कब और कैसे बनीं औरतें सेक्स ऑब्जेक्ट और मर्द पोटेंशियल रेपिस्ट

आप कितने दिन से बॉलीवुडिया सिनेमा देख रहे हैं?

हमारे जैसे गांवों में पहुंचने में इन सिनेमाओं को हमारे किशोर तक का होने का समय लगा. मतलब हम जब सातवीं कक्षा में थे तब आया इसका युग.

हाँ कुछ सिनेमा हॉल ज़रूर थे लेकिन उतनी पहुँच नहीं जहाँ आम जन पहुंच सके. टीवी पूरे गाँव में तीन चार जनों के यहां ही होते थे जिसमें केल्कुलेटेड वीकेंड के तीन दिन बॉलीवुडिया सिनेमा का टेलीकास्ट होता था.

फिर धीरे-धीरे प्राइवेट चैनलों की बाढ़ आती गई और सिनेमा का दायरा सिनेमा हॉल से होते हुए ड्राइंग रूम और बेडरूम तक पहुंच गया… हाँ इस बीच वीसीडी प्लेयर ने भी खूब धूम मचाई.

तो एक समय सीमा देखिये… फिल्मों में बदलाव कब से आने लगे और उसका सामाजिकता पर क्या प्रभाव पड़ता गया?

सब कोई सिनेमा के दीवाने हैं… कभी न कभी आपके हाथ में वीसीडी प्लेयर और टीवी के रिमोट रहते तो होंगे ज़रूर…

जब फिल्म में किसी रेप का सीन आता था तब आपकी उंगलियां क्या करती थीं? जब पूरे फैमिली के साथ देख रहे हो तब? आपकी उंगलियां तुरंत उस सीन को फॉरवर्ड करने लगती थीं… या टीवी में हो तो तुरंत चैनल चेंज…

तब आपके मन में क्या चल रहा होता था? बस इतनी समझ तो थी कि इसे हम अपने परिवार के साथ नहीं देख सकते या कोई एक लड़की भी साथ में देख रही हो तो उसको हम अवॉइड नहीं कर सकते… कारण? आप स्वयं विचार कीजियेगा.

दूसरा पहलू देखिये… आप अगर अपने मित्रों के साथ देख रहे हों तो आपकी मानसिकता क्या होती है? कोई सीन फॉरवर्ड नहीं होगा, बल्कि चटखारे लगा के देखोगे यहां तक कि बैक कर-कर के देखोगे… बीच में तब गाली भी दोगे जब हीरो एकदम ऐन वक्त पर एंट्री मारकर गुंडे को पीटना शुरू कर देता है.. ‘साला! इसको अभी ही आना था .. पूरा तो कर लेने देना था बे!’

कभी-कभी छोटे-मोटे प्रोड्यूसर अपना क्षेत्रीय सिनेमा बनाने की बात करते तो मालूम है सबसे पहले लोग कौन से किरदार की भूमिका करना चाहते थे/हैं? मेन गुंडे का रोल… क्योंकि गुंडे ही तो असली मज़ा लेते थे.

छीना-झपटी, पटका-पटकी, जबरदस्ती के बहाने मज़ा लेने की ख्वाहिश!… ये मज़ा लेने वाली बात इनके मन में कैसे घर कर गई? कहाँ से आई?

अब दूसरे पहलू पर नज़र डालें…

आज से मात्र 25-30 साल पहले कितने बलात्कार के केस होते थे? कितने अखबारों में इनसे सम्बंधित न्यूज़ पढ़ते थे आप? आज का जो रेशियो है क्या वो उस समय था? जहाँ आज भी सिनेमा की पहुंच नहीं है वहाँ कितने बलात्कार के मामले होते हैं ज़रा पता करियेगा?

एक झारखंड की महिला मित्र ने दावा किया कि झारखंड में जितने भी रेप केसेज़ हैं उनका डेटा निकालिए और पता लगाइये कि इनमें से कितने आदिवासी नाम हैं? और परसेंटेज निकाल के बताइयेगा कि कितने हैं? आपको 0.0001% भी मिल जाये तो कहियेगा. क्यों भाई क्यों नहीं है ऐसे केसेज़? कारण क्या है? ढूंढिये उत्तर!

