रक्त की खुशबू और धूप की गंध, जिसे दोनों प्रिय नहीं, वो कुछ न समझा

जब कुछ समझ न आये तो आंख बन्द करके शांत मन को पूछना चाहिए. आखिर उसी सर्वशक्तिमान के अंश रूप में तो सब हैं.

सूचनाओं के युग में सूचना से प्रभावित होने की बात तब नहीं रह जाती है जब सूचनाओं में ही मलिनता का आभास होने लगता है.

पहले क्षण में संवेदना का जागरण होता है. सूचना उसे त्वरित प्रभाव से निर्णय कर लेने की बात कहती है.

जाग्रत मन उसे उसी प्रकार से लेता है. अच्छी बात है. प्रश्न है, सूचना गलत हुई तो संवेदना का क्या?

प्रश्न को आगे ले जाना चाहिए कि संवेदना क्या इतनी अकेली है कि सूचना के ऊपर ही निर्भर है??

आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मैनिपुलेशन कितने स्तर तक अपना काम करता है. मैनिपुलेशन गलत या सही नहीं होता, वो लक्ष्य को हासिल करने को होता है. दिशा उसकी लक्ष्य हासिल करने की होती है.

सूचनाओं का सागर है, यही वास्तविकता है, बाकी उस सूचनाओं के सागर में आपकी अपनी संवेदना को कभी इधर खींचते हैं कभी उधर.

आपका अपना परिवेश है संवेदना के अतिरिक्त. संवेदना का आधार वही परिवेश है. उससे अलग आप जा नहीं सकते. स्वतंत्र कोई नहीं है. हो ही नहीं सकता! पर आंख बंद करके अपने मन से पूछ सकते हैं.

मन से पूछना सरल नहीं है. ये न समझ बैठें कि बड़ा सरल है. मन सूचनाओं के संग्रह का हार्ड डिस्क है. ऑलरेडी फुल करके. उसको पहले निपटा कर, तब जाकर कहीं, किसी निर्णय पर पहुँचना होता है. आपकी लड़ाई अपनी है इस सूचना तंत्र में.

मज़े की बात तो ये है निर्णय पर पहुँचने के बाद भी, निर्णय को एक्सीक्यूट करने में, मतलब व्यवहारिक संसार में उसको कहने से ज़बान काँपेगी पक्का. इतना सरल नहीं होता. ये प्रारम्भिक अवस्था है. जो यहां तक भी नहीं है वो किसी काम के भी नहीं हैं.

उसके बाद आते हैं वो जो निर्णय कर चुके हैं कि किस साइड में रहना है. ये भी दुरूह कर्म है. निश्चित तो कर चुके हैं पर आगे विपरीत सूचना आ गयी तो क्या होता है?

सूचना की छानबीन. और क्या होगा? निर्णय से कोई किस तरफ है, वो उसी प्रकार से उस सूचना की छानबीन करेगा. ये मैं खास रूप से नहीं कह रहा, ऐसा ही होता है.

ऊपरवाला इतना पागल नहीं था जितना कोई सोचता है, वो मामले फिट करके ही संसार चला रहा है. उसको पता है कि गणितीय रूप से कौन क्या करने वाला है.

सौभाग्य से साइकोलोजी नामक अस्त्र का भी योगदान खटपट ऊपरवाला कर दिया है. कहे, कि बेटा/बेटी, अपने एक्सट्रीम्स का पता खुद लगाओ, काहे कि काम तो तुमको करना है, सोचना भी तुमको है, निकलना भी तुमको है, सुखी होना है या दुखी होना है, वो एनर्जी का उपभोग भी तुम्हे ही करना है.

जो सेट माइंड है, उसका लाइफ का उद्देश्य बन चुका है. वो अलग कुछ करेगा ही नहीं. वही उसकी सिद्धि का मार्ग है. बाकी बेरोज़गार टाइप हैं, जो स्थिर नहीं हैं, स्टेबल जॉब हो सकता है, पर वो मायने नहीं रखता. वैचारिक मामला है.

वैचारिक मामले में बेरोज़गार लोग खतरनाक टाइप के होते हैं. उनका पता नहीं चलता. ये कभी भी, किधर भी, लुढ़क सकते हैं. या कोई भी, इनको कहीं भी लुढ़का सकता है.

यही लेख का आरम्भ था. असल में कहना तो ये था कि अध्यात्म की कीमत इस समय कितनी हो जाती है, वो बात है. वही स्वतंत्र माना जा सकता है. पर, खुद का हो. दूसरे पर विश्वास होना मुश्किल होता है.

ये देखा जा सकता है कि सामान्य मनुष्य आध्यात्मिक विभूति का प्रयोग तो करेगा, खुद उसी आधार पर खड़ा हो अपनी श्रेष्ठता का बयान करेगा, वहीं कर्मक्षेत्र में अध्यात्म को कमजोर साबित कर, उससे भागने की कोशिश करेगा.

रक्त की खुशबू और धूप की गंध
दोनों प्रिय एकसाथ जिसे नहीं
वो न खुद को समझा
न संसार को समझ पाया है.

जय शिवशक्ति

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY