समझिए सरगेई किरोव की हत्या को, ताकि आसिफ़ा को मिल सके न्याय

आज जानते हैं सरगेई किरोव (Sergei Kirov) की हत्या के बारे में.

इतिहास में इस हत्या के लिए एक वाक्य है – One bullet that killed a million people.

समझते हैं इसके मायने.

सरगेई किरोव, सोवियत रशिया के क्रूरकर्मा तानाशाह स्टेलिन का दाहिना हाथ माना जाता था.

1 दिसम्बर 1934 को लेनिनग्राद में गोली मार कर उसकी हत्या की गई. हत्यारे का नाम था लेओनिड निकोलाएव. 30 वर्ष का युवा था.

पूरे सोवियत यूनियन में खलबली मच गयी और स्टेलिन खुद मॉस्को छोड़कर ट्रेन से चला आया.

29 दिसम्बर को निकोलाएव को गोली से मृत्युदंड दिया गया. उसके मारे जाने के शीघ्र ही बाद उसकी पत्नी और उसके 85 वर्ष बूढ़ी माँ को भी उसके पीछे-पीछे रवाना कर दिया गया.

कहा ये जाता था कि किरोव और निकोलाएव के पत्नी के संबंध थे, जिसके कारण उसने किरोव पर गोली चलाई. निकोलाएव का कोई साथी नहीं था, उसने अकेले ही अपने कारनामे को अंजाम दिया था.

लेकिन स्टेलिन ने यह मौका उठा लिया. निकोलाएव से संबन्धित जो मिले, जैसे भी संबंध जोड़ा जाये, उठाकर मृत्युदंड देने की मुहिम सी चला दी उसने.

कोई अपील भी नहीं, अगर आप को ये कहा जाये कि आप को निकोलाएव से संबन्धित होने के आरोप में अरेस्ट किया जा रहा है तो सुनवाई भी नहीं होती थी.

और यह यहाँ तक चला कि एलीज़ाबेथ लेरमोलो नाम की एक औरत को मृत्युदंड मिलने का कारण भी आप को हैरान कर देगा. वे निकोलाएव की बुआ की पड़ोसिन थी.

किरोव की हत्या को ले कर स्टेलिन ने कत्लेआम मचाया. पार्टी के हज़ारों कार्यकर्ता मार डाले. कई निर्दोष नागरिकों की हत्या की. कुल मिलकर इतना आतंक फैलाया कि आदमी खुले में सांस लेने के पहले भी सोचे.

क्या स्टेलिन को किरोव से इतना प्यार था?

नहीं, बल्कि ज़्यादातर यही सुनने में आ रहा है कि उसकी हत्या भी स्टेलिन ने ही करवाई थी क्योंकि भले ही वो उसका दाहिना हाथ था, उसकी अपनी लोकप्रियता बढ़ रही थी और वो खूंखार नहीं लग रहा था.

स्टेलिन को शक था कि वो (स्टेलिन) और उसकी कम्युनिस्ट पार्टी जो लगातार कत्ल करवाए जा रही थी उससे रशियन जनता ऊब गई थी और स्टेलिन को हटाकर किरोव जैसे को ऊपर उठा सकती थी.

हो सकता है स्टेलिन ने किरोव को मरवाया हो या नहीं, लेकिन किरोव की हत्या हुई तो स्टेलिन मौके का फायदा उठाने से नहीं चूका. पूरी क्रूरता से उसने अपनी सत्ता कायम कर दी.

लेकिन क्या किरोव को वाकई न्याय मिला ?

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आसिफा को न्याय मिलना चाहिए. क्योंकि जनवरी में हुई हत्या की अब हो रही घोषणा – क्या अब तक स्क्रिप्ट लिखा तो नहीं जा रही थी?

आसिफा का बकरवाल समाज से होना जो कभी पाकिस्तान परस्त नहीं रहा तथा अलगाववादियों से नहीं जुड़ा, वानी जैसे बदनाम और जिलानी से जुड़े पुलिस अफसर को इस केस में बाहर से लाकर जोड़ना, CBI जांच से आनाकानी, महबूबा के बयान – ज़रा कड़ियाँ जोड़ने की आवश्यकता है.

आसिफा को न्याय मिलना चाहिए, उसके बलात्कारियों को सज़ा मिलनी चाहिए. वैसे सुना है कि जब सेना के हाथ खोले गए थे तो महबूबाजी ने विरोध किया था लेकिन लगभग रोते रोते लौटना पड़ा था, उनकी मांग को माना नहीं गया था.

And hell hath no fury greater than a woman scorned. बेटी के बदले में खूंखार और गुनाह साबित आतंकवादियों को छुड़ाने का सौदा करने वाले बाप का खून है उन की रगों में, अपनी पहचान तो देगा ही कहीं न कहीं.

आसिफा को न्याय मिलना चाहिए. इस कांड की निष्पक्ष जांच हो, और जो भी गुनहगार निकले, उसको उसके पद का लिहाज न रखते हुए सज़ा दी जाये.

वैसे एक बात याद आई तो बताता चलूँ – आम तौर पर हिन्दू समाज कभी भी बलात्कारियों का साथ नहीं देता, मुसलमानों की सोहबत में रहकर भी हिंदुओं ने मुसलमानों का यह दुर्गुण आत्मसात नहीं किया है.

अलीगढ़ में ख्वाजा के वंशज चिश्तियों ने कांड किया था उसमें कुछ हिंदुओं को भी मज़े लेने जोड़ा था. पकड़े गए, नाम सामने आए तो हिन्दू समाज ने साथ नहीं दिया उनका. एक ने तो आत्महत्या की ज़िल्लत के मारे. निर्भया कांड में भी एक हिन्दू अभियुक्त ने जेल में आत्महत्या की थी.

लेकिन ख्वाजा के चिश्तियों को मुस्लिम समाज ने दुतकारा नहीं. अफ़रोज को भी मुस्लिम समाज ने ही ढाल बनकर बसाया है, वही समाज उसकी ढाल बना है. कभी किसी मुस्लिम राजनेता को उसकी निंदा करते सुना नहीं.

मुंबई के शक्ति मिल रेप कांड में भी मुस्लिम बलात्कारी की माँ ही कोर्ट में उसके नाबालिग होने का कोई प्रमाण लेकर हाजिर थी. आज छूटकर वो रंगदारी का धंधा कर रहा है, समाज के साथ के कारण.

जम्मू के लोग क्यों पुलिस के खिलाफ हुए यह पता लगाना ज़रूरी है. वानी का चरित्र भी सामने आए, उसे इस केस में क्यों लाया गया जब उसका jurisdiction नहीं था यह भी बात समझ में आनी चाहिए.

हाँ, आसिफा के साथ न्याय अवश्य होना चाहिए.

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