सचमुच इस ‘अंतरण’ से चिंतित हों तो सिर्फ प्रतिक्रिया देने के अलावा भी कुछ करिए

अधिकांश मामलों में ‘अर्थ’ काम करता है… धर्म में ही बनी रहें तो हमारे लिए ये बस्तर की आम लड़कियां ही हैं…

जिनके बारे में न हम कुछ जानते हैं, न सोचते हैं, ये कैसे जीती हैं, पढ़ती हैं या नहीं, इनके परिवार के पास गुज़र-बसर के लायक ज़मीन है भी या नहीं, दो वक़्त का खाना मिल जाता है नहीं… ये सब हमारी चिंताओं में शामिल ही नहीं है…

ऐसे में अपने सुखद-सुरक्षित भविष्य की खातिर जब ये ऐसा कोई कदम उठाती हैं, तब अकबका कर हम प्रतिक्रिया देने लगते हैं…

नन बनने जा रही हैं, मतलब कुछ तो पढ़ाई-लिखाई करवाई ही जाएगी, रहने को एक जगह होगी, खाने की निश्चिंतता होगी, मां-बाप, छोटे भाई-बहनों के लिए भी कुछ आश्वासन मिले ही होंगे…

और ये तय मानिए कि सभी आश्वासन पूरे भी किये जाएंगे, वरना नए शिकार कैसे फंसेंगे…

तो ऐसी खबरों पर हाय-तौबा मचाने की बजाय इनकी बुनियादी ज़रुरतों की पूर्ति कीजिए, या इन्हें सक्षम बनाइये…

अगर नहीं, तो चलने दीजिए… कुछ जिंदगियां संवर रही हैं…

और एक निवेदन… ऐसे मामलों को धर्मांतरण कहना बंद कीजिए… हिन्दू व्याख्याकारों के मुताबिक़ ‘धर्म वह जो धारण किया जाए’… और वैसे भी धर्म, रिलिजन और मज़हब पर्यायवाची नहीं हैं…

यानी धर्मांतरण किया ही नहीं जा सकता… धर्म का त्याग किया जा सकता है, जो ये बालिकाएं संभवत: करने जा रही थीं… धर्म से निकल कर रिलिजन की शरण में…

और कारण बहुत भौतिक रहे होंगे… कोई भरे पेट वाला, समृद्ध, पढ़ा-लिखा व्यक्ति तो उठाता नहीं ऐसा कदम, जब तक कि कोई राजनीतिक कारण/ लाभ न हो… जैसे भीमराव रामजी सकपाल उर्फ़ बाबा साहेब अम्बेडकर ने उठाया था.

कुल जमा आशय ये कि प्रतिक्रिया देने की बजाय कुछ पहल करिए… हम में से हर एक इन आदिवासी इलाकों के पास नहीं है…. तो कम से कम उनकी सहायता करिए जो ज़मीन पर कुछ ठोस करने के लिए प्रयासरत हैं, जैसे वनवासी कल्याण परिषद/ वनवासी कल्याण आश्रम.

लंबे अरसे से ये कोशिशों में जुटे हैं, फिर भी उपरोक्त घटनाएं हो रही हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि इनके प्रयासों में कोई कमी है, बल्कि इसका सीधा सा अर्थ यह है कि मिशनरियों के मुकाबले इनके पास संसाधनों की कमी है.

सचमुच इस ‘अंतरण’ से चिंतित हों तो सिर्फ प्रतिक्रिया देने के अतिरिक्त भी कुछ करिए.

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