संन्यासी एवं राष्ट्रवादी के प्रकार

दो वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के उज्जैन में हुए सिंहस्थ कुंभ पर यह लेख लिखा था. इस कुम्भ में जुटने वाले साधुओं को लेकर मन में एक जिज्ञासा आई और उसके समाधान में यह लेख लिखा गया. पढ़ें और अपनी सहमति-असहमति अवश्य दर्ज करें.

एक हफ्ते बाद उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ मेला लगने वाला है जिसमें हज़ारों की संख्या में साधु-संन्यासियों का जमघट लगेगा.

इन साधु-संन्यासियों को लेकर मेरे मन में एक सवाल यूँ ही उठा करता था कि ऐसी कौन सी प्रेरक शक्ति होगी जो किसी को संन्यासी बनने के लिए प्रेरित करती होगी?

कौन सी दिव्यता की तलाश उन्हें ऐसा बनने को मजबूर करती होगी? या फिर परिस्थितियां क्या रहती होंगी?

मैंने बिना सिर खपाए जो मोटा मोटी निष्कर्ष निकाला वो ये कि संन्यासी बनने के प्रोसेस को तीन मेन कैटेगरी में बाँट सकते हैं…

पहली कैटेगरी, इसमें बचपन में ही अपने घर के आध्यात्मिक वातावरण को देखना… इसका असर बाल मष्तिष्क पर ऐसा पड़ना कि बड़ा होने के बाद गृहस्थी से मोहभंग होना… अविवाहित रहने की इच्छा, देश समाज के कल्याणार्थ किसी योग्य गुरु एवं आश्रम की तलाश में घर छोड़ देने का संकल्प लेना.

इस प्रोसेस से बनने वाले संन्यासी को मैं ‘उत्तम’ कहूँगा.

दूसरी कैटेगरी में अध्यात्म बोलकर वैसा कुछ नहीं होता होगा… गृहस्थ परिवार होगा, विवाहित हो या न हो कोई खास फर्क नहीं पड़ता… पर कोई ऐसी घटना जो उसके साथ घट गई हो… जैसे माँ बाप ने डपट दिया हो… सामाजिक प्रताड़ना सहना पड़ी हो… उसके दिल को ठेस पहुँची हो… और उसने दिल पर ले लिया हो….

बेइज्जती बहुत हो गई हो… कुछ ज्यादा समझ ना आता हो तो फिर घर परिवार को त्याग संन्यासी बनने की राह पर निकल पड़ता होगा… फिर जरूरत के हिसाब से आध्यात्मिकता का लबादा ओढ़ लेता होगा.

ऐसी कैटेगरी को मैं ‘मध्यम’ मानता हूँ.

तीसरी कैटेगरी वो जिसमें कोई शौकिया तौर पर संन्यासी बनता होगा… इसमें पद की लालसा, ज्यादा चेले चपाटे… अच्छे वस्त्राभूषण, शोहरत की लालसा… अय्याशी से परहेज नहीं… तिकड़मबाजी से शीर्ष पर पहुंचना… फिर जिंदगी को अपने ढंग से जीने की इच्छा शामिल होगी…

इस कैटेगरी को मैं ‘अधम’ कहूँगा.

अब हम गुलाम भारत के एक काल खंड (1869-1889) के बीस वर्षों के दरम्यान पैदा हुई तीन विभूतियों पर गौर करते हैं, जिनका असर देश की राजनीति पर कुछ ऐसा पड़ा कि सारे परिदृश्य में आमूलचूल परिवर्तन आ गया. चाहे आज़ादी के पहले की बात हो या फिर आजादी के बाद की… या फिर वर्तमान की… या फिर आने वाले कई दशकों तक की.

वे तीन थे… गाँधी, हेडगेवार और नेहरू.

अब मैं तीनों का विश्लेषण करता हूं निहायत ही निजी सोच के मुताबिक…

पहले गाँधी (1869) पैदा हुए, बचपन आम बालकों की तरह… पर आज्ञाकारी, ईमानदारी में कोई कमी नहीं, विवाह हुआ… गृहस्थी बसी… 1888 में पढ़ने लंदन गए… बैरिस्टर बने… पाँच साल बाद अफ्रीका जाकर वकालत शुरू की… प्रवासी भारतीयों के बीच रहकर काम किया सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था…

देश की गुलामी को भी कभी-कभी याद कर लिया करते थे… आने की अभी ज़रूरत नहीं थी पर अचानक इनके जीवन में दो ऐसी घटनाएं हुई जिससे कि इनके दिल पर ठेस लग गई… बेइज्ज़ती ऐसी हुई कि अब ये अंगरेजों से बदला लेने की इच्छा लिए सपरिवार वापस भारत लौट आए… देश सेवा करने… सत्य अहिंसा का लबादा ओढ़े भारत को आज़ाद कराने.

