मेरे राम ऐसे नहीं हैं साहब!

 

सनातन परम्परा थोड़े अध्ययन के बाद हमेशा भ्रम में डालने वाली लगती है. ये कभी हमें ब्रह्म तत्व को समझाती है, तमाम संसार को उससे बना बताती है. गॉड पार्टिकल जैसी चीजों के माध्यम से विज्ञान भी हमें एकाध कदम उसी तरफ आगे बढ़ा देता है. फिर हमारी पद्धति हमें, ‘एकोहम-द्वितीयोनास्ति’ भी सिखाती है… ‘ब्रह्मसत्यम् जगतमिथ्या’ भी बताती है, और ऐसा बताते-बताते जाने कब बड़े चतुराई से उसमें शिव-तत्व को ले आती है. जब एक ही ब्रह्म-सत्य, फिर शिव तत्व कैसे?

तभी मेरी दृष्टि राम की ओर जाती है. दशावतारों में राम ही मर्यादा पुरुषोत्तम माने गए हैं. (दशावतार एक और भ्रम पैदा करते हैं, ये सीधे-सीधे पश्चिम के डार्विनियन थ्योरी को चुनौती है. ये अलग बात है कि अब पश्चिम भी डार्विन के अप्रामाणिकता को मानने लगा है. खैर, वो बातें फिर कभी!) राम शिव-तत्व और ब्रह्म-तत्व के इस विवाद में अहम कड़ी लगते हैं मुझे. वो ओमकार स्वरूप के काफी करीब लगते हैं. ॐ ब्रह्मा, विष्णु व महेश के एकाकार को दर्शाता है.

राम विष्णु के अवतार होकर भी शिव जैसे हैं… शिव की तरह ही सुलभ… मन से याद करो और वो आपके हो लिए.

शिव के आराधक राम ने उनके आराधना में रुद्राष्टकम लिख दिया. वहीं शिव द्वारा राम के आराधना के प्रसंग भी आते हैं.

एक बार विष पीने वाले शिव के आराधना का ही फल रहा होगा कि राम ने अपने जीवन में पल-पल विष पीया और आखिर में एक सामान्य नागरिक के विचारों को जानकर उन्होंने शक्ति स्वरूपा माँ जानकी को खुद से अलग करने जैसा फैसला कर लिया होगा?

पहली बार वैदेही से उन्हें रावण ने अलग किया था. दूसरी बार खुद रावण होकर क्या राम के टुकड़े नहीं हुए होंगे?

आप शिव में अल्हड़ योगी देखते हैं. मैं वन-वन घूमने वाले राम में देखता हूँ. आपको शिव के बारात के बसहा, भूत-प्रेत दिखते हैं. मुझे जानकी के खोज के निमित्त राम के यज्ञ में वानर-भालू जैसे तमाम प्राणी दिखते हैं.

फिर भी राम आपको शिव से अलग दिखते हैं? वचन के लिए कुछ भी कर जाने का हौसला शिव के अलावा किस में हो सकता है? राम ने कैकेयी तक का सम्मान किया था, ये भला शिव के इतर किस में हो सकता है.

हमारे मिथिला में तो राम और भी अलग स्वरूप में हैं. राम के साथ उम्र के अलग-अलग पड़ावों में या यूं कहें कि अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों का अलग रिश्ता होता है.

वैदेही मिथिला की बेटी हैं, बहन हैं, तो बच्चों की बुआ(पिशी) भी तो हैं. उस तरह से राम हमारे दामाद हैं, बहनोई हैं… तो फूफा(पिशा) भी स्वाभाविक तौर पर हैं… इस क्षेत्र में आज भी राम व अयोध्या से सम्बंधित गीत शादियों-त्योहारों में इन संदर्भों के साथ गाए जाते हैं. ये स्वतंत्रता बस हम मिथिला वालों के पास है. हिन्दी पट्टी वाले इन रिश्तों और उनके महत्व को बखूबी समझते होंगे. भक्त और उसके आराध्य का ऐसा रिश्ता कहाँ होता होगा भला?

हमारी सनातन परम्परा यही तो बताती है हमें… जो हम हैं, वही राम हैं, वही शिव हैं, वहीं ब्रह्म हैं… राम और शिव हैं तो शांति है, सदाचार हैं! शांति और सदाचार के लिए ही राम और शिव हैं… यही तो हैं हमारे राम… आप जैसा बताते हैं वैसे तो बिल्कुल नही हैं!

 

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY