फ़र्ज़ी फिल्मी टाइगर में उलझा रहा देश और चला गया असली टाइगर : भाग 3

2 राजपुताना राइफल्स के लड़के अभी तोलोलिंग से नीचे उतरे भी न थे कि कर्नल एम बी रविंद्रनाथ को 3 Pimples नामक 3 चोटियों को खाली कराने का आदेश मिल गया.

तोलोलिंग की लड़ाई में एक तरफ से मेजर विवेक गुप्ता चढ़ रहे थे तो दूसरी तरफ से मेजर मोहित सक्सेना. इन्हीं की टीम में थे नायक दिगेंद्र कुमार और राइफलमैन जयराम सिंह. दिगेंद्र को तोलोलिंग पर हाथ और कंधे में गोली लगी फिर भी LMG छोड़ के हटे नहीं…

इन तीनों योद्धाओं को अदम्य साहस और वीरता के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया…

3 Pimples पर चढ़ाई हुई तो एक टीम का नेतृत्व मेजर पद्मपाणि आचार्य कर रहे थे और दूसरी टीम का मेजर मोहित सक्सेना… साथ में थे कैप्टन विजयंत थापर, Lt. Neikezlakuo Kenguruse, सिपाही जगमाल सिंह, नायक तिलक सिंह, सूबेदार शिव नायक और हवलदार रणबीर सिंह.

उस रात हमले का नेतृत्व मेजर आचार्य कर रहे थे… कैप्टन विजयंत थापर का अर्दली था सिपाही जगमाल सिंह… उम्र बमुश्किल 22-23 साल… उसका चयन उस टुकड़ी में नहीं हुआ था जिसने 3 Pimples पर हमला करना था…

जगमाल सिंह ने Roll call में आगे हो कर कहा कि जब मेरे साहब जा रहे हैं तो मैं यहां क्या करूंगा… मैं भी जाऊंगा… उस रात वो दोनो वहीं शहीद हो गए…

[फ़र्ज़ी फिल्मी टाइगर में उलझा रहा देश और चला गया असली टाइगर : भाग 1]

Lt. Kenguruse की शौर्य गाथा तो रोंगटे खड़े कर देती है…

वो नागालैंड के रहने वाले थे और वहां के एक सरकारी स्कूल में टीचर थे. फिर एक दिन न जाने क्या दिल में आया, सेना में अफसर बनने निकल पड़े…

नागालैंड उन दिनों अलगाववादी आंदोलन का शिकार था और आम नागा समाज भारत से और भारतीय सेना से नफरत करता था पर Kenguruse उसी Indian Army में भर्ती हो गए.

उस रात पहाड़ी के ऊपर LMG चढ़ानी थी… Kenguruse चूंकि जन्म से ही पहाड़ी थे और उनको पहाड़ों पर चढ़ने का खूब अभ्यास था… पर जूते पहन के चढ़ा नही जा रहा था…

[फ़र्ज़ी फिल्मी टाइगर में उलझा रहा देश और चला गया असली टाइगर : भाग 2]

उस कड़कड़ाती ठंड में जब कि तापमान -10 डिग्री था, उन्होंने जूते उतार दिए, कमर में रस्सी बांधी और अकेले पहाड़ी पर चढ़ गए और वहां रस्सी बांध दी…

पूरी टुकड़ी उसी रस्सी से चढ़ के ऊपर आयी… फिर उसी रस्सी से बांध के LMG ऊपर खींची… दो पाकिस्तानी Gun Fight में मारे और फिर उनके Bunker में जा घुसे…

और दो को वहां Hand to hand Combat में अपनी नागा खुकरी से चीर दिया… Lt. Kenguruse के शहादत हैण्ड ग्रेनेड लगाने के बाद 100 फ़ीट गहरी खाई में गिरने से हुई.

उस रात मेजर आचार्य की पूरी टुकड़ी युद्धभूमि में खेत रही… कैप्टन थापर, Lt Kenguruse, जगमाल, तिलक सिंह और उनके साथ के 8 अन्य सिपाही… सब शहीद हो गए.

