नदी ख़ुद में ही देखती है आसमान और अपने ही इश्क़ में पड़ जाती है

एक नदी से मिलने गई
घंटों बैठ निहारा उसे
उठ कर चलने लगी तो लगा मेरे अंदर भी एक नदी बहती है

पर मन ने एकदम से जवाब दिया
नहीं, तुम ख़ुद ही एक नदी हो
छलछल -कलकल करती, बहती ही जाती
किनारों से टकराती, उलझती, सुलझती

वो देखो, एक बच्ची मेरी लहरों को पकड़ने की कोशिश करती
मंत्रमुग्ध करती हैं उसे लहरें
इंतज़ार करती है लहर का कि कब उस तक पहुँचे

पहुँचती है तो डर कर दो क़दम पीछे हो लेती है
पर फिर डरती -डरती आगे बढ़ती है
थामना ही है लहर को उसने अपने हाथों में
पर लहरें हैं कि आती-जाती रहती हैं
उस लड़की की आँखों की चमक को किसी की नज़र न लगे

साँझ का समय है
कोई पीपल के पत्तों की छोटी सी नाव बनाता है
उस में लाल गुलाब के फूल रखता है
बीच में रखता है एक जलता हुआ दिया
मन में कोई मन्नत माँगता है
कोई दुआ है, कोई इल्तज़ा
पिछली पूरी हुई मन्नतों का शुकराना भी
और मेरी छाती पर छोड़ देता है

कोई आता है
हाथ में लाल रंग की पोटली
पोटली में किसी प्यारे की अस्थियाँ
आँखों में नमी लिए, होंठों पर प्रार्थना लिए
मुझ में छोड़ जाता है
यह वजूद का बचा – खुचा हिस्सा
न जाने मैं कितनी ख़र्च हो जाऊँगी उन्हें पिघलाने में

सूर्य की पहली किरण के साथ कोई मुझ में उतरता है
स्नान करता है
मुझे हाथो में उठाता है
और सूर्य को अर्पण कर देता है
करता है उगते हुए सूर्य को नमस्कार
और अपनी दिनचर्या में मस्त हो जाता है

हाँ, कोई-कोई आता है
जो मुझ में ख़ुद को निहारता है
घंटों बैठता है मेरे पास
अपनी सुनाता है
मेरी सुनता है
ठहरता तो कोई भी नहीं
सब मुसाफ़िर हैं
अपने ही सफ़र के राही
कुछ पल के हमजोली

चाँद मगर जब अपनी जवानी पर होता है
मेरी लहरें आसमान की ओर उछलती हैं
असहनीय तड़प
मार ही डालने वाली ख़्वाहिश…

क्या हुआ जो मैं एक नदी हूँ
मेरा भी दिल है
मुझे भी दर्द होता है
मैं भी ख़्वाब देखती हूँ

पर आसमान तक कभी कोई पहुँच पाया है क्या
आसमान कहीं है भी क्या?

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