आम पापड़ : अमावट, साक्षात आम का वट

रक्त की शर्करा का निस्तार ना हो तो वर्जित है आम,
चैत्र, वैशाख, जेठ, के चढ़ते प्रभाव पर सौ विधियाँ है आम तृप्ति की,
किंतु वर्जना की अर्गला के आगे सब कुंद.

तृष्णा के अधिकृत देव का श्राप भोगती काया
को रसवंत आम की शर्करा अक्षम्य जान पड़ती है
किंतु चेतना और मन के आधीन होकर
चुपके से घेरे जाते फल
घोंट घोंट कर उतारे जाते गले,
सेहत मन मसोसकर रह जाती
कुलवधू ठीक कमर में काटती चिकोटी
और आम का मेद आँखों में उतारकर देती उलाहना
यह भी कोई तरीका है भला, शर्करा के मरीज होकर यूँ चोरी ।

सहोदर के संग श्रावण की यात्रा
जब उज्जैन के अधिपति पूजा को तन खोलकर बैठे थे
दधि मिश्री बिल्व धतूरे के भोग पर,
हम जुगाड़ में रसवंत आम की नाप रहे थे गलियाँ
ना जाने कौन फेहरी वाला गा रहा था
आम के गुन,
खट्टा मीठा और चटपटा.

श्रावण में आम
लोलुपता से उल्टे पाँव दौड़े और पहुँचे
लाला बेच रहा था पापड़
रसवंत की सौ किस्म नस्ले
किंतु पापड़ सबसे अलहदा
ना गूदा ना छिलका
रस भी कैसा जो कन भर भी ना घटा
शक्कर से संवर कर और खिल बिछा
आमचूर की लोई, नमक सेंधा, कालीमिर्च और सौंठ की चिलक
मानों सौ पुण्य का फल.

अमृत का सेवन करते देव भी ना नाप पाएँ
ऐसा स्वाद,
खस्ता कुछ यूँ कि चौंसा, बादाम मुँह घुले हो,
केसर की गंध और हापुस की रंगत
लंगड़ा रेंगता रेंगता आखिर हो हत्थे चढ़ा
ये साहब उसके भी वशंज,

भादो, अश्विन, कार्तिक निहाल हो जावें
इतने तौल के रख लिए भीतर
पाजी मन रेंग रहा था प्रसन्न, देह थी भय में
कि एक कौर तोड़ रख लिया जिव्हा पर
रस फिरता रहा रंध्रों में,
हम शांत तृप्त होते रहे ।

– किंशुक शिव

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