बाकी तो सब माया है…

तुम ऐसे समय में प्रेम कविता कैसे लिख लेती हो?
कैसे आ जाता है प्रेम तुम्हारे मन में, यू स्टुपिड लेखिका?”
कवि ने उसे जैसे तिरस्कार से देखते हुए कहा
उसकी सिगरेट का धुंआ ऊपर और कहीं ऊपर जा रहा था!

अभी अभी कागज और देह दोनों पर से ही
प्रेम कविता समाप्त हुई थी!
दोनों की ही कसक ताज़ा ही थी!

लड़की अभी दोनों कविताओं को सहेज ही रही थी,
कि क्रांतिकारी कवि देह की कविता को समेटकर
कागज़ की प्रेम कविता पर फिर चीखा

“देख नहीं रही हो, लोकतंत्र पर हमला हो रहा है,
देख नहीं रही हो, बलात्कार हो रहे हैं!
फिर भी तुम प्रेम कविता लिख रही हो!”

लड़की चुप थी, वह प्रेम में ही अभी डूबी थी,
उसने कलम उठाई, फिर से एक और प्रेम कविता लिख दी,
कवि से बोली

“तुमने जिस दिन अपनी पत्नी को बाहर निकाल कर,
मुझे जीवन में प्रवेश दिया,
उस दिन तुमने बहुत प्यारी सी एक प्रेम कविता लिखी थी,
लिखी थी न! वह बाहर रो रही थी, और तुम मेरे साथ
देह पर नई कविता लिख रहे थे,
क्या वह बलात्कार नहीं था?

एक दिन शहर जल रहा था दंगों से,
और तुम अकादमी से सम्मान का जश्न मना रहे थे,
उस दिन हम दोनों ने कितनी बार प्रेम किया था,
जलते हुए शहर में, शायद तुम्हें याद नहीं!,

तुम्हें याद नहीं कि इस प्रेम के आवेग में,
तुमने न जाने कितनी बार किस किस का नाम लिया,
मेरी देह पर न जाने किस किस नाम से कविता लिखी,
एक दिन तो सच में चेहरे की सूजन ने ही बता दिया था,
तुम्हारा प्रेम!

मगर फिर भी मैं तुमसे प्रेम करती हूँ!
स्त्री तो प्रेम ही करती है,
दरअसल स्त्री को पता ही नहीं कि कब उसका जीवन
क्रांति की आग में जलकर भस्म हो जाएगा,

स्त्री को नहीं पता कब उसे शाब्दिक और शारीरिक
बलात्कार का हिस्सा बनाया जाएगा,

स्त्री को पता ही नहीं,
कि कब उसका मसला राजनीतिक हड्डियों को
चूसने के लिए इस्तेमाल हो जाएगा,
इसलिए स्त्री लिखती है प्रेम!

हे कवि मुझे भी मेरा प्रेम जी लेने दो,
समय जैसा भी हो,
स्थान कोई भी हो,
कोई मेरे बलात्कार पर अपना हित साधेगा ही,
किसी को मिलेगा सम्मान, मेरे आंसुओं पर कविता लिखकर,
किसी को मिलेगी गद्दी,
मेरे लिए कथित आन्दोलन करके,
पर मुझे क्या मिलेगा?

स्त्री को क्या मिलेगा?
स्त्री के पास समय नहीं है,
उसे अपनी क्रांति से अलग रखकर प्रेम कर लेने दो न!”

कवि को फुर्सत नहीं थी,
फेसबुक पर आन्दोलनों की बाढ़ आ गयी थी,
स्त्री को फिर से प्रेम के लिए तैयार भी तो कवि को करना था,
लिखने की प्रेरणा तो देह से ही मिलेगी,
बाकी तो सब माया है…

– सोनाली मिश्र

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