मुज़फ्फ़रपुर डायरी : पहला पन्ना

11 अगस्त, 1908 को मुजफ्फरपुर, बिहार के केन्द्रीय कारागृह में 19 साल के एक युवक को भगवान आदित्य के उठने से पहले ही फांसी दे दी गई.

उनके बलिदान दिवस का स्मरण आज भी मुज़फ्फ़रपुर शहर हर साल अगस्त महीने की 11 तारीख को करता है.

2006 में मुझे भी उस ‘पुण्य-स्थल’ के दर्शन का सौभाग्य मिला था जो मुज़फ्फ़रपुर के केन्द्रीय कारागृह के अंदर है, जहाँ भारत के एक सपूत को फाँसी से पूर्व रखा गया था.

रात के दस बजे से ही प्रशासन के तमाम आला-अधिकारियों के साथ-साथ उन सब लोगों का हुज़ूम वहां जुटने लगता है जिनको आज भी उस बलिदानी वीर की याद है.

मैं जब पहुँचा तो हाथ पर जेल की एक मुहर लगाने के बाद कारागृह के अंदर प्रवेश की अनुमति दी गई और सीधा हमें उस काल-कोठरी तक ले जाया गया जहाँ निर्दयी गोरे-अंग्रेजों ने उस युवक को रखा था.

किसी तंग से बाथरूम के आकार की उस कोठरी के ही एक कोने में शौचालय बना हुआ था. उस तंग कालकोठरी में जहाँ कोई बमुश्किल दस मिनट रह पाये वहां पर उस बलिदानी वीर को करीब साढ़े तीन महीने बिताने पड़े थे और उसके बाद उसे फांसी दे दी गई थी.

‘मुज़फ्फ़रपुर’ के उस जेल में वो स्टैंड और फाँसी का फंदा भी सुरक्षित है जो उस वीर के गले की शोभा बनी थी.

पश्चिम बंगाल के ‘मिदनापुर’ में जन्मा वो युवक बचपन से ही क्रांतिकारी था और गीता का नियमित अभ्यासक भी.

उन दिनों कलकत्ता में किंग्सफोर्ड चीफ प्रेंसीडेसी मजिस्ट्रेट हुआ करता था और अपनी क्रूरता के लिये मशहूर था. बंगाल के जिन लोगों पर भी उसे संदेह होता कि इसकी गतिविधियाँ ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध है तो वो उनका सख्ती से दमन करता था.

जिस कारण ‘युगांतर क्रांतिकारी दल’ के नेताओं ने तय कर लिया कि इसको मरना ही होगा. इसी बीच उस मजिस्ट्रेट को पदोन्नति देकर मुज़फ्फ़रपुर भेज दिया गया पर क्रांतिकारियों के इरादे नहीं बदले.

उसे सबक सिखाने के लिये ‘युगांतर क्रांतिकारी दल’ के नेताओं ने दो नवयुवकों का चयन किया और उन्हें बिहार भेजा.

दोनों आठ दिनों तक उस जज के बंगले और कार्यालय की रेकी करते रहे और एक दिन रात को साढ़े आठ बजे जैसे ही उस जज की बग्घी बाहर निकली दोनों ने उस पर बम फेंक दिया.

दुर्भाग्य से उस बग्घी में वो जज नहीं था और धोखे में किसी दूसरे अंग्रेज की पत्नी और बेटी की मृत्यु हो गई. बम फेंकते ही दोनों भाग खड़े हुये और पुलिस उनके पीछे लग गई.

वो दोनों कई किलोमीटर तक पैदल भागते रहे पर चंद नमकहराम भारतीयों की गद्दारी के चलते मुज़फ्फ़रपुर से चौबीस मील दूर ‘वैनी’ नाम के स्टेशन पर पुलिस उनके पास पहुँच गई.

एक युवक ने ‘चंद्रशेखर आज़ाद’ की तरह खुद को गोली मार ली और दूसरा पकड़ा गया जिसे बाद में ‘मुज़फ्फ़रपुर के केन्द्रीय कारागृह’ में फांसी दे दी गई.

कहने वाले कह सकतें हैं कि जज नहीं मरा और दोनों पकड़े भी गये तो मिला क्या… पर देश को उन दो बलिदानों से जो मिला उसकी परिणति अंततः आज़ादी प्राप्ति के रूप में हुई.

उस बम धमाके की गूँज केवल मुज़फ्फ़रपुर शहर तक सीमित नहीं रही बल्कि वो ब्रिटिश हुकूमत के तख़्त तक भी पहुँची. घटना के बाद खौफज़दा ‘जल्लाद’ जज किंग्स्फोर्ड ने जान के डर से नौकरी ही छोड़ दी… और तो और, अंग्रेज अधिकारी मुज़फ्फ़रपुर में पोस्टिंग मिलने के नाम से ही कांपने लगे.

उधर बिहार और बंगाल के युवकों ने जब अपने उस वीर के कार्य के बारे में सुना तो वो अपनी धोती पर उसका नाम लिखवाकर पहनने लगे यानि अब हरेक खुद को उसका प्रतिरूप दिखा रहा था. शोक में बंगाल के स्कूल और कॉलेज महीनों तक बंद रहे.

खुद को गोली मारकर मृत्य का आलिंगन करने वाले युवक का नाम था ‘प्रफुल्ल चाकी’ और जो गीता के अमर श्लोकों का स्मरण करते और मातृभूमि की आराधना का गीत गाते फांसी के फंदे पर झूल गया उसका नाम था ‘खुदीराम बोस’.

‘खुदीराम बोस’ की 18वीं पुण्यतिथि पर उनके सम्मान में बांग्ला लेखक ‘पीताम्बर दास’ ने बांग्ला भाषा में “एक बार विदाई दे माँ….” लिखा था जो केवल गीत नहीं है बल्कि एक मन्त्र बन चुका है जिसे आप मेरे मुज़फ्फरपुर की हवाओं में और वहां से प्रवाहित होती गण्डक नदी की लहरों में सुन सकते हैं.

वही गंडक नदी जिसके तट पर उस वीर का अग्नि-संस्कार किया गया था. मुज़फ्फ़रपुर में आज तक खुदीराम के बलिदान की खुशबू मौजूद है.

कभी मुज़फ्फ़रपुर जाना हुआ तो इन दोनों हुतात्माओं से जुड़े पावन-स्थलों और चिह्नों का दर्शन जरूर कीजिये. जो दिव्य और अलौकिक एहसास मुझे उस रात्रि ‘कारागृह’ के पुण्य-कोठरी में हुआ था वही एहसास आपको मुज़फ्फरपुर शहर के हरेक कोने में होगा.

‘मुज़फ्फरपुर डायरी’ से कुछ और आगे भी जारी रहेगा…

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