उस हमले से एक रात पहले इन सभी योद्धाओं ने अपने घर पर खत लिखे थे… आखिरी खत… वो सब जानते थे कि लौट के वापस नही आएंगे… आये भी नहीं…

मेजर आचार्य और कैप्टन थापर के वो अंतिम पत्र… वो एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसे इतिहास में दर्ज करना चाहिए और बच्चों को स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए…

कर्नल रविन्द्रनाथ के इन लड़कों में देश के लिए जान देने का वो जज़्बा कहां से आया? सूबेदार शिव नायक जहां छिपे हुए थे उस से सिर्फ 5 मीटर की दूरी पर बोफ़ोर्स के गोले आ के गिर रहे थे…

हवलदार रणबीर सिंह की पूरी टुकड़ी शहीद हो गयी, पर वो एक कदम भी पीछे न हटा और अकेला ही लड़ता रहा…

सिपाही उत्तम सिंह… वो रेजिमेंट का carpenter (बढ़ई) था… उसे रात में दिखता नही था… इसके बावजूद वो अपने कंधे पर Ammunition की पेटियां रख के सामने वाले सिपाही के सहारे युद्ध भूमि में पहुंचाता रहा… रेजिमेंट का Cook (बावर्ची) भी लंगर छोड़ ऊपर पहुंच गया… जान हथेली पर ले कर…

ये वो लोग थे जिनका फ्रंट पर कोई काम नहीं… जहां चारों तरफ मौत बरस रही हो… जहां मृत्यु अवश्यम्भावी हो, वहां भी कोई आदमी कैसे कूद जाता है और फिर कदम पीछे नहीं हटाता?

ये जज़्बा कहां से आता होगा? जान देने का?

और ऐसे शूरवीरों का युद्ध भूमि में नेतृत्व करना… उनको हौसला देना…

फिर वही सवाल… आपका एक बेटा शहीद हो गया… आप कैसे दूसरे को भेज देंगे… जा बेटा… अपनी रेजिमेंट, अपने परिवार के इतने सारे शव देख के एक बाप को कितना कड़ा करना पड़ेगा अपना कलेजा?

और तब, जब कि आप रो भी नही सकते?

Commanders dont cry in the Battle…

जब 2 राजपुताना राइफल्स कारगिल में तैनात हुई तो उस समय एमबी रविन्द्रनाथ लेफ्टिनेंट कर्नल थे… वहीं युद्धभूमि में ही उनका प्रमोशन हुआ और उनको कर्नल बना दिया…

और फिर 3 Pimples की विजय के बाद 2 राजपुताना राइफल्स को Unit Citation प्राप्त हुआ… सेना में ये किसी पलटन के लिए बहुत बड़ा सम्मान होता है… और सदियों में कभी एकाध बार नसीब होता है…

उस रात, जबकि सामने चोटियों पर उनके बेटों/ भाइयों के शव पड़े थे, कर्नल साहब ने सेना मुख्यालय से आया वो टेलीग्राम पढ़ के सुनाया… For displaying exemplary valour and grit in the face of the enemy… Your Regiment is hereby awarded with a special instant award of ‘Unit Citation’…

ये घोषणा सुन के पूरी पलटन ने अपनी टोपियां हवा में उछाल के जश्न मनाया और उस रात रेजिमेंट में मिठाई बंटी…

सोच के देखिये कि वो कौन और कैसे लोग होंगे जो अपने भाइयों की लाशों के बीच खड़े भी टोपियां उछाल के जश्न मना सकते हैं और मिठाईयां बांट सकते हैं?

ऐसे जांबाज़ थे हमारे कर्नल एम बी रविंद्रनाथ जिनका पिछले हफ्ते बंगलुरू में निधन हो गया…

और लानत है कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर कि जिसने गौरी लंकेश जैसे देशद्रोही को तो state funeral और state honour दिया, राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि कराई पर कर्नल एम बी रविंद्रनाथ को उनके निधन पर पूछा तक नहीं…

दर-ओ-दीवार पे हसरत-ए-नज़र करते हैं
खुश रहो अहल-ए-वतन हम तो सफ़र करते हैं.

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रहकर
हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुख सह-सहकर
वक़्त-ए-रुख़्सत उन्हें इतना भी न आये कहकर
गोद में आँसू जो टपके कभी रुख़ से बहकर
सिर्फ़ उनको ही समझना दिल के बहलाने को.

अपनी क़िस्मत में अज़ल से यही ग़म रखा था, दर्द रखा था
किसको परवाह थी और किसमें ये दम रखा था
हमने जब वादी-ए-कुर्बअत में क़दम रखा था
दूर तक याद-ए-वतन आयी थी समझाने को.

दिल फ़िदा करते हैं क़ुबार्न जिगर करते हैं
पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खुश रहो अहल-ए-वतन हम तो सफ़र करते हैं.

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