किसी अभिनेत्री को मोस्ट सेक्सिएस्ट ऐक्ट्रेस का अवार्ड मिलता है तो फूले नहीं समाती है… किसी हीरोइन में सेक्सी वाले लक्षण नहीं है तो फिर काहे की हीरोइन?

और सेक्सी माने? जिसके साथ हर कोई सेक्स करना चाहे वो सेक्सी, यही न? कि और कोई दूसरा कारण है? और सेक्सी होने के पैमाने क्या हैं?

आप बिकनी में कैसी लगतीं? आपकी ब्रेस्ट साइज़ क्या है? क्लीवेज कैसे हैं? होंठ कैसे हैं? नितंब कैसे हैं? बेडसीन कैसे देती हैं? एक्सप्रेशन कैसे हैं? एक आम दर्शक के अंदर खलबली मचती है या नहीं? यही सब कुछ न?

कोई बिकनी में आ रही है तो कैमरा का फोकस कहाँ है? और आप देखना क्या चाहते हैं? अंगों को फोकस कैसे किया जा रहा है? आपकी सेक्स के प्रति उद्विग्नता कैसे जगाई जा रही है? वो प्रदर्शित और फिल्माए गए अंग आपके मन मष्तिस्क में गहरा छाप छोड़े जा रहे हैं या नहीं?

पहले भी लिखा था जहाँ नग्नता नैसर्गिक हुआ करती थी उसमें कोई हवस, कामुकता या सेक्सीपन का भाव नहीं हुआ करता था… सहज भाव से ही सब लिया जाता था… बाँध में एक साथ नहाती लड़की, महिलाओं के साथ कभी ये नहीं हुआ कि उसके कौन से अंग दिख रहे हैं या भीगे कपड़ों में लिपटी कैसी दिखती है?

सिर्फ पैटीकोट में नहाती महिलाओं को कभी कोई छेड़ा नहीं या साथ में नहाते किसी मर्द का कच्छा कभी उफान मारा हो… खुले स्तन में स्तनपान कराती महिला को देख कर किसी के मन मे ये ख्याल नहीं आता था कि इसके ब्रेस्ट साइज क्या होंगे?

इसका मतलब ये नहीं कि इन्हें सेक्स का भान नहीं था. नहीं होते तो हम न आये होते दुनिया में. लेकिन सेक्स विकृतियां घुसी कैसे इनमें?

अब तो ब्लाउज़ के अंदर से ही साइज़ पता हो जाते हैं. नहाती महिलाओं को देख कर आपके अंदर का मर्द उफान मारने लगता! जरा सा कोई अंग दिखा नहीं कि भावनाएं उबाल मारने लगती!

रिश्ते तो अब गए ज़माने की बातें होने लगी… अब तो हर स्त्री में सेक्स ऑब्जेक्ट ही नजर आता है. क्यों भला? किसने घुसाया इसके अंदर ये कीड़ा?

अब तो चौदह साल का बच्चा भी महिला से संबंध बनाने की कामना रखता है और एक अधेड़ उम्र का आदमी चौदह वर्ष से कम लड़कियों का! क्यों? कहाँ से ये आया सेक्स का कीड़ा? और इतना आ गया कि नैतिक अनैतिक कुछ भी मायने नहीं रखता, कुछ मायने रखता है तो सिर्फ ये कि हवस की आग शांत कैसे हो?

स्त्रियों के नैसर्गिक अंग सेक्स पार्ट्स बन गए? नैसर्गिक नग्नता, कामुकता और फूहड़ता का पर्याय बन गए… कैसे बन गए? किसने बनाया इसको?

उत्तर है इन्हीं फिल्मों भांडों ने.

