सोशल मीडिया, स्लीपर सेल्स, कैंब्रिज एनालिटिका, दुष्प्रचार और भारत-1

पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ कि सोशल मीडिया/ मेनस्ट्रीम मीडिया में एक दम से ज़बरदस्त हरकत हुई है. अमूमन ऐसा पिछले 6-7 साल से देखा जा रहा है, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग लग रहा है.

जितना मुझे याद है सोशल मीडिया पर मास मोबिलाइज़ेशन शुरू हुआ था 2011 के अन्ना हजारे के एंटी-करप्शन मूवमेंट के दौरान.

एकाएक ही सोशल मीडिया का स्वरुप बदल गया था, जिन ऍप्लिकेशन्स और websites का उपयोग गुड मॉर्निंग, गुड नाईट बोलने, या किसी को जन्मदिन की बधाई देने या फिर अपनी तसवीरें लगाने और उनपर लाइक्स एवं कमेंट पाने भर के लिए किया जाता था, वो बदलने लगा था.

एकदम से ही फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्विटर का उपयोग लोगों को किसी मुद्दे के प्रति जागरूक करने के लिए होने लगा.

अन्ना हजारे के एंटी करप्शन मूवमेंट के दौरान उनके विचार एवं संदेशों को सोशल मीडिया की वजह से ही घर घर पहुंचाया जा सका.

सरकार की चलती तो कभी भी उनके मूवमेंट को इतनी माइलेज नहीं मिलती, ये सोशल मीडिया ही था जिसकी वजह से अन्ना हजारे पूरे भारत के हीरो बन गए.

अरविन्द केजरीवाल जैसे अनजान लोग रातों रात हर आदमी के मन मस्तिष्क पर छा गए, क्योंकि इनकी हर हरकत, हर मूवमेंट अब आपके फ़ोन पर उपलब्ध थी.

सोशल मीडिया ने एक तरह से उस समय 2011 में अरब देशो में हुई क्रांति को भारत में replicate करने का काम किया. इंडिया गेट या रामलीला मैदान को तहरीर स्क्वायर का भारतीय वर्शन बना दिया गया.

हालांकि उस समय अधिकतर लोग मात्र कॉपी पेस्ट से काम चलाते थे, अपने मन की बातें बहुत ही कम लिखा करते थे. अपने अंदर के इमोशंस को बाहर लाने का काम किया था 2012 में घटित हुए निर्भया रेप-मर्डर काण्ड ने.

मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस समय ऐसे ऐसे लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये जो अमूमन चुप ही रहना पसंद करते थे. पूरा देश उद्वेलित था और लोगो को एक प्लेटफार्म मिल गया था अपने गुस्से को बाहर निकालने का.

निर्भया एक प्रतीक मात्र थी, लोगो ने महिला सुरक्षा नियम कानून में बदलाव करने की पुरजोर मांग की. सरकार पर दबाव बनाया, दिसंबर की कड़कड़ाती ठण्ड में विजय चौक पर युवाओं का ज़बरदस्त प्रदर्शन आज भी रौंगटे खड़े कर देता है.

पानी की धार बह रही थी, ऊपर से पुलिस की लाठियां बरस रही थीं, उस बीच कुछ युवक और युवतियों वहां खड़े हुए थे और सिस्टम को ललकार रहे थे, यह तस्वीरें एक बदलाव की सूचक थी. एक ऐसा बदलाव जो अगले एक दशक की रूप रेखा को बदलने जा रहा था.

अगले ही साल केदारनाथ में प्रलयंकारी घटना घटी और हजारों श्रद्धालु काल कवलित हो गए. सेना और अन्य दल अपना काम मुस्तैदी से कर ही रहे थे, लेकिन तभी आपदा प्रबंधन में सोशल मीडिया का एक अलग ही रोल भी दिखा.

लोगों ने अपने परिचितों की जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर करना चालू की. भारतीय सेना ने अपनी ट्विटर हैंडल को एक ‘इमरजेंसी सेल’ की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया.

लोगों के परिचित गायब थे, उन्होंने गूगल सर्च किया एवं अन्य टूल्स की सहायता से उनकी पुरानी लोकेशंस का पता लगा कर सेना के ट्विटर हैंडल पर डाला, और आश्चर्जनक रूप से सैकड़ों लोगों को सोशल मीडिया की मदद की वजह से बचाया भी जा सका.

अगले ही साल नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. उसके बाद सोशल मीडिया में टेक्नोलॉजी का बेहतर समावेश शुरू हुआ. चाय पे चर्चा, 3D होलोग्राम टेक्नोलॉजी और मोबाइल रथ का उपयोग शुरू हुआ. लाइव सेशंस और क्वेश्चन-आंसर सेशंस होना शुरू हुए. एक तरह से सोशल मीडिया mature होता दिखाई दिया.

हालांकि अभी भी सोशल मीडिया पर एक अलग ही ‘पैरेलल यूनिवर्स’ था, जहां लोग कमेंट सेक्शन में 7 लिखने पर रंग बदलने का इंतज़ार करते थे. 2 सांपों के जोड़े की तस्वीर को देखते ही जयकारा लगाने पर 24 घंटे में एक खुशखबरी मिलने का वादा किया जाता था.

बाइबिल के वर्सेज़ पर like करने पर आपके सभी दुःख और समस्याएं दूर करने का तरीका बताया जाता था. इतना ही नहीं. मक्का या मदीना की फोटो को like और शेयर करने मात्र से लोगों को जन्नत का टिकट मिलने की गारंटी दी जाती थी. जाहिर है यह बेवकूफ बनाने के तरीके थे और कोई भी धर्म का व्यक्ति इससे अछूता नहीं था.

हालांकि फिर भी एक उम्मीद तो थी ही कि सोशल मीडिया एक अल्टरनेटिव दे रहा है हमें. एक घर में बैठे इंसान को भी दुनिया के दूसरे छोर पे बैठा आदमी तुरंत पढ़ सकता था, अपने विचार रख सकता था. सोशल मीडिया एक कंटेंट ड्रिवेन प्लेटफार्म है, इसमें टेक्स्ट, वीडियो, पिक्चर आदि अलग अलग तरह के मीडिया का आदान प्रदान किया जाता था.

इस नए प्लेटफार्म का जम कर उपयोग हुआ, चाहे वो घर में बैठी गृहणी हो जो फेसबुक/ यूट्यूब पर कुकिंग क्लास सेशन दे रही हो, या कोई राजनेता हो जिसे अपने क्षेत्र के लोगों से जुड़ना हो, या कोई स्किल्ड रिसोर्स हो जिसे कमाई करनी हो, सोशल मीडिया ने सभी को भरपूर मौके दिए. आज कई बड़ी बड़ी हस्तियां है जो सोशल मीडिया की वजह से ही अस्तित्व में आयी हैं.

लेकिन क्या सोशल मीडिया में सब कुछ अच्छा ही अच्छा चल रहा था? कहीं अंदरखाने कुछ उबल तो नहीं रहा था? क्या सोशल मीडिया का दुरूपयोग किया जा सकता था… या होना शुरू हो गया था… या हो चुका था?

क्रमश:…

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