भक्ति अवतरित होती है तो ईश्वर की दुलारी हो जाती है

कब से आपको पूछना चाहती हूं. कृपया आप ही बताएं कि क्या पूछूं? मेरे प्रणाम स्वीकार करें!

पूछा है ‘दुलारी’ ने. निश्चित यह बात है. वर्षों से मैं उसे जानता हूं. उसने कभी कुछ पूछा नहीं. बहुत थोड़े लोग हैं जिन्होंने कभी कुछ न पूछा हो. यह पहली दफे उसने पूछा, यह भी कुछ पूछा नहीं है.

‘कब से आपसे पूछना चाहती हूं. कृपया आप ही बताएं कि क्या पूछूं ?’

जीवन का वास्तविक प्रश्न ऐसा है कि पूछा नहीं जा सकता. जो प्रश्न तुम पूछ सकते हो, वह पूछने योग्य नहीं. जो तुम नहीं पूछ सकते, वही पूछने योग्य है.

जीवन का वास्तविक प्रश्न शब्दों में बांधा नहीं जा सकता. जीवन का प्रश्न तो केवल सूनी आंखों से, जिज्ञासा – भरी आंखों से निवेदित किया जा सकता है. जीवन का प्रश्न तो अस्तित्वगत है, तुम्हारी पूरी भाव – दशा से प्रगट होता है.

दुलारी को मैं जानता हूं. उसने कभी पूछा नहीं, लेकिन उसका प्रश्न मैंने सुना है. उसका प्रश्न उसका भी नहीं है, क्योंकि जो तुम पूछते हो वह तुम्हारा होता है. जो तुम पूछ ही नहीं सकते, वह सबका है.

हम सबके भीतर एक ही प्रश्न है. और वह प्रश्न है कि यह सब हो रहा है, यह सब चल रहा है और फिर भी कुछ सार मालूम नहीं होता! यह दौड़ – धूप, यह आपा – धापी – फिर भी कुछ अर्थ दिखाई नहीं पड़ता. इतना पाना, खोना – फिर भी न कुछ मिलता मालूम पड़ता है, न कुछ खोता मालूम पड़ता है. जन्म – जन्म बड़ी यात्रा, मंजिल कहीं दिखाई नहीं पड़ती.

हम हैं – क्यों हैं? यह हमारा होना क्या है? हम कहां जा रहे हैं और क्या हो रहा है? हमारा अर्थ क्या है? इस संगीत का प्रयोजन क्या है? सभी के भीतर दबा पड़ा हुआ है अस्तित्व का प्रश्न, कि अस्तित्व का अर्थ क्या है? और इसके लिए कोई शब्दों में उत्तर भी नहीं है. जो प्रश्न ही शब्दों में नहीं बनता, उसका उत्तर भी शब्दों में नहीं हो सकता.

यह जो भीतर है हमारे – कहो साक्षी, दृष्टा, जीवन की धारा, चैतन्य, जो भी नाम चाहो, ऐसे तो अनाम है, तुम जो भी नाम देना चाहो दो – परमात्मा, मोक्ष, निर्वाण, आत्मा, अनात्मा, जो तुम कहना चाहो – पूर्ण, शून्य, जो भी यह भीतर है अनाम – इसमें डूबो! इसमें डूबने से ही प्रश्न धीरे – धीरे विसर्जित हो जाएगा.

उत्तर मिलेगा, ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं; सिर्फ प्रश्न विसर्जित हो जाएगा. और प्रश्न के विसर्जित हो जाने पर तुम्हारी जो चैतन्य की दशा होती है वही उत्तर है. उत्तर मिलेगा, ऐसा मैं नहीं कह रहा. निष्प्रश्न जब तुम हो जाते हो तो जीवन में आनंद है, मंगल है, शुभाशीष बरसता है. तुम नाचते हो, तुम गुनगुनाते हो. समाधि फलती है.

फिर तुम कुछ पूछते नहीं. फिर कुछ पूछने को है ही नहीं. फिर जीवन एक प्रश्न की तरह मालूम नहीं होता, फिर जीवन एक रहस्‍य है. समस्या नहीं, जिसका समाधान करना है; एक रहस्य है, जिसे जीना है, जिसे नाचना है, जिसे गाना है; एक रहस्य, जिसका उत्सव मनाना है.

