सावधान रहें जो तोड़ देना चाहते हैं मानवता को, समाज को, मंदिरों को

मैं सनातनी हूँ. मैं अपने धर्म में आस्था रखती हूँ, श्रद्धा रखती हूँ. किन्तु किसी चमत्कार हो उठने के लिए प्रतिक्षिता नहीं हूँ. ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा’ के अनुसार श्रम में विश्वास रखती हूँ. मेरा सन्देश दुर्बुद्धि वामियों के ‘मन्दिर-थूक’ के विरुद्ध है. इन बुद्धिजीवियों को हर दुर्घटनाओं का केंद्र धर्म प्रतीत हो रहा है. इनसे बहस करना भी अपने मुख पर स्वयं कीचड़ लपेटना है.

ये शब्द उद्धत करते हुए मैं स्वयं पीड़ा में संवेदित हूँ. हमारे मन्दिर हमारी आस्थाओं के केंद्र हैं. मन्दिर जीवित हैं ठीक उसी तरह जैसे कोई संस्था. किन्तु इनके मूल में व्यक्ति ही काम करते हैं. भवन स्वयं काम नहीं करते.

मैं जी भर धिक्कारती हूँ मानवता को कलंकित करने वालों दूषित मानसिकता के लोगों को. जिन्होंने पूजास्थल, प्रार्थनास्थल को अपने नीचकर्मों का स्थान बना दिया. और वे लोग जो वामी हैं, वे स्वयं को नास्तिक कहते हैं, वे मन्दिर के जी उठने की प्रतीक्षा करते रहे? मूर्ति में आवाज़ उठने की प्रतीक्षा करते हैं. और जब इनके मनसूबे पूरे नहीं होते तो उन मंदिरों को तोड़ देने की हिमायत करने लगते हैं.

दरअसल इनको घायल से, पीड़ा से, सम्वेदना से, आहों से या करुणा से कुछ नहीं लेना. इनका लक्ष्य केवल मन्दिर-संस्कृति पर आघात करना है.

ये पापी व्यक्ति की मनोवृत्ति को दोष नहीं देते. इनको समाज मे दूषित भावनाएं नहीं दिखती. इन्हें सनातन के सिवा अन्य क़ौम के भीतर हो रही दुर्घटनाएं नहीं दिखती. क्योंकि इनका माइंडसेटप सनातन विरोधी है. जो आज मन्दिर और मूर्ति पर थूकने के स्टेटमेंट दे रहे हैं.

ये धर्मभीरू मन्दिर पर थूकते हैं. कहाँ कहाँ थूकेंगे? और क्या क्या तोड़ेंगे? रास्ते, स्कूल, अपने घर, नातेरिश्तेदार के घर… ये बुराइयां तो सब जगह हावी हो रही हैं.

ये बुद्धिजीवी बुराइयों के विरुद्ध नहीं हैं. ये अतिबुद्धिवादी तो समाज में विष घोल रहे हैं, न कि संवेदशनशील मुद्दों को उठा रहे हैं. दोषियों को दंड की अपील तो इनके भेजे में है ही नहीं.

अपने समाज-देश अपनी माटी की रक्षा का दायित्व उन लोगों पर है जो वल्नरेबिलिटीज़ के साथ सतत है. ध्यान रखें अपना और अपनों का और सावधान रहें उनसे जो सिर्फ़ तोड़ देना चाहते हैं मानवता को, समाज को और मंदिरों को.

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