दुःखी लोग जुड़ते गये और इनका कारवाँ बढ़ता गया

भोपाल की ताज-उल मस्जिद के सामने एक छोटा सा चर्च है. यह जगह लगभग साल भर हम दोस्तों के लिये अड्डे की तरह था.

मेरे छोटे से हॉस्टल में कई ईसाई लड़कियाँ थी. इनमें से ज़्यादातर मध्यप्रदेश के दूरदराज़ के आदिवासी थे जिन्होंने ईसाईयत अपना ली थी.

तो हम दोस्त हर इतवार चर्च पहुँच जाते. ईसाई लड़कियाँ श्रद्धाभाव से प्रार्थना करती पर मैं यीशु पर दिया गया भाषण एक कान से सुनती और दूसरे से निकालती.

हम कई बार शाम को भी जाते क्योंकि उनके यूथ क्लब में गाना-डांस आदि की प्रैक्टिस चलती ही रहती.

पादरी की पत्नी हमारे लिये समोसे मंगवाती. मतलब मेरे लिये यह मुफ्त का मनोरंजन था. मैं समोसे खाकर और गप्पे हाँक कर आ जाती.

फिर आता वह हिस्सा जब लोग अपनी समस्याएं बताते.

अगर आप लम्बे समय तक चर्च जाएं तो आपको एक बात साफ दिखेगी, ईसाई धर्म भारत में इसीलिये नहीं फैल रहा क्योंकि उसके तरफदार हर जगह बाइबिल बाँटते फिरते हैं. सच यह है कि वो मनोविज्ञान से खेलना जानते हैं.

आपको यह नज़ारा किसी मंदिर में नहीं दिखेगा जो चर्च में होता है. एक ग्रुप काउंसलिंग जैसा माहौल बनाया जाता है. मानो एक धार्मिक समूह अचानक ही alcohol anonymous जैसे दल में बदल गया हो.

एक बन्दा खड़ा होता है और अपने जिंदगी की समस्याएं बताता है. लोग ध्यान से सुनते हैं. उसके साथ सहानुभूति दिखाते हैं.

अंतिम प्रार्थना में उसके लिये और तमाम परेशान लोगों के लिये अलग से स्पेशल प्रार्थना की जाती है. काफी है इतना हर इंसान को जोड़ने के लिये कि आपकी समस्या की कद्र है किसी को.

हालाँकि यह दीगर बात है कि समस्या आपको लगातार हो रहे लूज़ मोशन की हो या फिर फिर आवारा हो रहे बेटे की, समाधान बस दो ही होंगे :

1. यीशु पर भरोसा रखो.

2. प्रार्थना करते रहो.

खैर, उस दिन एक रोते हुये पिता आये. उनका जवान बेटा रोड एक्सीडेंट के बाद कई दिनों से कोमा में था. वह हिन्दू थे और हर मंदिर- दरगाह नाप लिये थे. चर्च का ही एक बन्दा उसे अब अंतिम आशा दिखाने यहाँ ले आया. बच्चे के लिये क्या नहीं कर सकते माता-पिता?

उस दिन वह इंसान प्रार्थना के दौरान ही बेहोश हो गया. बेटे की मौत की संभावना ने उसे तोड़ दिया था. पादरी उसे समझाते रहे कि सब कुछ ठीक हो जायेगा.

उस पिता से जो वादा डॉक्टर भी नहीं कर पाये थे वह उस पादरी ने किया कि बेटा वापस स्वस्थ होकर निकलेगा. बस कीमत एक होगी – पूरे परिवार का यीशु के प्रति पूरा समर्पण. दूसरे शब्दों में धर्म परिवर्तन.

[सचमुच इस ‘अंतरण’ से चिंतित हों तो सिर्फ प्रतिक्रिया देने के अलावा भी कुछ करिए]

वह इंसान मान गया. मेरे ख्याल से ऐसे समय में कोई भी मान ही जाता. अगले दिन वह अपनी पत्नी को भी लाया. वह भी रो-रोकर अधमरी हो चुकी थी.

अगले सप्ताह उनके धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया होनी थी. यह कैसे होता है मुझे कभी पता नहीं चल पाया क्योंकि तीन दिन बाद उस लड़के ने दम तोड़ दिया. परिवार वापस चला गया और फिर कभी चर्च की तरफ मुड़ कर नहीं आया.

अगले रविवार प्रार्थना हुयी. इस घटना पर लोगों ने शोक व्यक्त किया और फिर पादरी ने एक फैसला दिया, “ज़रूर उस आदमी के मन में यीशू के प्रति पूरा समर्पण नहीं रहा होगा इसीलिये चमत्कार नहीं हो पाया. आप सबको यीशु पर और भरोसा करना होगा.”

मैंने आस-पास के चेहरे देखे. लोग सहमति में सिर हिला रहे थे. मैं विस्मित थी तर्क के इस नायाब प्रयोग से.

जब वापस आयी तो मेरी ईसाई दोस्त ने रास्ते में बताया उसके परिवार ने भी बीमारी की वजह से धर्म परिवर्तन करवाया था. एक दूसरी दोस्त के परिवार ने लम्बे समय से चल रही पारिवारिक कलह की वजह से.

और इस तरह दुःखी लोग जुड़ते गये और इनका कारवाँ बढ़ता गया.

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