अंगों का प्रदर्शन और फोकस कुछ इस तरह हुआ कि दर्शक बस उसी में समा गए… उन्हें दिखाने के तो पैसे मिले और ढेर मिले, लेकिन हमारी बहन-बेटियों को क्या मिला? छेड़खानी? रेप? मर्डर? यही सब कुछ न?

एक बड़की प्रसिद्ध हीरोइन कागज का पोस्टर लगा के बड़ी ही मार्मिक अपील कर रही है “आई एम अशेम्ड!.. हैंग रेपिस्ट्स!!”… हाँ पोस्टर टांगे उनके क्लीवेज अच्छे से दिख रहे थे.

मेरा पोस्टर पर ध्यान गया लेकिन उसके बाद नज़र उसके क्लीवेज पर टिक गई! जी… टिक गई! बड़े सेक्सी थे! अब इग्नोर तो नहीं कर सकते न? तुम इसी पे तो नाज़ करती हो और इसी के तो पैसे वसूलती हो तो अगर हम देख लिए तो क्या बुरा कर दिया?

जवाब मिलेगा ‘कीड़ा तुम्हारे अंदर है… हमारे कपड़ों में नहीं… मर्द हो तो संयम रखना सीखो… हमारे क्लीवेज हैं इसे मैं जैसे चाहूंगी दिखाउंगी… तुम्हें प्रॉब्लम है तो तुम अपना इलाज करवाओ… पोटेंशियल रेपिस्ट कहीं के!’

हमारा ध्यान आपके क्लीवेज पर गया आपके ब्रेस्ट पर गया लेकिन उसपर ध्यान देना किसने सिखाया? आप जब ड्रेस डिज़ाइन कर रहे थे तब आपको भी पता होगा कि मेरे अंग कितने दिखने चाहिए और क्यों दिखने चाहिए? आप ऐसे ही कपड़े पहनेंगे जिससे मर्दों का ध्यान न चाहते हुए भी वहीं पे जायेगा जिसे आप दिखाना चाहती हैं… और इसपे कोई देख लिया तो वो पोटेंशियल रेपिस्ट हो गया?

और बात यही है कि हमें पोटेंशियल रेपिस्ट बनाया किसने? हममें संयम रहता तो तुम्हारी फिल्मों को किक न मार देते?.. इसी संयम का हवाला रहता तो सीटी ताली न मिलती और तुम इतनी ग्लैमरस लाइफ न जी रही होती और न मोस्ट सेक्सिएस्ट का अवार्ड पा रही होती…

तुम्हारे द्वारा प्रदर्शित अंगों की नुमाइश ने बेटियों का क्या हाल किया है कभी सोचा है तुमने? आज से 25 साल पहले जो माहौल था क्या वो अब है? क्यों नहीं है? कौन है ज़िम्मेदार? क्या तुम्हारे बॉलीवुड के पैसों के भेड़िये इस बात पर कभी मन्थन करेंगे? या केवल ज्ञान देना जानते हैं?

तुमने एक स्त्री को मादा बना के रख दिया है और पुरुष को नर… जहाँ नर केवल मादा की गंध सूंघते चलता है, वो क्या है, कौन है, कितनी है कोई मायने नहीं रखता.

तुमने स्त्री की स्त्रीत्व, प्रकृति, प्रवृति, नैसर्गिकता को सेक्स, कामुकता, फूहड़ता और भौंडेपन में परिवर्तित करने का काम किया है और मर्दों को एक एक्टिव और पोटेंशियल रेपिस्ट में ढलने को मजबूर.

तख्ती पे शेम, अशेम्ड लिखने वालों शर्म तो तुम्हें आनी चाहिए… तुमने भारतीयता का जो बेड़ा गर्क और गहरे गर्त में डुबाने का काम किया है वो भारतीय समाज कभी माफ नहीं कर सकेगा… तुम्हारा यूँ तख्तियों पे स्लोगन लिखना शोभा नहीं देता… अगर शर्म बची है तो देह बेचना छोड़ और स्त्रीत्व, नारीत्व और भारतीयता का बोध कराइये.

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