पहली घटना तब हुई जब ट्रेन के प्रथम श्रेणी में वैध यात्रा टिकट लेकर बैठने के बावजूद इन्हें अँगरेजों द्वारा धक्के मारकर निकाला गया.

और दूसरी तब जब एक अदालत में अँगरेज न्यायाधीश के द्वारा पगड़ी उतार कर आने को कहा गया था जिसे इन्होंने मना कर दिया था… बेइज्जती का घूँट पीकर एवं अँगरेजों के प्रति नफरत पाले भारत आ गए देश को आज़ाद कराने.

इनके बाद पैदा हुए ‘हेडगेवार’ (अप्रैल 1889). बचपन से कुशाग्र बुद्धि एवं राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत… इंग्लैंड में रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की डायमंड जुबली के उपलक्ष्य में एक बार इनके स्कूल में मिठाईयाँ बाँटी गई. उम्र आठ वर्ष पर बाल मन में राष्ट्र भावना पनप रही थी गुलामी के मायने समझ में आ गई थी सो मिठाई को लेकर कूड़ेदान में फेंक दिया.

1901 में जब एडवर्ड सप्तम को इंग्लैंड की गद्दी दी गई उस वक्त भी भारत में जश्न मनाया गया. सभी बच्चे नजदीक के कस्बे में आतिशबाजी देखने गए पर यह बालक ये सोचकर कि जिस राजा ने हमें गुलाम बना रखा है उसकी खुशी में क्यों शामिल होना?… यह बालक नहीं गया.

जब ये मैट्रिक में थे, अँगरेज स्कूल इंस्पेक्टर के सामने वन्दे मातरम् का उद्घोष करने के एवज में इन्हें स्कूल निकाला दिया गया… मतलब इनमें राष्ट्र प्रेम नैसर्गिक था. कलकता जाकर डाक्टरी की पढ़ाई की, पर देश कार्य हेतु पेशे को नहीं अपनाया. पारिवारिक दबाव के बावजूद इन्होंने अविवाहित रहने का प्रण लिया.

अब आते हैं ‘नेहरू’ (नवम्बर 1889) पर… बचपन ऐशो आराम में गुजरा… बड़े हुए पढ़ने विदेश गए… अँग्रेजों के दोस्त बने… वापस आए… गाँधी का सान्निध्य मिला… राजनीति की मुख्य धारा में शामिल हुए… बुद्धिजीवी और वामपंथी इनके चेले चपाटे बने…

आज़ादी की जब खूशबू आने लगी तब नेतृत्व करने की इच्छा प्रबल हुई. गाँधी के सहयोग से पटेल से पीछा छुड़ाया… प्रधानमंत्री बनने की चाहत ने देश को विभाजन के कगार पर ला दिया… विभाजन हुआ… प्रधानमंत्री का पद पाया… काश्मीर फँस गया…

राष्ट्रपति के पद के लिए राजेंद्र प्रसाद सर्वमान्य नेता थे पर राह में रोड़ा अटकाया… क्योंकि ये अपने नजदीकी सी. राजगोपालाचारी (राजा जी) को बनाना चाहते थे, पर पटेल के आगे एक नहीं चली. मतलब कि विशुद्ध राजनीति… देश और देश प्रेम जो है सो हइए है… तिकड़मबाजी में भी कोई कमी नहीं थी.

इसलिए कहने का तात्पर्य यह है कि अगर आप कुम्भ स्नान को जायें तो उपर लिखे संन्यासियों के प्रकार में से किन संन्यासियों के तम्बूओं में ठहरना चाहते हैं आप खुद तय करें.

और हाँ… इन तीनों महान विभूतियों को अपने हिसाब से श्रेणीबद्ध कर लें.

‘उत्तम’ – ‘मध्यम’ – ‘अधम’

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