हर पल बलात्कारी बनाने का ज़हर बांट कर उम्मीद कर रहे कि मानवता ज़िंदा रहे

बलात्कार… यह मानव समाज का वीभत्स चेहरा है.

यह वो अपराध है जिसकी कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए.

यह वो कुकर्म है जो एक मासूम का जीवन तबाह करके उसे ज़िंदा लाश बना देता है.

यह अमानवीय है अप्राकृतिक भी. इसे पशुता कहते हैं मगर यह उचित नहीं क्योंकि पशु बलात्कार नहीं करता. हाँ इसे राक्षसी प्रवृत्ति कह सकते हैं.

दुर्भाग्य से ये असुर हर युग और स्थान पर हुए.

बलात्कार करने वाले मानव रूपी शैतानों का समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता.

मगर इन राक्षसों से अधिक बड़े अपराधी वे हैं जो बलात्कार में भी सेलेक्टिव होते हैं.

ये एक बलात्कार पर अपने कपड़े फाड़ते हैं तो दूसरे बलात्कार पर अपनी आँखे मूँद लेते हैं.

ये मौका देखकर बलात्कार की घटनाओं पर लाइक और शेयर बटोरने के लिए भावनाओं से खेलते हैं.

प्रेस्टीट्यूट्स के लिए ये एक तमाशा होता है जिसमें कुछ एक घटना पर टीआरपी का खेल खुल कर खेला जाता है.

इन घटनाओं पर चंद वोट बटोरने के लिए राजनीति करने से भी राजनेता नहीं हिचकते.

ऐसा करके ये सभी महादानव पूरे समाज के साथ बलात्कार करते हैं. इन गिद्धों को आसानी से देखा पढ़ा सुना जा सकता है.

लेकिन सवाल यहां आम जनता से पूछना चाहिए, जो इन गिद्धों की बातों में आ जाती हैं.

आखिर किसी एक घटना पर सिर्फ चीखने और चिल्लाने से क्या होगा? क्या मीडिया में प्राइम टाइम करने से अपराध रुक जाएगा?

क्या कोई इनसे सवाल पूछेगा की इस तरह की घटनाएं ना हों इसके लिए इनका क्या सुझाव-प्रयास है?

आखिर ये बलात्कारी कहां से ऊर्जा लेते हैं? ऐसा करने के लिए यह कहाँ से प्रेरित होते हैं?

क्या कभी किसी चैनल ने उन फिल्मों का विरोध किया जिनमें बलात्कारी को महिमामंडित किया गया है?

शाहरुख़ की फिल्म डर और बाज़ीगर को सुपर हिट बना कर उसे सुपर हीरो बनाने वाले समाज ने क्या कभी आत्मनिरीक्षण और विश्लेषण किया?

क्या टेलीविज़न पर आने वाले असामाजिक सीरियल पर किसी ने कभी कोई प्रश्न चिन्ह खड़ा किया?

बाजार की शक्तियॉं किसे नायक-नायिका के रूप में स्थापित कर रही हैं, क्या किसी ने कभी गौर किया?

आजकल किस तरह के गाने बन रहे हैं, क्या कभी किसी का ध्यान इस पर गया?

ऐसे ही अनगिनत सवाल हैं जिनका जवाब है, नहीं नहीं नहीं.

हम हर पल बलात्कारी बनाने का ज़हर बाँट रहे हैं और उम्मीद करते हैं की समाज में मानवता ज़िंदा रहे.

दुनिया में सिर्फ सनातन सभ्यता है जो मानव की उपरोक्त कमजोरियों को जानता और पहचानता था.

सनातन ही एकमात्र संस्कृति है जो दानव को मानव बनाने के लिए संस्कारों की बात करती आयी है.

मगर हमारी परम्पराओं से इन संस्कारों को तथाकथित आधुनिकता ने बड़े योजनाबद्ध ढंग से दूर किया.

क्या यह हम समझ पाए कि पश्चिम ने बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा दिया है?

क्या हम इस बात का विरोध कर पाए जहां एक मज़हब दूसरे धर्म की महिला के साथ बलात्कार करने के लिए प्रेरित करता हुआ आम देखा-पढ़ा-सुना जा सकता है?

आखिर रानी पद्मवती ने जौहर क्यों किया था?

आज बलात्कार पर आसमान सर पर उठाने वालों, याद करो तुमने संजय लीला भंसाली के पक्ष में कैसे कैसे कुतर्क गढ़े थे?

तुमने उस वक्त क्यों विरोध नहीं किया जब फ़िल्मी दुनिया का एक हीरो रणबीर सिंह एक बलात्कारी के रोल में लिया गया?

जब एक फ़िल्मी जोड़े ने अपने बच्चे का नाम तैमूर रखा तब तुम सभी गिद्धों ने अपनी अपनी आँखे क्यों बंद कर ली थी?

तुम कह सकते हो कि इन सवालों का यहां क्या संदर्भ?

तो जवाब है कि तैमूर और खिलजी जिस समाज में जन्म लेते और पाले जाते हैं वहाँ बलात्कार जैसे अपराध नहीं रोके जा सकते.

वैसे तुम शैतानों को शायद निर्भया काण्ड याद नहीं, जिसमें अमानवीयता की सारी हदें पार करने वाला मुख्य अपराधी जब क़ानून की आड़ में जेल से छूट रहा था तो तुमने मुँह में दही जमा ली थी.

यह तुम लोगों की रहस्मयी चुप्पी बेहद खतरनाक है, क्योंकि तथाकथित नाबालिग बलात्कारी अब बालिग़ होकर समाज में खुला घूम रहा है.

उसका अगला शिकार कोई मासूम ना बने इसकी सिर्फ प्रार्थना ही की जा सकती है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY