आसिफा को न्याय दो, पर बाकियों को दीन के भरोसे मत छोड़ना सरकार

नाइंसाफी हुई है. दीन खतरे में है और मोमबत्ती ब्रिगेड एक्शन में. लेकिन दीन का पड़ोसी होने की कीमत जानते हैं?

पांच अगस्त, 2014 को ब्रिटेन की पहली मुस्लिम महिला कैबिनेट मंत्री सईदा वारसी ने गाजा पट्टी पर इजराइली हमले और मुसलमानों के कत्लेआम के विरोध में इस्तीफा दे दिया.

पाकिस्तानी मूल की जिहादी वारसी लोकतंत्र और मानवाधिकारों की आड़ में मुस्लिम कार्ड खेलने के लिए जानी जाती है. लिबटार्डों के ये शगल जिहादियों के लिए उन्हें अंदर से खोखला करने के औजार हैं.

ऐन उसी दिन इराक की संसद में देश की इकलौती यजीदी सांसद वियान दाखिल दुनिया के नेताओं से यजीदियों की सुरक्षा की गुहार लगाते हुए फफक फफक कर रो पड़ीं. और ये किसी जिहादी के घड़ियाली आंसू नहीं थे.

Vian Dakhil का आर्तनाद आपकी आत्मा को चीर देगा.

यजीदियों की एक वेबसाइट के मुताबिक पिछले 700 सालों में विभिन्न नरसंहारों में अब तक दो करोड़ तीस लाख यजीदी मारे जा चुके हैं.

18वीं व 19वीं सदी में आटोमन साम्राज्य के 72 हमलों में यजीदियों का लगभग सफाया हो गया और जान बचाने के लिए उन्हें सिंजर की पथरीली और शुष्क पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी.

1774 से 95 के बीच तुर्क सेनाओं ने अकेले सिंजर पर ही छह बड़े हमले किए और लाखों यजीदियों को मार डाला.

अब पचास हजार की आबादी वाला सिंजर दुनिया का एकमात्र यजीदी बहुल शहर है. इस जिले में लगभग ढाई लाख के करीब यजीदी हैं जो इनकी समूची आबादी का करीब 40 प्रतिशत है.

आटोमन साम्राज्य के दौर में यजीदियों के जातीय सफाये के इस अभियान को तुर्की के उलेमाओं का भी पूरा समर्थन हासिल था जो सुन्नी संप्रदाय के हनफी मत का प्रसार चाहते थे.

सद्दाम हुसैन ने यजीदियों को अरब घोषित कर दिया. प्रतिरोध करने पर इनके ढाई सौ गांव उजाड़ दिए और यजीदियों की जीवनरेखा दजला नदी के पानी में जहर डाल दिया. फिर अगस्त 2007 में एक ही दिन सिलसिलेवार आत्मघाती हमलों में 800 यजीदी मारे गए थे.

इतिहास नहीं बांच रहा. ‘शांतिदूतों’ के बीच में रहते हैं और हर हाल में शांति चाहिए तो नतीजा यह होता है :

जनसांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार दो सौ साल पहले दुनिया में यजीदियों की आबादी दो करोड़ थी. अब बस छह से सात लाख के बीच बची है.

इनमें से चार से पांच लाख के बीच इराक में हैं. बाकी सीरिया, आर्मीनिया में हैं. बचे हुओं से भी हिसाब लिया जा रहा है.

इनकी महिलाओं और बच्चियों की पिछले तीन-चार साल से सीरिया-इराक में मंडियां लगी हुई हैं जहां इन्हें बेचा-खरीदा जा रहा है. ये कौम अब विलुप्त होने वाली है.

वैसे 1947 में पाकिस्तान में 18 प्रतिशत हिंदू थे, अब विलुप्त हो गए. उनको जमीन खा गई, आसमान निगल गया या अमनपसंद हजम कर गए?

घाटी के पंडितों की याद दिलाना तो जी, निहायत जाहिल-गंवार होने की निशानी है. इसलिए प्रगतिशील धिम्मी मोमबत्ती मार्च निकालेंगे, फिर पिज्जा खाते हुए घऱ जाएंगे. क्रांति भी हो गई और आउटिंग भी.

लगे रहो. आसिफा को न्याय मिले, यदि नहीं मिला तो राज्य व समाज के तौर पर हम विफल हैं. लेकिन आसिफा तो बहाना है, जम्मू पर निशाना हैं. मेरा समर्थन लाल सिंह जैसों के साथ है क्योंकि हमें और आपको हक है अपने घर को वहाबी हवाओं से बचाने का.

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