लिए. मेरी सुंदर हैंड-राईटिंग पर फिदा थे वे…

अब तो वृद्ध हो गए ‘वशिष्ठ गुरुजी’ पर आज भी, जब कभी मिलते हैं कहीं, तो मेरा परिचय, ‘मेरा एक योग्य शिष्य’ कहकर ही देते हैं किसी तीसरे को…

ऐसे, उच्च आदर्शों पर चलने वाले लोग हुआ करते थे कभी…

आज के इस दौर में ऐसे किसी शिक्षक की कल्पना भी नहीं की जा सकती! क्यों?

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