भीतर उतरो. शरीर के पार, मन के पार, भाव के पार – भीतर उतरो!

जान सके न जीवन भर हम
ममता कैसी, प्यार कहां
और पुष्प कहां पर महका करता?
जान सके न जीवन भर हम
ममता कैसी, प्यार कहां
और पुष्प कहा पर महका करता?

गंध तो आती मालूम होती है – कहां से आती है? जीवन है, इसकी छाया तो पड़ती है; पर इसका मूल कहां है? प्रतिबिंब तो झलकता है, लेकिन मूल कहां? प्रतिध्वनि तो गूंजती है पहाड़ों पर, लेकिन मूल ध्वनि कहां है?

जान सके न जीवन भर हम
ममता कैसी, प्यार कहां
और पुष्प कहीं पर महका करता?
मिली दुलारी आहों की
और हास मिला है शूलों का
जान सके न जीवन भर हम
सौरभ कैसा, पराग कहाँ
और मेघ कहाँ पर बरसा करता?

पर मेघ बरस रहा है – तुम्हारे ही गहनतम अंतस्तल में. फूल महक रहा है – तुम्हारे ही गहन अंतस्तल में. कस्‍तुरी कुंडल बसै! यह जो महक तुम्हें घेर रही है और प्रश्न बन गई है – कहाँ से आती है? यह महक तुम्हारी है, यह किसी और की नहीं. इसे अगर तुमने बाहर देखा तो मृग – मरीचिका बनती है, माया का जाल फैलता है, जन्मों – जन्मों की यात्रा चलती है. जिस दिन तुमने इसे भीतर झांक कर देखा उसी दिन मंदिर के द्वार खुल गए. उसी दिन पहुंच गए अपने सुरभि के केंद्र पर. वहां है प्रेम, वहीं है प्रभु!

मन उलझाए रखता है बाहर. मन कहता है चलेंगे भीतर, लेकिन अभी थोड़ा देर और.
किसी कामना के सहारे
नदी के किनारे बड़ी देर से
मौन धारे खड़ा हूं अकेला.
सुहानी है गोधूलि – बेला
लगा है उमंगों का मेला.
यह गोधूलि – बेला का हलका धुंधलका
मेरी सोच पर छा रहा है.
मैं यह सोचता हूं?
मेरी सोच की शाम भी हो चली है.
बड़ी बेकली है.
मगर जिंदगी में
निराशा में भी एक आशा पली है
मचल ले अभी कुछ देर और ऐं दिल!
सुहाने धुंधलके से हंस कर गले मिल
अभी रात आने में काफी समय है!

मन समझाए चला जाता है; थोड़ी देर और, थोड़ी देर और – भुला लो अपने को सपनों में; थोड़ी देर और दौड़ लो मृग – मरीचिकाओं के पीछे. बड़े सुंदर सपने हैं! और फिर अभी मौत आने में तो बहुत देर है.

इसलिए तो लोग सोचते हैं, संन्यास लेंगे, प्रार्थना करेंगे, ध्यान करेंगे – बुढ़ापे में, जब मृत्यु द्वार पर आकर खड़ी हो जाएगी. जब एक पैर उतर चुकेगा कब्र में तब हम एक पैर ध्यान के लिए उठाएंगे. मचल ले अभी कुछ देर और ये दिल!

सुहाने धुंधलके से हंस कर गले मिल अभी रात आने में काफी समय है.

ऐसे हम टाले चले जाते हैं. रात आती चली जाती है. काफी समय नहीं है, रात आ ही गई है. बहुत बार हमने ऐसे ही जन्म और जीवन गंवाया, मौत की हम प्रतीक्षा करते रहे – मौत आ गई, ध्यान आने के पहले. एक जीवन फिर खराब गया. एक अवसर फिर व्यर्थ हुआ. अब इस बार ऐसा न हो. अब टालो मत! यह गंध तुम्हारी अपनी है. यह जीवन तुम्हारे भीतर ही छिपा है. घूंघट भीतर के ही उठाने हैं.

प्रेम रंग रस ओढ़ चदरिया
ओशो

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